बुधवार, 23 सितंबर 2009

व्यंग्य 13 : रावण नहीं मरता.....

एक व्यंग्य : रावण नहीं मरता.....
सुबह ही सुबह मिश्रा जी आ टपके। हाथ में सद्द: प्रकाशित उनका कोई कहानी संग्रह था।मैं चिन्तित हो गया ,उन्हे देख कर नहीं ,अपितु उनका कहानी संग्रह देख कर।विगत वर्ष भी वह अपना ऐसा ही एक कहानी संग्रह लेकर उपस्थित हुए थे जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे जैसे बहुत से पाठकों ने कहानी पढ़ना ही छोड़ दिया।लगता है हिंदी जगत में कल रात फिर कोई दुर्घटना हो गई। आते ही आते हड़्बड़ाते हुए बोले-
" पाठक ! एक कलम देना"
"क्यों ? लिखते हुए तो पाठक गण से कलम नहीं माँगते हो"
"यार ! मजाक छोड़ो ,जल्दी में हूँ ।मुझे यह संग्रह तुझे भेंट करना है"
"तो भेंट कर दो न ,कलम के बदले भेंट करोगे क्या?"
"यार ,जल्दी करो,मुझे और लोगों को भी यह संग्रह भेंट करना है"
मैं प्रेम में पराजित किसी योद्धा की तरह तर्कहीन हो अपनी कलम सौंप दी
मिश्रा जी ने जल्दी जल्दी कलम खोली,रोशनाई छिड़की,पारम्परिक शैली में लिखा
"स्वर्गीय पाठक को
एक तुच्छ भेंट
-सस्नेह मिश्रा।
"भाई मिश्रा !अभी हम स्वर्गीय नहीं हुए हैं"-मैने संशोधन करना चाहा
"तो क्या हुआ ? हो जाओगे। अग्रिम लिख दिया । सोचा फिर कहाँ मिलोगे"
"लगता है पूरा संग्रह आद्दोपान्त पढ़ अवश्य हो जाऊँगा"
"हें! हें ! प्रतीत होता है तुम्हारा व्यंग्य बोध स्तर ’परसाई’ जी से कम नहीं है"-मिश्रा जी ने मेरी प्रतिभा सराही
"और आप की भी कहानियों का स्तर "अज्ञेय " जी से कम नहीं -मैने बिना पढ़े ही उनकी प्रतिभा सराही।
फ़िर हम दोनों अपने-अपने महापुरुषों को अणाम-प्रणाम कर श्रद्धानत हुए।हिंदी में इसे लेन-देन की पारस्परिक समीक्षा कहते हैं।
"यार पाठक,जरा मैं जल्दी में हूँ....तथापि इन कहानियों के बारे में संक्षेपत: स्पष्ट कर दूँ ....
" मालूम है भाई मिश्रा ! हिंदी का पाठक यूँ भी जल्दी में नहीं रहता ,जल्दी में रहता है लेखक...उसे छ्पास की जल्दी रहती है...संग्रह भेंट करने की जल्दी रहती है....उसे जल्दी रहती है समीक्षा करवाने की...गोष्टी करवाने की ...विमोचन करवाने की...खेमा में घुसने की...।पाठकगण का क्या है! मुफ़्त में मिला तो पढ़ लिया"-मैने स्पष्ट किया
"यार लगे बोर करने।हाँ तो मै कह रहा था कि जो तुम देख रहे हो वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...पराड़्मुखता ही जीवन सार है ..वैशिष्ट्य ही व्यक्तित्व है...संग्रह का अपना व्यक्तित्व है..लेखनी का अपना मूल्य (मोल नहीं) है । स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...चिन्तन और मनन में तार्किक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...रावण मरता नहीं...मरना भी नहीं चाहिए...रावण मर गया तो राम क्योंकर आएंगे...? यदा यदा ही धर्मस्य ...राम का आविर्भाव होना है..... तो रावण को ज़िन्दा रखना होगा ..। राम चेतना हैं....रावण जड़ है...वह जड़ जिसकी जड़ें गहराईयों में दूर दूर तक फैली हैं ,,गाँवों से लेकर शहर तक...लखनऊ से लेकर दिल्ली तक..।ऊपर स्थूल है ...नीचे सूक्ष्म अदॄश्य अगोचर...हमें स्थूल से सूक्ष्म की तरफ जाना है...यही रहस्यवाद है ..छाया पीटने से कुछ नहीं होगा...हमें स्थूल पहचानना होगा...मूलोच्छेदन करना होगा....."
" आप चाय पीयेंगे?’ -मैने मध्य में ही बात काटना श्रेयस्कर समझा
" और आप?"
"मेरे लिए ’पेनजान ही काफी है"
"तो क्या आप भी मेरी तरह ’पेनजान’ पर भरोसा करते है?--उन्होने झट से ’पेनजान’ की एक टिकिया मेरी तरफ़ बढ़ दी और पुन: शुरू हुए
" हाँ ,तो मैं क्या कह रहा था.....?"
"कि आप को अभी कई जगह जाना है।"
" हाँ ,तो हमें सूक्ष्म से स्थूल की तरफ जाना है..."
"जी नहीं,आप को यह संग्रह भेंट करने जाना है"
" चले जाएंगे यार ! जब मुफ़्त में ही देना है तो कौन सी जल्दी है"
" मगर मुझे है"-कह कर मैं अन्दर चला गया।
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यह कहानी संग्रह क्या था ! उसकी संक्षेपिका जो अभी-अभी स्पष्ट कर गए ,अगम्य थी।नि:शुल्क दे गये थे सो पढ़ना पड़ा। आवरण काफी आकर्षक व मनमोहक था। शीर्षक से अच्छी तो आवरण पर अनावॄत लडकी की वह तस्वीर थी जो ग्लोसी पेपर पर छ्पी थी बिल्कुल रानू के उपन्यास की तरह।प्रकाशक महोदय ने अपनी लेखनी से दो-चार पृष्ट का संक्षिप्त परिचय लिख दिया था जिसका आशय यह था कि हिंदी कहानी में प्रेमचन्द जी का पुनर्जन्म हो चुका है। हिंदी जगत को इस लेखक से काफी आशा है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि ऐसी सुपाठ्य पुस्तके छाप -छाप कर वह हिंदी की सेवा करते रहेंगे।
ऐसे संग्रह की समीक्षा क्या लिखना !पाठकों हेतु ’एनोटमी"(शरीर संबंधित)समीक्षा लिख रहा हूँ।"आवरण" देख शरीर में एक अदॄश्य सी ’अँगड़ाई’ उभरने लगी।प्रकाशक जी द्वारा लिखित संक्षिप्त परिचय पढ़ा तो ’माथा भारी’ हो गया,प्रस्तावना पढ़ी तो पूरे बदन में एक "जकड़न-सी होने लगी,प्रथम कहानी में "जम्भाई" दूसरी कहानी पढ़ हल्का-हल्का ज्वर। तीसरी कहानी पढ़ते-पढ़ते ’जाड़ा’देकर कंपकंपी फिर जूड़ीताप। लगता है ठीक ही लिखा था अन्तिम कहानी पढ़्ते-पढ़ते स्वर्गीय......
मध्यान्तर तक जाते मैं अचेत हो गया ।
भयंकर सपने आने लगे-जी हारर शो की तरह।घटाटोप अन्धकार ....,भयानक सन्नाटा,,.....दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज....खण्डहर में रह-रह कर पंख फड़्फड़ाते सन्नाटा भंग करते हुए परिन्दे....फिर देर तक भयानक शान्ति....घरर चरर कर खुलता हुआ एक दरवाज़ा... नीरवता भंग करते हुए ,,,कि अचानक ...हा!हा! हा! ,-एक भयंकर अट्टहास से डर गया मैं।
" हा ! हा ! हा! पहचान मैं कौन हूँ??’- छाया ने अट्टाहास किया।
"महाराज ! आप को कौन भूल सकता..?मैं भयभीत हो हाथ जोड़ काँपने लगा- ’ महाराज ! पू्रे ’रामायण काल’ में तो क्या ,मैं तो कहता हूँ सम्पूर्ण संस्कॄत वांडःमय में या यों कहें कि पूरे विश्व साहित्य में आप के अतिरिक्त और कौन -सा पात्र है जिसके दस मुख हैं? दशानन है?"
"हूँ, सही पहचाना!"-कहते हुए अपने खड्ग का अग्रभाग मेरे कंधे पे टिका दिया जो इस समय मुझे किसी ए०के० -४७ से कम नहीं लग रहा था।
"मगर महराज ! "-रावण कहने से अप्रत्यक्ष भय था ,कहीं बिगड़ न जाएं।बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे अवसर पर महाराज ,महामहिम,माननीय,महाशय,महोदय,पूजनीय, जैसे नवनीत लेपक सम्बोधन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
" महाराज ! आप कौन वाले है? वाल्मीकि ,तुलसीदास या रामानन्द सागर वाले?"- मैने डरते-डरते पूछा
"अरे मूढ़ ! मुझे ’मोशाय’ बोल ,’मोशाय’"- अपने खडग का अग्रभाग दबाते हुए बोला- " अरे मूढ़ ! मैं सार्वकालिक हूँ ,हर काल में व्याप्त हूँ, हर स्थान में व्याप्त हूँ। त्रेता से लेकर द्वापर तक । रामायण में ’रावण’ बना तो "कॄष्णा’में कंस,। अरे मूर्ख ! अपना चौखटा उठा और देख ,लगता है तू रामानन्द सागर का सीरियल नहीं देखता?"- मैने डरते-डरते ऊपर देखा ।पहचानने का एक समर्थ प्रयास किया ।विस्मित हो गया।
" अरे ’त्रिवेदी जी " आप !"-स्वप्न में कैसे?"- भय कुछ कम हुआ
"हा ! हा ! हा ! खा गया न धोखा ,अरे दुष्ट ! मैं ’त्रिवेदी " नहीं, रावण हूँ रावण।सचमुच का रावण।कल सपने में सीता को देखेगा तो कहेगा-अरे दीपिका जी आप ? आइए आइए कौन सा साबुन दे दूँ। अरे ’रावण’ को देख ’रावणत्व’ को पहचान।
" ठीक है ,ठीक है ।यदि आप सचमुच के रावण हैं तो इधर कलकत्ता में क्या कर रहे हैं ,लंका क्यों नहीं जाते ?" -मैने भी झुंझला कर कहा
"वोई खने छिलाम,लंका में उधर मार-काट मची है सो इधर चला आया, सुना है ’इन्फ़िल्ट्रेशन’ की बड़ी सुविधा है इधर।
"एकटा आस्ते बोलून मोशाय आस्ते बोलून ,राम रथ वाले इधर आ गए तो वापस जाना पड़ेगा"-मैने कहा
"अरे ! छोड़ो । जो एक बार इधर आ जाता है वापस नहीं जाता ’वोट’ में बदल जाता है । वैसे भी मेरा ’वोट’ दस ’वोट’ के बराबर है "-अपने दसो चेहरों की ओर इंगित करते हुए कहा-"चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर सकता,मुझे दस फोटू खिंचवाना है"
"लेकिन आप तो मर गए थे स्सर!"-मैं शुद्ध सचिवालयीय शैली पर उतर आया
" अरे! अज्ञानी !पुच्छ-विषाण-हीन पुरुष ! वह झूठ था,सब झूठ। वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक,राधेश्याम से लेकर रामानन्द सागर तक सबने मुझे मारा। सभी ने यही समझा राम ने मुझे मार डाला। रावण मरता नहीं। ’रावणत्व’ अमर है।आज भी ज़िन्दा है।हर गाँव में,हर शहर में,हर गली में ,हर महानगर में।हर काल में हूँ,हर देश में हूँ,हाईड्रोजन बम्ब में हूँ,परमाणु बम्ब में हूँ, रावण व्यक्ति नहीं ,प्रवॄत्ति है ।हर अपहरण में हूँ,हर युद्ध में हूँ, हर छ्द्मवेश में हूँ,हर हठ में हूँ। मेरे मरने के बाद,क्या अब सीता का अपहरण नहीं होता? क्या सीता जलाई नहीं जाती?सीता का परित्याग नहीं होता? अरे! मैं तो रावण था तथापि सीता का स्पर्श नहीं किया। क्या आज की सीता अछूती है? मैने उन्हें ससम्मान अशोक-वाटिका में रखा ,क्या आज की सीता ’फ़ाईव स्टार’ होटलों में नहीं रखी जाती? राम को मारने के लिए ,रामत्व की आवश्यकता है । तुम्हे रावण नहीं ,’राम’ खोजना चाहिए"
"खोज रहे हैं स्सर! राम भी खोज रहें है। हर चुनाव काल में कुछ लोग ’राम-रथ’ पर आरूढ़ हो राम खोजते हैं देश के इस छोर से उस छोर तक।
’लेकिन तोमारा तुलसी तो बोलता था राम घोट घोट में व्याप्त हैं"
"जी स्सर ! आजकल ’वोट’ वोट ’ में व्याप्त हैं। जब नहीं मिलते है तो उन्हीं के नाम की खड़ाऊँ ले,सदन में घुसते हैं। आज कल जरा व्यस्त है उनका मन्दिर बनाने में ,उन्हीं के गॄह नगर अयोध्या में"
"इस प्रगति से तो मन्दिर तो नही,बहुत से जोगियों वाला मठ बन जाएगा,कलियुग बीत जाएगा"- रावण ने कहा। ज्ञानी था।
"ज़रूर बनेगा" -मैने भी केसरिया स्कार्फ़ बाँधते हुए कहा-"अभी हम लोगों ने भूमि समतल कार्य कर दिया है ,अगला कार्यक्रम किसी अगले चुनाव में या अगले कुम्भ मेला में निर्धारित करेंगे।"
रावण के इस दिव्य ज्ञान से मैं अति प्रभावित हुआ।श्रद्धावश हाथ जोड़ कर कहा -" धन्य हो ज्ञानी श्रेष्ट श्रीमन !आज आप का दर्शन कर कॄतार्थ हो गया।"
" तो और सुन !"- अपना व्याख्यान क्रम जारी रखते हुए रावण ने कहा --"...जो तू देख रहा है वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...तू स्थूल है ,मैं सूक्ष्म हूँ...स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...जड़ और चेतन में दार्शनिक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...
धीरे-धी्रे सपने में आकॄति बदलने लगी। खडग के कुशाग्र की जगह ’लेखनी ’का अग्रभाग चुभने लगा ।तलवार कलम में परिवर्तित होती नज़र आने लगी।मैने कहा -" अरे मिश्रा तू ...!"
" हा ! हा! हा! हो गया न भ्रमित !अरे मूढ़ मै मिश्रा नहीं रावण हूँ ,रावण।अच्छा अब बोल तलवार बड़ी कि कलम?"
" तलवार"-मैने झट से उत्तर दिया
"कैसे?"-आकॄति ने विस्मयकारी विस्फारित नेत्रों से देखा
"आपात काल में तलवार देख कलम चुप हो गई थी।जब तक तलवार की नोंक चुभ रही थी तो ’स्सर स्सर महाशय मोशाय ’ कर रहा था जब कलम की नोंक चुभी तो ’तू’ पर उतर आया"
"पाठक जरा कलम देना "-मिश्रा ने झकझोर कर जगाया।स्वप्न भंग हो गया।निद्रा टूट गई।अंगडा़ई लेते हुए बोला--’"
और जो सुबह दी थी ,वह क्या हुई"
"पाठकों को चुभाते-चुभाते निब टूट गई"
"असंवेदनशील रूढ़मना पाठकों को चुभाओगे तो निब टूटेगी ही। कलम की नोक पर तलवार की नोक लगा दो..."।
मैने कलम और संग्रह दोनो ही लौटा दिए अपनी सुविधा हेतु। यह ले अपनी लकुटि-कमरिया ,बहुत हि नाच नचायो"
-अस्तु
-आनन्द

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

व्यंग्य 12: समर्पित है ....

एक व्यंग्य : समर्पित है....
पाण्डुलिपि तैयार हो गई। काफी श्रम से लिखा था।दिन को दिन नहीं ,रात को रात नहीं समझा।छ्पास की जल्दी थी।हिंदी का लेखक लिखने में जल्दी नहीं करता ,छपने की जल्दी में रहता है। परन्तु जिस का भय था ,वही हुआ।समर्पण का।संग्रह समर्पित नहीं तो रचना क्या !,कन्या रूचि वदन नहीं तो सजना क्या!दिव्यानन्द की अनुभूति तो रचना समर्पण में है।अन्यथा सारा परिश्रम व्यर्थ।समर्पण हमारी संस्कृति है ,हमारी राष्ट्रीय नीति है,अमेरिका के प्रति समर्पण ,बहुदेशीय कम्पनियों के शर्तों के प्रति समर्पण,कांधार आतंकवादियों के शर्तों के प्रति समर्पण,पाश्चात्य मूल्यों के प्रति समर्पण,गिरते मूल्यों के प्रति समर्पण। ’समर्पण’ही किसी रचना का सार-तत्व है।
अन्यथा ,कहानी लेखन में क्या है? कुछ दाएं-बाएं ,कुछ ऊपर-नीचे देख, विदेशी कहानियाँ पढिये और लिख मारिए हिंदी में। क्या पता चलेगा।’डेज़ी’ को ’दासी’ कर दीजिए,’सैमुअल ’ को ’सोम अली’, ’माईकल’ को ’मुकुल’ । चलेगा ,सब चलेगा हिंदी में। वैसे भी हिंदी का पाठक कौन सा किताब पढता है, खरीद कर पढने का तो प्रश्न ही नहीं। अब तो लेखकीय प्रतियां भी निशुल्क नहीं मिलती।पकड़े गये तो क्या।एक टिप्पणी दे देंगे,कह देंगे भाव उनके हैं तो क्या ,भाषा तो अपनी है .परिवेश तो अपना है।सामाजिक परिस्थितियां तो अपनी है,,संस्कॄति तो अपनी है ।कला-पक्ष तो अपना है ।अनुकरण करना भी तो एक कला है।वैसे सामान्य पाठक से आप निश्चिन्त रहें । यह पकड़ने-धकड़ने का कार्य कुछ विशेष प्रकार के प्राणी करते हैं जिन्हे आलोचक कहते हैं
आप आलोचकों की चिन्ता न करें। उनका कार्य ही है आलोचना करना।बताना कि अमुक कहानी ,किस कहानी की नकल है.। मूल कहानी में नायक कहाँ-कहाँ छींका था जो आप की कहानी में छूट गया है। वह उनकी अपनी शैली है जिसे वह ’खोज परक’ शोध कहते हैं। आप का क्या है । आप ’मास’ के लिए लिखतें हैं ’मासिक" पर लिखते हैं’ । सर्वहारा वर्ग के लिए लिखते हैं तो आलोचकों का क्या बिगड़ता है? वैसे रहस्य की बात बता दूँ। इन छुट भैयो की आलोचना मूलत: अपनी नहीं होती। "होल-सेलर’ से खरीदते हैं और ’रिटेल’ में बेच देते है।अपना-अपना व्यापार है।वह साहित्य की सेवा अपनी विधा में करते हैं ,आप अपनी विधा में करे-नकल विधा में।
हाँ, तो पाण्डुलिपि पूर्ण हुई।रहस्य की बात है कि इन्ही कुछ मिर्च-मसालों से, फार्मूला फिल्म के तरह ,मुम्बईया फिल्म शैली में,कई कहानियाँ ताबड़-तोड़ लिख मारी। संपादकों की ’सखेद-सधन्यवाद ’ कॄपा दॄष्टि से छ्पनी तो थी नहीं। तो सोचा स्वयं ही संग्रह बना छ्पा डालें। अन्तरात्मा नें पीठ ठोंकी ,वाह ! वाह ! क्या अभिनव प्रयोग है ! हिंदी कहानी में ’रूपान्तरवाद"-नकलवाद? इस नवीन वाद का प्रयोग हमारे ही कहानी संग्रह से प्रारम्भ हुआ और इसी से खत्म भी। कहते हैं कोणार्क मन्दिर अपने युग के समकालीन मन्दिरों में सबसे अन्त में निर्मित हुआ था और सबसे पहले ध्वस्त हुआ था । अत: मेरे वाद का कोई नामलेवा न बचा।
अभी प्रस्तावना लिखना शेष था । दूल्हे के सर पर ’सेहरा’ नहीं तो रीता है ,संग्रह प्रस्तावित नहीं तो फ़ीका है।सोचा ,दूर कहाँ जाएं, मुहल्ले में ही एक ’स्वनामधन्य’ ’लपक-प्रतिष्ठित" साहित्यकार हैं,लिखवा लेते हैं ।किसी कालेज़ में हिंदी विभागाध्यक्ष पद पर ’तिष्ठित’ हैं और यह पद उन्होने ’लपक’ कर लिया था।प्रयास करता तो यह प्रस्तावना मैं भी लिख सकता था । मगर अपने मुँह मियां मिठ्ठू कैसे बनता? सामयिक साहित्यकार क्या कहते!।
परन्तु उन तथाकथित महोदय ने जो प्रस्तावना लिखी ,वह भी हमारी शैली में लिखी-नकल प्रधान शैली। प्रतीत होता था सारी उम्र उन्होने कई पुस्तकों की मात्र प्रस्तावना ही पढ़ी होगी और घोंट-घांट कर एक मिश्रण तैयार कर दिया था जो हर रोग में दिया जा सकता था।यदि आप ने कहानी लिखी है तो वह आप की ’काव्य-चेतना’पर प्रकाश डालेंगे।’फैन्टेसी’ लिखी है तो ’यथार्थवाद’ पर। यदि कोई ’रोमान्स-कहानी लिखी है तो प्रस्तावना में आप के मुहल्लेवाली लडकी के प्रेम-प्रसंग की चर्चा कर कहानी में जीवन्तता व प्रासंगिकता स्थापित कर देंगे।ये सिद्धहस्त होते हैं। उन्होने जो प्रस्तावना मेरे संग्रह के लिखी थी उसका दूर-दूर तक कहीं भी, मेरी कहानियों से नैतिक या अनैतिक संबंध नहीं था । पढा़ तो अन्तरात्मा चीत्कार कर उठी-’अरे मूढ पुरूष !कृशन चन्दर के गधे ! कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूढे बन माहि। अरे भद्र पुरूष !जब तू इतनी नकल-प्रधान कहानियां लिख सकता है तो नकल प्रधान प्रस्तावना नहीं लिख सकता क्या? उठ जाग, अन्तस की शक्ति को पहचान,जगा अपनी कुण्डलिनी और कर सत्यानाश हिंदी का....।
मेरी कुण्डलिनी न जगनी थी न जगी।उक्त स्वनामधन्य महापुरुष से प्रस्तावना लिखवाने में जो सुरा-सोम और दो-चार दिन का मध्याह्न व रात्रि भोज पर खर्च हुआ था,आय-व्यय देखते हुए ,उसी प्रस्तावना से काम चलाया।
मगर समर्पण? सोचा अब लौ नसानी ,अब ना नसैहॊं । अब अन्यत्र नहीं जाउँगा। स्वयं ही लिखूँगा ।मगर किसको?? उसको ,उस अंग्रेज़ी लेखिका को ,जिसकी कहानी का रूपान्तर गुप्त रूप से मैनें हिंदी में कर दिया था या उस ’रशियन’ को जिसकी मूल कहानी को हिंदी में क्षत-विक्षत कर दिया था ,या उस चेकोस्लाविक लेखक को जिसकी कहानी का मैने ’मिक्स्ड-चाट’ बना दिया था ।सोचा बहुत सारे "उस" हो गए अत: सभी लेखकों को श्रद्धा व सम्मान देते हुए एक सर्वमान्य सन्तुष्ट शब्द " उसको" समर्पित कर देंगे। अन्तरात्मा ने पुन: दुत्कारा -"अरे आर्य पुत्र ! कुछ तो मौलिक कर ,समर्पण तो मौलिक लिख।
मेरा मौलिकत्व जाग उठा।समस्त मोह माया त्याग कर लिख मारी प्रथम पॄष्ठ पर प्रथम पंक्ति :--
" समर्पित है
अपनी "उसको"
जिसकी प्रेरणा से
यह संग्रह निर्विघ्न निकालना
सम्भव हुआ "
मगर हतभाग्य !न जाने किस दिशा से श्रीमती जी आ टपकीं।प्रथम पॄष्ठे अग्निपात:।पढा़ तो उबल पड़ीं। वाह! वाह ! क्या समर्पण किया है ! कौन है वह ’कलमुही ? सारी रात परेशान करें हमे , रात-रात भर काफ़ी बनाउँ मैं, कलम-दवात लाउँ मैं, बच्चे सुलाउँ मैं और समर्पण किया "उसको"? कौन है कुलच्छ्नी ,हराम....? अरे कॄतघ्नी पुरुष !हमारे तो भाग्य ही खोटे थे जो तुम जैसे ’ कलम-घिसुए’ से शादी हो गई।अरे! तुमसे अच्छा तो वह बनारस वाला दरोगा था । अहा ! क्या जवां मर्द था ! कम से कम ऊपरी आमदनी तो थी ,तुम्हारे जैसा चप्पल तो नही घिसता फिरता था।अरे ! वाह रे हिंदी जगत के प्रेमचन्द! कुछ तो शर्म हया रखी होती इन चश्मीली आँखों में । मुझको समर्पित न करता न सही मगर "उसको" तो न करता......."
श्रीमती जी चीखते-चीखते चिल्लाने लगीं। अन्तिम अस्त्र ,अचूक निशाना।आँखों से अश्रु की धारा ,मुँह से गालियों का (जो उल्लेख करने योग्य नहीं और सभ्य पाठकों के सुनने योग्य नहीं ) पनाला बहता रहा। तत्पश्चात ,उन्होने एक कठोर भीष्म-प्रतिज्ञा की जो प्रसंगानुकूल व समयोचित भी था।
" ऊपर चलते पंखे व नीचे ह्स्त-बेलन को साक्षी मान ,जो भी चर-अचर,कलम-दवात,स्थावर-जंगम,जड़-चेतन, जीव जगत में व्याप्त हैं और वह जन्तु जो उष्ट्रवत सम्प्रति कुर्सी पर बैठा है ,मेरा यह सत्य-वचन सुने।मैं आर्य-पुत्री ,जो भी मेरा नाम हो, एक श्वाँस में घोषणा करती हूँ यदि निकट भविष्य में किसी दूसरी शादी का सुखद सुयोग प्राप्त हुआ तो मैं किसी "कलम-घिसुए" से शादी नहीं करूँगी ....साथ ही यह भी सुने..."
संभवत: निकट भविष्य में उक्त सुखद सुयोग की क्षीण आशा से उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। मैने लाख समझाया स्पष्टीकरण दिया ,स्थिति स्पष्ट की ,परन्तु मेरे इस लप्पो-चप्पो नवनीत लेपन का प्रभाव न पड़ना था ,न पडा़। न मानना था,न मानी।
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पाठकों की जानकारी के लिए ,जिस संग्रह की लेखन नींव ही ऐसी हो ,उसका छपना क्या ,उसका बिकना क्या।प्रकाशक महोदय सारी प्रतियां घर पर पटक गये । और अब मैं आजकल हर मिलने-जुलने वाले आगन्तुक को एक-एक प्रति भेंट कर रहा हूँ-चाय-पानी-नाश्ते के साथ। हानि-लाभ की बात छोड़िए । स्पष्ट हो गया होगा कि यह मेरा प्रथम दुस्साहस व अन्तिम प्रयास है। बकौल बाल स्वरूप ’राही’ जी---

कौन बिजलियों की धमकियाँ सहता
खुद आशियां अपना जला दिया मैंने

॥अस्तु॥


---आनंद पाठक