मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

एक व्यंग्य 106/03: वैलन्टाइन डे-लगा लेना जरा हेलमेट

 एक व्यंग्य : वैलेन्टाइन डे (2023)-लगा लेना ज़रा हेलमेट


वैलेन्टाइन डे फिर आ गया ।  आता है , हर साल आता है । जब आना चाहिए था तब नही आया - जब मैं जवान हुआ करता था। प्रेम क्या है जब समझता था, अब समझने की जरूरत खत्म हो गई।शादी हो गई।

उन दिनों वेलेन्टाइन डे नही आया करता था बल्कि किताबों में फूल और कापियों में चिठ्ठियाँ आया जाया करती थी। सात जनम की कसमें खायी जाती थी।  फ़ेसबुक ह्वाट्स अप इमेल के ज़माने में वह अब सब कहाँ । अब तो ’जीवन प्रमाण-पत्र" की तरह अपने प्रेम प्रमाण पत्र का भी नवीनीकरण कराना पड़ता है साल दर साल। साल में एक दिन --भाई देख मेरा प्रेम ज़िंदा है । 7- जनम क्यों? हर साल ही-  प्रमाण पत्र ले ले -वेलन्टाइन के दिन।

ऐसे ही एक बार श्रीमती जी [अपनी ] को प्रमाण पत्र जमा कर रहा था --भाग्यवान देख सात जनम तक मेरा तेरा--।अभी वाक्य पूरा भी नही हुआ था कि बोल उठी--रहने दे रहने दे-- सातवाँ जनम यही है -- खोज ले अगले जनम की कोई दूसरी 'गाय' ।

 आगे की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए हा हा--ही ही--हो हो - करते हुए धीरे से निकल लिया ।

पिछले महीने माँ सरस्वती की पूजा करने के बाद अब फ़ुरसत मिली । ज्ञान की अधिष्ठात्री देवि --की पूजन तिथि अंगरेजी महीने के हिसाब से  आगे पीछे आती रहती है । मगर वेलेन्टाइन डे -प्रेम दिवस- का -डे  फिक्स-14 फ़रवरी। यही कारण है कि कुछ लोगो को ज्ञान देर-सबेर आगे पीछे आता  है जब की  प्रेम सही समय पर आता है , यदि आप के पास  कोई वेलेन्टाइन हो तो । यह परम पवित्र त्योहार आता भी ऐसे समय है --जब मौसम बसंती होता है , रंग बसंती होता है । खेतों में हरियाली होती है धरती धानी रंग की चूनर ओढ़े रहती  है--बहार का मौसम आने को होता है ,होली की तैयारी होती है। हवाओं में खुशबू घुलने लगती है ।बदन कसमसाने लगता है। अब वैलेन्टाइन डे -ऐसे मौसम में नहीं आयेगा तो क्या जेठ की तपती दुपहरिया में आयेगा।

प्रेम अब ”दर्शन’ की चीज़ नहीं --प्रदर्शन की चीज़ हो गई। तेरे कितने ब्वाय फ्रेंड ?--मेरी इतनी  गर्ल फ़्रेंड।तू कहाँ कहाँ घूमी ? मैं यहाँ यहाँ घूमा। अब सात जनम की बात कहाँ। अब तो 7- महीने  -7 दिन की बात रह गई। बात -आप आप से शुरु होती है फिर तुम-तुम तक आती है और "तू-तड़ाक’ पर आकर खत्म हो जाती है।

 इधर नवजवान लड़के लड़कियाँ ,महीनों पहले तैयारी में लग जाते हैं ,उधर पुलिसवाले और धर्म के ठेकेदार अपनी तैयारी में। इधर 'प्रेम' को बचाना है उधर ’ हिन्दू संस्कृति" को बचाना है -’अपसंस्कृति नही चलेगी। " न हारा है इश्क़, न दुनिया थकी है"  ख़ुमार बाराबंकी साहब वाली स्थिति हो जाती है।

नौजवान तो नौजवान ,सुना है कि आजकल अब ’अंकल लोग" भी इस रोग से पीड़ित हो रहे हैं ।मैं भी।प्रेम एक रोग जो ठहरा। 

और शायर ? शायर कॊ कभी वेलनटाइन डे मनाते नहीं देखा । मनाएगा क्या। असल और सच्चा शायर होगा तो जेब से खाली होगा। नंगा नहाए क्या, निचोड़ेगा क्या। खाली जेब वाले शायर कॊ कौन वेलेन्टाइन पूछती है ।डरती होंगी मुआ--गिफ़्ट तो देगा नहीं --आसमान से चाँद तारे तोड़ के लाने की बात और करेगा। जान खाएगा ऊपर से। 

मगर शायर ? वह तो अपने वलेन्टाइन को अदाऒं से नज़ाकत से लताफ़त से शायरी सुना सुना कर वैलेन्टाइन डे मनाता होगा ।सोचा इस साल हम ही मनाते है - अगरचे--

मैं शायर तो नहीं ..मगर ऐ हसीं जब से देखा तुझको ,मुझको शायरी ----। 

 मेरे अन्दर शायरी वाला कीड़ा कुलबुलाता ज़रूर है। कभी कभी तो ऐसा कुलबुलाने लगता है कि बिन पिये ही मैं अपने आप को ग़ालिब समझने लगता हूँ । समझते तो सभी है मगर कहते नही है।

एक पुरानी वेलन्टाइन को धो-पोंछ कर  ढूँढ निकाली, एक वार्मअप (warm up) शे'र सुनाया--

न रखने हाथ देती हो, झिड़क देती हो तुम हँस कर 

जवानी और चढ़ जाती, मेरी गुल्लो, मेरी शबनम !

मैने कहा -चलो दिलदार चलें-चाँद के पार चलें --यह जालिम ज़माना इस पार्क में वेलेन्टाइन डे मनाने देगा नहीं।

अब मतला सुनाया

इधर दिखती नहीं अब तुम, किधर रहती हो तुम जानम !

चलो मिल कर मनाते हैं ’ वेलनटाइन’ मेरी  छम्मम

- हाय ! मुझे क्या मालूम कि वह भी एक शायरा निकली। नहले शे’र पर दहला शे’र लगाया कि मेरा दिल दहला जो उसने सुनाया

दिया जो हार पिछली बार पीतल का बना निकला

दिला दो 'हार'  हीरे का नहीं दस लाख से हो कम

खड़े हैं प्यार के दुश्मन लगा लेना ज़रा ’हेलमेट’

मरम्मत कर न दें सर का "पुलिसवाले" मेरे रुस्तम ! 

अब एक शायर की इज्जत का सवाल था। जमात का सवाल था -शे'र पर शे'र उठाना था।

-फिर एक शे’र पढ़ा।

ज़माने का नहीं है डर, करेगा क्या पुलिसवाला

अगर तुम पास मेरे हो नहीं दुनिया का है फिर ग़म

   वह कहाँ मानने वाली थी । किसी जमाने में कौवाली मुक़ाबला होता था अब तो यहा शेर (शेरनी) से मुक़ाबला हो रहा है। इससे अच्छा तो मुकाबला चाय की थड़ी पर हो जाता है जब दो तथाकथित शायर मिलते हैं

बता देती हूँ मैं पहले , नहीं जाना तुम्हारे संग

कि बस ’फ़ुचका’ खिला कर ही मना लेते हो तुम मौसम

बात अब ’आप” से ’तु’म’ पर आ गई । तू तड़ाक तक इतनी जल्दी आ जायेगी सोचा नही था। सुबह होने से पहले शाम आ गई

उसने अगला शे’र पढ़ा-

इधर क्या सोच कर आया कि है यह खेल बच्चों का

अरे ! चल हट निकल टकले , नहीं ’पाकिट’ में तेरे दम

-देख दम की बात न कर कहे देता हूँ। मेरा दम अभी देखा नहीं है तूने -हाँ- मैने जोर से बोला

बात ’सैंडिल’ और सैंडिल के दम तक न पहुँच जाए जल्दी जल्दी मकता पढ़ा और सरक लिया

घुमाऊँगा , खिलाऊँगा,  सलीमा भी दिखाऊँगा, 

सनम ’आनन’ का है वादा , चली आ ओ मेरी हमदम !

जान बची तो लाखों पाए--

 उड़ा वहाँ से तो सीधे -"गौशाला"- मे गिरा।

सुना कि कुछ लोग valentine day की जगह इस वर्ष Cow hug Day यानी "गाय गले मिलन दिवस" मना रहे है

सोचा, श्रीमती जी को ही गले लगा कर वेलन्टाइन डे मना लूँ -बहुत दिन हो गए उन्हें Hug [हिंदी में लिखना ज़रा ठीक नहीं लगा]  किए हुए  ।शादी के समय श्वसुर जी ने कहा भी था-- मेरी बेटी बिलकुल गऊ है गऊ- गाय है गाय।

( मगर वह यह बताना भूल गए कि वह सींग भी मारती है)

[ नोट - कथा-सार यह कि

किसी "तथाकथित शायर" को किसी "तथाकथित शायरा" के साथ यूँ सरेआम वेलेन्टाइन डे नहीं मनाना चाहिए )

अस्तु

-आनन्द पाठक-



शनिवार, 10 सितंबर 2022

व्यंग्य 105/02-V : टैग करने वालों से

 एक व्यंग्य 105-V : ---’टैग वालों से’

रेडियो पर गाना बज रहा है। झूठ। आइपैड, आइपोड के ज़माने में रेडियॊ।

अच्छा, तो मोबाइल पर गाना बज रहा है--

"अल्लाह बचाए नौज़वानो से ,

 तौबा है ऐसे इन्सानों से ,

   हाय,अल्लाह बचाए----"


और इधर मैं गा रहा था--

बाते हैं मीठी मीठी , रचना है फीकी फीकी।

कहता हूँ मै सीधे सीधे, कविताएँ उलटी-पुलटी 

अल्लाह बचाए ’टैग वालों ’ से । अल्लाह !

हाय अल्लाह बचाए---


गाना जो भी हो, दर्द एक -सा है। फ़र्क इतना है कि वो गा रही हैं मैं गा रहा हूँ। वह मनचले नौज़वानो से परेशान है और मैं ज्ञानी टैग वालों से ।

"टैग करना" क्या होता है? "शो-रूम" पीढ़ी वाले फ़ेसबुकिया नौज़वान अच्छी तरह जानते होंगे ,

और जो "म्यूजियम मैटिरीयल" वाले लोग है,[जैसे मैं ], तो उन्हे स्पष्ट कर दूँ कि यह एक मानसिक बीमारी है जिसमे आप अपनी रचना को श्रेष्ठ मानते है और-  मान न मान मैं तेरा मेहमान- वाली शैली में।-अपने फ़ेसबुकिया मित्रों के ’वाल ’ पर चेंप देते हैं।गोया आँख में ऊंगली डाल कर बताते है -कि तेरा ध्यान किधर है देख मैं इधर हूँ। यह रचना मेरी देखे, यह पोज मेरा देख ये साड़ी मेरी देख---ब्ला ब्ला ब्ला।  यह एक घातक बीमारी तो नहीं, पातक बीमारी ज़रूर है ।इस बीमारी मेंआदमी ’विक्षिप्त’ भी हो सकता है। तब उसे होश नहीं रहता कि वो किसी के ’वाल’ पर "टैग’कर रहा है कि किस के सर पर ’टैप’ कर रहा है। 

 इस बीमारी में हर वक़्त फ़ेसबुक चेक करते रहना अच्छा लगता है। कितने लाइक आए--कितने कमेन्ट मिले --कितने वाह वाह हुए। कितनो ने मुझे ख़िताब दिया। रात में सोते हुए भी अपनी रचना का ’लाइक’ गिनता है और कमेन्ट पढ़ता है, आह्लादित होता है।

चिकित्सा शास्त्र में इसे ’ फ़ेसबुखेरिया" कहते हैं--मलेरिया --फ़ाइलेरिया --लभेरिया-- की तर्ज़ पर। 

। यह अपने अनुभव से कह रहा हूँ-फ़ेस बुखेरिया-का अनुभव। इस रोग में ’भूख’ नही लगती । बस लाइक गिनने का मन करता है।

-कल एक सज्जन फ़ेसबुक पर विलाप करते हुए मिल गए। उनके कई  फ़ेसबुकिया मित्र है  । हर रोज़ 2-4-10 रचनाएँ टैग कर देते हैं। कचरा फ़ैला देते है। और भाई साहब हैं कि रोज़ सुबह सुबह झाड़ू लेकर अपना ’वाल साफ़’ करते हैंऔर मनोच्चरित गाली भी देते हैं, उन टैग वालो को जो यहाँ उल्लेख करने योग्य भी नहीं। मैने सलाह दिया कि भाई साहब! उन सबको "ब्लाक’ क्यों नहीं कर देते। { पाठको को मैं ज़रा स्पष्ट कर दूँ कि कुछ महिला-मित्रों ,कवयित्रियों   ने मुझे पहले से ही ब्लाक कर रखा है ,मगर वह "टैग" के कारण नहीं।]

भाई साहब कहने लगे- पाठक जी! शरीफ़ आदमी हूँ ,शराफ़त में मारा जाता हूँ। टैग करने वालों  में  नहीं है अपनी तो है । 

फ़ेसबुक पर हर दूसरा आदमी -कवि है .लेखक है, ग़ज़लकार है,साहित्यकार है, साहित्य का  एक्सपर्ट है। ग़ज़ल का एक्सपर्ट है  बस निरन्तर  लिखता रहता है, परन्तु पढ़ता नहीं । न अपना न दूसरों का ।मैं भी ऐसे 2-4 ’टैग वालों ’से पीड़ित हूँ। कई बार मना किया, हाथ जोड़ा, माफ़ी माँगी ,करबद्ध प्रार्थना की। आप  के चरण किधर हैं, प्रभु-भी कई बार पूछा। मगर वह कहाँ माने।

 वो कब बाज़ है मुझे ’टैग’ कर के

 हमी थक गए है मिटाते-मिटाते

 कई बार कहा-भाई साहब माना कि आप , वरिष्ठ कवि है, गरिष्ठ कवि है, शिष्ट कवि हैं. राष्ट्रीय कवि हैअन्तर्राष्ट्रीय कवि है, अन्तरराष्ट्रीय कवि है, इस सदी के महान कवि हैं ,प्रथम कवि है, अन्तिम कवि हैं,हिंदी साहित्य के चाँद हैं सूरज हैं, मगर  मेरी आँख में उँगली डाल डाल कर यह सब क्यूँ बता रहे हैं?जब सूरज आसमान पर चढ़ेगा तो देख लेंगे।

वो कहते हैं --भाई साहब! हम लोगों का मकसद इतना होता है कि आप देखे--मैं बड़ा हुआ तो कितना -- और आप रह गए ठिगना तो कितना।

मैं कहाँ से कहाँ चला आया और तुम ? मैं कितना सनद प्रमाण पत्र बटॊर लाया, और तुम? मैं कितना नारियल फ़ोड़ आया और तू[ 

अब वह तुम से तू पर आ गए- अब वह बड़े कवि हो गए ]

 मैं कितना साल ओढ़ आया और तू ?मैं कितना मुशायरा लूट आया और तू। यह देख मेरी फोटो-"दद्दू" के साथ और तू । यह देख मेरी प्रोफ़ाइल --यह ’बुक’ मेरा देखो-- ये सूट मेरा देखो--ये बूट मेरा देखो --मैं हूँ शायर लंदन का।खैर वह इन्ही सब  में मगन है। हिंदी की सेवा कर रहे हैं । हिंदी कृतार्थ हो रही है । हम आप कौन होते  है उन्हें टोकने वाले -उनके टैग करने पर।

कविता कर के वह खुद न लसे

कविता लसी पा यह ’टैग ’ कला

टैग करने वालों की हालत तो यह है कि --

कल जिसे अपनी कविता सुना कर आया था

उसी के टैग का पत्थर मेरी तलाश में है ।

[ नूर जी से क्षमा याचना सहित]

लोग टैग इसलिए करते हैं कि हमे पता चलता रहे कि ’फ़ेसबुक ’पर आजकल हिंदी का दशा-दिशा क्या चल रही है।

[ नोट ; चलते चलते अपने "टैग करने वाले नौज़वान भाइयॊ से-क्षमा याचना सहित -मजरूह सुल्तानपुरी साहब का शे’र है 


जफ़ा के ज़िक्र पर तुम क्यों सँभल कर बैठ गए

तुम्हारी बात नहीं, बात है ज़माने  की ।

वैसे -जफ़ा करने और टैग करने में कोई फ़र्क नहीं --भाव बरोबर है ]

अच्छा । आज इतना ही। चलते हैं । अभी यह लेख "टैग’ करने जाना है ।

सादर

-आनन्द.पाठक-