सोमवार, 17 जुलाई 2023

हिंदी साहित्य लेखन --शरद जोशी जी की नज़र में---

  हिंदी साहित्य लेखन --शरद जोशी जी की नज़र में---


  मेरे हास्य-व्यंग्य लेखन यात्रा में हिंदी और उर्दू के अनेक व्यंग्यकारों का प्रभाव ज़ रहा जिसमें हिंदी के आ0 [स्व0]  हरिशंकर परसाई जीऔर आ0[स्व0] शरद जोशी का विशेष और उर्दू के  शौक़त थानवी और फ़िक्र तौंसवीं ,पतरस बुखारी आदि लोगों का ज़्यादा प्रभाव रहा है। [यहाँ उन सभी माननीय व्यंगकारों के नाम लिखने से सूची लम्बी हो जायेगी और इस लेख का यह विषय भी नहीं है।]  परिणाम स्वरूप मेरी पहली पुस्तक -शरणम श्रीमती जी -[ व्यंग्य संग्रह] ही छपी। बाद में अन्य व्यंग्य संग्रह भी छपे जैसे --सुदामा की खाट--अल्लम गलाम बैठ निठ्ठलम --रोज़ तमाशा मेरे आगे।

शरद जोशी जी ,के0पी सक्सेना जी और अन्य व्यंग्यकारों ने मिल कर , कवि सम्मेलन और मुशायरों की तर्ज़ पर -मंच से व्यंग्य पढ़ने की एक वाचिक परम्परा शुरु की थी। परन्तु यह कार्यक्रम बहुत दिन तक न चल  सका । आजकल इस परम्परा के ध्वजा वाहक आ0 सम्पत सरल जी[ जयपुर]हैं जो बस नाम से ही ’सरल’ हैं वरना अपने नुकीले पैने और तीक्ष्ण व्यंग्य से लोगों की टांग ही नही, कान भी खीचते है। यहाँ पर उन तमाम व्यंग्यकारों के लेखन शैली का तुलनात्मक अध्ययन की बात नहीं करूँगा.। बस शरदजोशी जी के - पचास साल बाद -शायद -आलेख की चर्चा करूंगा जिसे उन्होने अपनी  एक पुस्तक की भूमिका के रूप में लिखा था जिसमे उन्होने उस समय पचास साल की कैसी कल्पना की थी। जोशी जी कोई भविष्य वक्ता नही थे और न ही कोई ज्योतिषी ही थे। मगर एक समर्थलेखक के रूप में भविष्य द्र्ष्टा अवश्य थे जो आज सिद्ध होती नज़र आ रही है।जोशी जी यह आलेख शायद 1975 में लिखा गया था और उस समय मैं रूडकी विश्वविद्यालय [ अब आई0आई0टी0] से इंजीनियरींग कर रहा था। आज 2023 चल रहा है50 साल पूर होने वाले है । उन्होने पचास पहले क्या लिखा था आप भी इसे 50-साल पहले के संदर्भ में देखे--

"---किताबों की उम्र केवल पचास साल बाक़ी है। उसके बाद किताबों का चलन बन्द हो जाएगा, क्योंकि लोगो के पास ज्ञानवर्धन के वैकल्पिक साधन होंगे।आजकल जो लेखक लिख रहे हैं वो ये सुन कर सन्तुष्ट होंगे कि चलो उनके जीते जी ऐसा नहीं हो रहा। सारा दोष अगली पीढ़ी पर लगेगा, जिनके लिखते लोगों ने पढ़ना बन्द किया ----"

यह बात उन्होने तब कही जब उस समय वैकल्पिक साधन ---इन्टरनेट--फ़ेसबुक--ह्वाट्स अप--त्वीटर --अदबी मंच -फ़ेसबुक-- इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया जैसे प्लेटफ़ार्म नहीं थे --फिर भी उन्होने यह देख लिया। कहते हैं लेखक के जिह्वा पर कभी कभी सरस्वती आ विराजती हैं। हम आप पाठकों के लिए लिखते हैं। वह आगे लिखते है--

"---साहित्यकारों ने पिछले वर्षों में बड़े बड़े ’एन्टी’ आन्दोलन चलाए --अकहानी--अकविता -अनाटक। मगर आगे पाठक ’अपुस्तक’ का अन्दोलन चलाएगा।किताबों के इनकार का आन्दोलन और वह साहित्यकारों को बड़ा भारी पड़ेगा।-----पाठक की उपेक्षा कर लिखना अलग बात है, मगर पाठक की अनुपस्थितिमें लिखना, खाली हाल में नाटक खेलने के समान भयावह है। यदि ऐसा हुआ तो हिंदी के लेखक कवियॊ का क्या होगा।-----

क्या आप को नहीं लगता कि इस बात में कितनी सच्चाई है।आज कितने मंच खुल गए सोशल मीडिया पर। हर कोई लिख रहा हर कोई छप रहा है हर कोई विभिन्न मंचों से सम्मानित हो रहा है पुरस्कार स्वरूप सर्टीफ़ाई भी हो रहा है मगर  उसे हर बार यह स्वयं बताना पड़ता है कि मैं यहाँ छपा--मैं वहां छपा--ये फोटो मेरी देखो--ये सर्टिफ़िकेट मेरा देखॊ--। जोशी जी आगे अपनी व्यथा का विस्तार देते हुए लिखते हैं--

"--किताबें छपती नहीं, छपती हैं तो बिकती नहीं., बिकती हैं तो पढ़ी नहीं जातीं पढ़ी जाती हैं तो वे पसन्द नहीं की जाती, पसन्द की जाती हैं तो सस्ती और सतही होती है जिन्हें न छापा जाए उसकी बड़ी संख्या है जो उसे पुस्तक ही नहीं मानते हैं।यहाँ लेखक और प्रकाशक पुस्तक नहीं, पुस्तक का भ्रम जीते हैं।पाँच सौ का संस्करण छपने पर पाँच-छह वर्ष में बिकता है, तब लगता है व्यर्थ ही छपा। कोरा कागज होता तो कहीं जल्दी बिक जाता। लेखक लिखने को अभिशप्त है,प्रकाशक छापने को,। केवल पाठक की स्वतन्त्र सत्ता है। वह खरीदने को अभिशप्त नही----।

क्या आप को नहीं लगता कि आज से पचास साल पहले कही गई ये सब बातें आज कितनी प्रासंगिक है? क्या आप को नहीं लगता कि अब आत्मावलोकन,विचार विमर्श का समय  आ गया है। कुछ भी लिख देना साहित्य नहीं होता। साहित्य के नाम पर मंच पर तमाशा दिखाना ,साहित्य साधना नहीं होती।क्या जाने अनजाने हम इस भीड़ का हिस्सा नहीं बन रहे हैं। जोशी जी ने और भी बहुत से बातें कहीं--सभी का यहाँ उल्लेख करना उचित नहीं ज़रूरत भी नहीं।क्या हिंदी में साहित्य लेखन हाशिया गतिविधि है, फ़ुरसत का धन्धा है?यदि आप साहित्य साधक है , साहित्य प्रेमी साहित्यानुरागी हैं तो इन सब विषयों पर आप भी सोचिए अन्यथा जैसे चल रहा है चलने दीजिए।

अस्तु


-आनन्द पाठक-


मंगलवार, 27 जून 2023

एक व्यंग्य 108/05 : चिड़िया और दाना

 


चिड़िया और दाना 


माँ बचपन में यह किस्सा  सुना सुना कर मुझे सुलाती थी , आज वही किस्सा आप लोगों को 

सुना सुना कर जगा रहा हूँ। किस्सा कोताह यूँ कि----]


---इन्द्रप्रस्थ प्रदेश में एक चिड़िया रहती थी । उसे कहीं से चने का एक दाना मिला। उस दाने से वह चने का दाल बनाना

चाहती थी। उससे उसे चक्की [ चाकी ] में डाल कर पीसा मगर न चना ही बाहर आया न दाल ही बाहर आई ।

उसे लगा कि वह दाना चक्की के  ’खूटें"  में फँस गया है। अत: उसे निकलवाने के लिए बढ़ई के पास गई ।

उसने बढ़ई से कहा-


" बढ़ई ! बढ़ई ! तू खूँटा चीरा. खूँटवे में दाल बा

का खाइब ? का पीयब? का ले परदेश जाइब ?


[ अर्थात हे बढ़ई ! तू चल कर मेरा खूँटा चीर दे। उस खूंटे में मेरी दाल फँसी है --नहीं तो में क्या "खाऊँगी" क्या "पीउँगी"

और क्या ले कर परदेश जाउँगी ?

बढ़ई ने टका सा जवाब दिया--तू अभी जा। मैं अभी 2024 के एजेन्डे में बिजी हूँ--वह  मेरा एजेन्डा नहीं है -- तेरा एजेन्डा है

चिड़िया दुखी मन से बाहर आ गई. और  उस बढ़ई की शिकायत करने राजा के पास पहुँच गई।

उसने राजा से कहा-


राजा राजा तू बढ़ई डाँटा ,

बढ़ई  नू खूँटा चीरे. खूँटवे में दाल बा

का खाइब ? का पीयब? का ले परदेश जाइब ?

[अर्थात------]

राजा ने कहा-- तू अभी जा।  हम  अभी  किसी और एजेन्डे में बिजी हैं। वह मेरा एजेन्डा नहीं--  तेरा एजेन्डा है। जब तेरा एजेन्डा

’राज दरबार ’ ’राजसभा’ में आएगा तब देखेंगे----


चिड़िया दुखी मन से सड़क पर आ गई और चिल्लाने लगी--

" सब मिले हुए  हैं जी , सब मिले हुए है । अन्दर से सब मिले हुए हैं ।सब मेरी दाल  चुराना चाहते है-- मेरी दाल निकलेगी नहीं तो बनेगी कैसे? दाल गलेगी कैसे?

---  ---  -- 


किस्सा खतम -पैसा हजम।

सन्दर्भ ? जो समझ लें


-आनन्द.पाठक-


सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

एक व्यंग्य 107/04 : सर्टिफिकेट की रेवड़ी

 एक व्यंग्य व्यथा : सर्टिफ़िकेट की रेवड़ी

’फेसबुक’ और ’ह्वाट्सअप’ के प्रादुर्भाव से एक फ़ायदा जरूर हुआ। लोगों की शिकायते दूर हो गईं कि हिंदी में उच्च लेखन कार्य नही हो रहा है। पाठक नही मिल रहे हैं। अब तो न लेखको की कमी है न पाठको की, न वाह वाह करने वालों की। न कवियों की न श्रोताओं की, न शायरों की न शायरा की । अब हर शख़्स यहाँ शायर हो गया कवि हो गया।--एक ढूंढों हज़ार मिलते हैं। जिनको नहीं दिखते उनको ये लोग आंख में उँगली डाल डाल कर दिखा देते हैं अरें भाई देखो मैं इधर हूँ ,इस पत्रिका में छपा हूँ, इस मंच पर काव्यपाठ कर रहा हूँ--उस मंच पर काव्यपाठ करने जा रहा हूँ। आइएगा ज़रूर। इस मंच से सम्मानित हुआ ,उस मंच से ’सर्टिफ़िकेट मिला। सूरज उग रहा है. आप को दिख नहीं रहा है तो मैं क्या करूँ ? मैं यहाँ हूँ।
आ0 गोपाल प्रसाद व्यास जी [एक कवि] ने एक बार कहा था--
कविता करना है खेल सखे!
जो चाहे इसमे चढ़ जाए , यह बे टी0टी0 की रेल सखे
कविता करना है खेल सखे !
-हाय कितने दूरदर्शी थे-दद्दा।
अब तो कविता क्या --फेसबुक और ह्वाट्सअप -पर ग्रुप बनाना समूह बनाना -- मंच बनाना --कितना आसान हो गया है खेल हो गया है। जो चाहे सो बना ले।जब चाहें तब बना लें। -अदब-ग़ज़ल--सुखन--कविता--गीत -के आगे पीछे कुछ एक दो शब्द ही तो लगाना है- राष्ट्रीय -अन्तरराष्ट्रीय-वैश्विक--कुछ भी -लगा देंगे।मंच तैयार। सदस्यों का क्या । जहाँ खोमचा लगा लेंगे--दो-चार-दस-बीस ग्राहक तो मिल ही जाएंगे।
-" कुछ करते क्यों नहीं ?--मिश्रा जी ने आते ही आते उचारा।
जो पाठकगण, मिश्रा जी के बारे में नहीं जानते हैं उन्हे संक्षेप में बता दूँ। वह मेरे साहित्यिक मित्र हैं जो मेरे हर व्यंग्य कथा में टपक पड़ते हैं जैसे के0पी0 सक्सेना जी की कथा में एक "मिर्जा" साहब आ जाया करते थे। मिश्रा जी मेरे लिए ’संकट सूचक’ भी होते है और "संकट मोचक" भी। कभी वह मेरे लिए संकट ले कर आते हैं कभी संकट मोच के आते है । इस बार ख़ुदा जाने क्या ले कर आए हैं।
-कुछ करते क्यों नहीं ?--पुन: दुहराया
’क्या करूँ जी ? मैने भी केजरीवाल जी की शैली में बड़े भोलेपन से पूछा।
अरे मुफ़्त की रेवड़ी -सर्टिफ़िकेट की रेवड़ी- बँट रही है -कुछ बटोरते क्यों नहीं। तुम तो पैदाइशी ’मुफ़्तखोर’ हो।
सोचा, बात तो सही कह रहा है बन्दा । ’बाथरूम’ में ही अपनी ग़ज़लें गाता रहूंगा तो ’ग़ालिब’कब बनूंगा? सर्टिफ़िकेट कब बटोरूँगा? दुनिया मुझे शायर कब मानेगी? बिना सर्टिफ़िकेट के कौड़ी के तीन ही रह जाएंगे। जल बिन मीन हो जाएँगे, श्रीहीन हो जाएँगे। लोग आगे निकल जाएँगे मैं क़लम ही घिसता रह जाऊँगा । हे मूढ़मते आनन्द! --जल्द कुछ अपने लिए सर्टिफ़िकेट-काव्य शिरोमणि-ग़ज़ल श्री-कविता गौरव-दोहा-पहलवान की व्यवस्था कर। शुभस्य शीघ्रम।अन्यथा इस असार संसार से बिना एक अदद 'सर्टिफिकेट' लिए ही 'टें' बोल जाएगा।
आत्मा की पुकार पर एक साहित्यिक मंच के कार्यालय में घुस गया ।रजिस्टर्ड मंच था --देखा 4-आदमी कुर्सी लगा कर बैठे थे ।अध्यक्ष -सचिव-संयोजक- एडमिन रहे होंगे। समवेत स्वर में स्वागत हुआ--आइए आइए पाठक जी स्वागत है । कुछ नया लिखा है तो सुनाइए कान तरस गए आप से कुछ नया सुनने को। सदियाँ बीत गईं।
मैने श्रद्धा से सर झुका लिया --हाँ हाँ ज़रूर ज़रूर । यहाँ आते आते रिक्शे पर ही एक नया शे’र हुआ -इंशाअल्ला यहाँ बैठे बैठे पूरी ग़जल भी हो जाएगी-सुनें ।
-इरशाद--इरशाद-- --
ज़रूरत थी, ज़रूरत है, ज़रूरत होगी--
वाह वाह ! वाह वाह -ऎडमिन साहब कुर्सी से उछल पड़े --क्या मिसरा है --सामयिक है। नए रंग का मिसरा है हर शख़्स को ज़रूरत है --रोटी कपड़ा मकान की
पाठक जी अब रुला ही देंगे क्या !
सचिव जी ने एक लम्बी आह भरी --सही कह रहे हैं पाठक जी ,
ज़रूरत है ज़रूरत है-जरूऽरत है--श्रीमती की , कलावती की --सेवा करे जो-पति की-किशोर कुमार ने भी गाया है-
-'इसीलिए कहता हूँ कि आप तो कम से कम शादी कर लीजिए--मेरा क्या-' अध्यक्ष महोदय ने उससे भी एक लम्बी और ठंडी आह भरी ।
परम्परानुसार मैने मिसरा दुहराया--"ज़रूरत थी ज़रूरत है ज़रूरत होगी-"-
वाह !क्या मिसरा कहा है। तीनो काल भूत--वर्तमान--भविष्य को एक ही मिसरा में समेट दिया--गागर में सागर भर दिया ।वैसे ये कौन सी बह्र है बाई द वे? -अध्यक्ष महोदय ने जानना चाहा।
अरे सर बह्र को मारिए गोली। तेल देखिए तेल की धार देखिए। आम खाने से मतलब है कि पेड़ गिनने से। बहर- वहर फ़ालतू लोगों के चोंचले हैं। अपुन तो भाव देखते हैं भाव की गूढ़ता देखते हैं-वाह वाह। मिसरा सानी पढ़िए पाठक जी! आगे पढ़िए । मिसरा सानी
मैने दूसरा मिसरा सुनाया--"एक अदद ’सर्टिफिकेट; की चाहत होगी"
वाह वाह वाह वाह क्या मिसरा सानी लगाया - वाह क्या क़ाफ़िया मिलाया --ज़रूरत का क़ाफ़िया --चाहत !नया क़ाफिया है वाह ।क्या साफ़गोई है --अब ऐसे साफ़ साफ़ बोलने वाले शायर मिलते कहाँ है -संयोजक महोदय ने मिसरा का भाव बताया-यानी
ज़रूरत थी ज़रूरत है ज़रूरत होगी--
एक अदद ’सर्टिफिकेट; की चाहत होगी
----सचिव जी! ज़रा ड्राअर के कोने कतरे देखना कोई सर्टीफिकेट-वर्टिफिकेट बचा है क्या ? अध्यक्ष जी ने पूछा
सचिव जी ने देखा। - सर एक सर्टिफिकेट बचा है--इस माह के श्रेष्ठ ग़ज़लकार -वाला।
-ठीक है। वही दे दो।
उन्होने जल्दी जल्दी नाम भरा हुआ सर्टिफिकेट मुझे सौंप दिया ? मैं गदगद हो हृदय तल से आभार प्रगट किया।
- सर मेरा नाम इस पर पहले से?-मैने आश्चर्य से पूछा।
हाँ हाँ मुझे मालूम था -एडवान्स में लिख कर रखा होगा-अध्यक्ष महोदय ने हंसते हुए कहा-
इक दिन तुम ज़रूर इधर आओगे
मयख़ाने से बच कर कहाँ जाओगे
---- मैं ’रेवड़ी’ ले कर बाहर निकल ही रहा था कि अध्यक्ष महोदय ने पीछे से आवाज लगाई
-- अरे पाठक जी ! सूखे सूखे !- हें हें हें -- देखिए "दान-पेटी' कुछ उदास दिख रही है । पेटी के भी " पेट" होते हैं--
दान पेटिका उदास है
आप से कुछ आस है
कुछ विमोचन कर दें
आप के जो पास है
आप तो जानते ही हैं कि ग्लासी पेपर , उस पर डिजाइन बनवाने का खरचा, फिर उसका कलर ”जीराक्स’ आजकल सब कुछ कितना मँहगा हो गया --चलिए आप से आप का नाम लिखने का कुछ नही लेते--मगर--
मैने जल्दी जल्दी दान पात्र में 'गुप्त दान' किया और चला आया -गुप्तदान महादान ।. न दुनिया को पता न पाठकगण को कि मैने कितना डाला।
ले कर 'रेवड़ी' घर को धाए।
दुनिया को हम नज़र तो आए--
जब तक आप लोग कुछ हिंदी साहित्य की दशा-दिशा सोचें - इस सर्टिफिकेट को ज़रा और लोगों को "टैग’ कर के आता हूँ --कि ले अब तू देख।
अस्तु
-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

एक व्यंग्य 106/03: वैलन्टाइन डे-लगा लेना जरा हेलमेट

 एक व्यंग्य : वैलेन्टाइन डे (2023)-लगा लेना ज़रा हेलमेट


वैलेन्टाइन डे फिर आ गया ।  आता है , हर साल आता है । जब आना चाहिए था तब नही आया - जब मैं जवान हुआ करता था। प्रेम क्या है जब समझता था, अब समझने की जरूरत खत्म हो गई।शादी हो गई।

उन दिनों वेलेन्टाइन डे नही आया करता था बल्कि किताबों में फूल और कापियों में चिठ्ठियाँ आया जाया करती थी। सात जनम की कसमें खायी जाती थी।  फ़ेसबुक ह्वाट्स अप इमेल के ज़माने में वह अब सब कहाँ । अब तो ’जीवन प्रमाण-पत्र" की तरह अपने प्रेम प्रमाण पत्र का भी नवीनीकरण कराना पड़ता है साल दर साल। साल में एक दिन --भाई देख मेरा प्रेम ज़िंदा है । 7- जनम क्यों? हर साल ही-  प्रमाण पत्र ले ले -वेलन्टाइन के दिन।

ऐसे ही एक बार श्रीमती जी [अपनी ] को प्रमाण पत्र जमा कर रहा था --भाग्यवान देख सात जनम तक मेरा तेरा--।अभी वाक्य पूरा भी नही हुआ था कि बोल उठी--रहने दे रहने दे-- सातवाँ जनम यही है -- खोज ले अगले जनम की कोई दूसरी 'गाय' ।

 आगे की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए हा हा--ही ही--हो हो - करते हुए धीरे से निकल लिया ।

पिछले महीने माँ सरस्वती की पूजा करने के बाद अब फ़ुरसत मिली । ज्ञान की अधिष्ठात्री देवि --की पूजन तिथि अंगरेजी महीने के हिसाब से  आगे पीछे आती रहती है । मगर वेलेन्टाइन डे -प्रेम दिवस- का -डे  फिक्स-14 फ़रवरी। यही कारण है कि कुछ लोगो को ज्ञान देर-सबेर आगे पीछे आता  है जब की  प्रेम सही समय पर आता है , यदि आप के पास  कोई वेलेन्टाइन हो तो । यह परम पवित्र त्योहार आता भी ऐसे समय है --जब मौसम बसंती होता है , रंग बसंती होता है । खेतों में हरियाली होती है धरती धानी रंग की चूनर ओढ़े रहती  है--बहार का मौसम आने को होता है ,होली की तैयारी होती है। हवाओं में खुशबू घुलने लगती है ।बदन कसमसाने लगता है। अब वैलेन्टाइन डे -ऐसे मौसम में नहीं आयेगा तो क्या जेठ की तपती दुपहरिया में आयेगा।

प्रेम अब ”दर्शन’ की चीज़ नहीं --प्रदर्शन की चीज़ हो गई। तेरे कितने ब्वाय फ्रेंड ?--मेरी इतनी  गर्ल फ़्रेंड।तू कहाँ कहाँ घूमी ? मैं यहाँ यहाँ घूमा। अब सात जनम की बात कहाँ। अब तो 7- महीने  -7 दिन की बात रह गई। बात -आप आप से शुरु होती है फिर तुम-तुम तक आती है और "तू-तड़ाक’ पर आकर खत्म हो जाती है।

 इधर नवजवान लड़के लड़कियाँ ,महीनों पहले तैयारी में लग जाते हैं ,उधर पुलिसवाले और धर्म के ठेकेदार अपनी तैयारी में। इधर 'प्रेम' को बचाना है उधर ’ हिन्दू संस्कृति" को बचाना है -’अपसंस्कृति नही चलेगी। " न हारा है इश्क़, न दुनिया थकी है"  ख़ुमार बाराबंकी साहब वाली स्थिति हो जाती है।

नौजवान तो नौजवान ,सुना है कि आजकल अब ’अंकल लोग" भी इस रोग से पीड़ित हो रहे हैं ।मैं भी।प्रेम एक रोग जो ठहरा। 

और शायर ? शायर कॊ कभी वेलनटाइन डे मनाते नहीं देखा । मनाएगा क्या। असल और सच्चा शायर होगा तो जेब से खाली होगा। नंगा नहाए क्या, निचोड़ेगा क्या। खाली जेब वाले शायर कॊ कौन वेलेन्टाइन पूछती है ।डरती होंगी मुआ--गिफ़्ट तो देगा नहीं --आसमान से चाँद तारे तोड़ के लाने की बात और करेगा। जान खाएगा ऊपर से। 

मगर शायर ? वह तो अपने वलेन्टाइन को अदाऒं से नज़ाकत से लताफ़त से शायरी सुना सुना कर वैलेन्टाइन डे मनाता होगा ।सोचा इस साल हम ही मनाते है - अगरचे--

मैं शायर तो नहीं ..मगर ऐ हसीं जब से देखा तुझको ,मुझको शायरी ----। 

 मेरे अन्दर शायरी वाला कीड़ा कुलबुलाता ज़रूर है। कभी कभी तो ऐसा कुलबुलाने लगता है कि बिन पिये ही मैं अपने आप को ग़ालिब समझने लगता हूँ । समझते तो सभी है मगर कहते नही है।

एक पुरानी वेलन्टाइन को धो-पोंछ कर  ढूँढ निकाली, एक वार्मअप (warm up) शे'र सुनाया--

न रखने हाथ देती हो, झिड़क देती हो तुम हँस कर 

जवानी और चढ़ जाती, मेरी गुल्लो, मेरी शबनम !

मैने कहा -चलो दिलदार चलें-चाँद के पार चलें --यह जालिम ज़माना इस पार्क में वेलेन्टाइन डे मनाने देगा नहीं।

अब मतला सुनाया

इधर दिखती नहीं अब तुम, किधर रहती हो तुम जानम !

चलो मिल कर मनाते हैं ’ वेलनटाइन’ मेरी  छम्मम

- हाय ! मुझे क्या मालूम कि वह भी एक शायरा निकली। नहले शे’र पर दहला शे’र लगाया कि मेरा दिल दहला जो उसने सुनाया

दिया जो हार पिछली बार पीतल का बना निकला

दिला दो 'हार'  हीरे का नहीं दस लाख से हो कम

खड़े हैं प्यार के दुश्मन लगा लेना ज़रा ’हेलमेट’

मरम्मत कर न दें सर का "पुलिसवाले" मेरे रुस्तम ! 

अब एक शायर की इज्जत का सवाल था। जमात का सवाल था -शे'र पर शे'र उठाना था।

-फिर एक शे’र पढ़ा।

ज़माने का नहीं है डर, करेगा क्या पुलिसवाला

अगर तुम पास मेरे हो नहीं दुनिया का है फिर ग़म

   वह कहाँ मानने वाली थी । किसी जमाने में कौवाली मुक़ाबला होता था अब तो यहा शेर (शेरनी) से मुक़ाबला हो रहा है। इससे अच्छा तो मुकाबला चाय की थड़ी पर हो जाता है जब दो तथाकथित शायर मिलते हैं

बता देती हूँ मैं पहले , नहीं जाना तुम्हारे संग

कि बस ’फ़ुचका’ खिला कर ही मना लेते हो तुम मौसम

बात अब ’आप” से ’तु’म’ पर आ गई । तू तड़ाक तक इतनी जल्दी आ जायेगी सोचा नही था। सुबह होने से पहले शाम आ गई

उसने अगला शे’र पढ़ा-

इधर क्या सोच कर आया कि है यह खेल बच्चों का

अरे ! चल हट निकल टकले , नहीं ’पाकिट’ में तेरे दम

-देख दम की बात न कर कहे देता हूँ। मेरा दम अभी देखा नहीं है तूने -हाँ- मैने जोर से बोला

बात ’सैंडिल’ और सैंडिल के दम तक न पहुँच जाए जल्दी जल्दी मकता पढ़ा और सरक लिया

घुमाऊँगा , खिलाऊँगा,  सलीमा भी दिखाऊँगा, 

सनम ’आनन’ का है वादा , चली आ ओ मेरी हमदम !

जान बची तो लाखों पाए--

 उड़ा वहाँ से तो सीधे -"गौशाला"- मे गिरा।

सुना कि कुछ लोग valentine day की जगह इस वर्ष Cow hug Day यानी "गाय गले मिलन दिवस" मना रहे है

सोचा, श्रीमती जी को ही गले लगा कर वेलन्टाइन डे मना लूँ -बहुत दिन हो गए उन्हें Hug [हिंदी में लिखना ज़रा ठीक नहीं लगा]  किए हुए  ।शादी के समय श्वसुर जी ने कहा भी था-- मेरी बेटी बिलकुल गऊ है गऊ- गाय है गाय।

( मगर वह यह बताना भूल गए कि वह सींग भी मारती है)

[ नोट - कथा-सार यह कि

किसी "तथाकथित शायर" को किसी "तथाकथित शायरा" के साथ यूँ सरेआम वेलेन्टाइन डे नहीं मनाना चाहिए )

अस्तु

-आनन्द पाठक-