मंगलवार, 2 जून 2009

व्यंग्य 006 -V: बड़े साहब का बाथरूम ... ....

व्यंग्य 006-V : बड़े साहब का बाथरूम

ट्रिन ! ट्रिन !-टेलीफोन की घंटी बजी 'हेलो !हेलो! ,बड़े साहब हैं?""आप कौन बोल रहे हैं?": आफिस से बड़ा बाबू बोल रहा हूँ "" तो थोडी देर बाद फोन कीजिएगा ,साहब बाथरूम में है " बड़ा बाबू का माथा ठनका रामदीन तो कह रहा था की साहब आज घर पर ही है तो वह बाथरूम में कब घुस गए हूँ ! साहब लोगों के बाथरूम भी क्या चीज़ होती होगी होती होगी कोई चीज़ मस्त-मस्त हमें क्या! 'बाथरूम' का यदि शब्दश: हिंदी रूपान्तर किया जाय तो अर्थ होता है -'स्नान-घर' परन्तु जो बात अंग्रेजी के 'बाथरूम' में होता है वह हिंदी के 'स्नान-घर में नहीं "बाथरूम" शब्द से एक अभिजात्य वर्ग का बोध होता है -टाइल्स लगी हुई दीवार ,मैचिंग करते हुए बेसिन ,शीशे- सी चमकती हुई फर्श ,हलकी-हलकी फैली हुई गुलाब की खुशबू की जो कल्पना 'बाथरूम ' से उभरती है वह चिथड़े गंदे टंगे परदे हिंदी के स्नान-घर से नहीं।ज्ञातव्य है की साहब लोगों के बाथरूम में मात्र स्नान कर्म ही नहीं होता अपितु 'नित्य-कर्म' का निपटान भी होता है. जन साधारण के लिए 'साहब बाथरूम में है " का सामान्य अर्थ होता है कि साहब 'दैनिक-निपटान-क्रिया ' में व्यस्त हैं. उस दिन श्रीमती जी एक सहेली आई थीं .गोद में ६ महीने का एक बच्चा भी था.थीं तो 'भृगु-क्षेत्र' (बलिया) की परन्तु जब से रांची आई है इधर दो-चार अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करना सीख रही हैं.वह अंग्रेजी भी भोजपुरी शैली में बोलती हैं उदाहरणत: -'जानती हैं भाभी जी इस्कूल-उस्कूल में पढाई-लिखाई नहीं होती हैं न ,गौरमिंट के इम्प्लाई है सब टीउशनवे में मन लगता है उस दिन सोफे पर बच्चे ने सू-सू कर दिया ,बेचारी सकुचा गई '....लो लो लो राजा बाबा ने सोफे पर "बाथरूम' कर दिया ना॥ना..ना.. तब मुझे बाथरूम शब्द का एक और व्यापक अर्थ मिला सत्य भी है- शब्द वही जो श्रोता को अपना अभीष्ट अर्थ सम्यक प्रेषित करे एक घंटे पश्चात ,बड़े बाबू ने पुन: फोन किया /घंटी बजी ,किसी ने टेलेफोन उठाया बोला-'अरे! कह दिया न साहब बाथरूम में है ' थोडी देर बाद टेलीफोन कीजिएगा ...'बड़े बाबू सोचने लगे कि यह साहब लोग भी क्या चीज़ होते है ,हमेशा बाथरूम में ही बैठे रहते हैं 'बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया सत्य भी है बड़े बाबू को साहब लोगो के बाथरूम कि कल्पना भी नहीं होगी .होती भी कैसे? गाँव-गिरांव में ऐसे बाथरूम तो होते नहीं.उस कार्य के लिए वहां खेत है ,मैदान है .नीचे खुली ज़मीन है ऊपर आसमान है और शहर में? एक अदद सरकारी क्वार्टर है जिसमे मात्र एक बाथरूम है बाथरूम भी इतना छोटा कि मात्र 5 मिनट में दम घुटने लगता है .अत: जल्दी बाहर आ जाते है दियासलाई का डिब्बा भी उनके बाथरूम से बड़ा होता है. बकौल बशीर साहेब :-'पाँव फैलाऊं तो दीवार से सर लगता है' यही कारण है कि छोटे कर्मचारी बाथरूम में कम ही पाए जाते है. यह बात अन्य है कि उचित रख-रखाव व अनुरक्षण के अभाव में पूरा का पूरा कमरा ही बाथरूम नज़र आता है मगर साहब लोगो का बाथरूम ? जितना बड़ा साहब उतना बड़ा बाथरूम .अगर श्रेणी चार का आवास है तो २ बाथरूम ,श्रेणी 5 का आवास है तो ३ बाथरूम .अगर निजी आवास है तो कई बाथरूम .हो सकता है कई कमरें में संलग्न बाथरूम हो.जितने बाथरूम होते है उतनी ही दुर्गन्ध फैलती है .ऐसे ही लोग समाज में ज्यादा गंध फैलाते है.कभी यह घोटाला ,कभी वह घोटाला.पास बैठेंगे तो विचारों से भी दुर्गन्ध आती है.फिर बड़ी शान से बताते हैं कि कैसे वह 'रिंद के रिंद रहे सुबह को तौबा कर ली 'क्या बिगाड़ पाई सी०बी०आइ० ,कोर्ट-कचहरी या व्यवस्था ?सूना है हिरोइनों के बाथरूम काफी बड़े व महंगे होते है.लाखो रुपये कि तो इतालियन मार्बल ही लगी रहती है चाहे तो आप अपना चेहरा भी देख सकते हैं बशर्ते कि काले धन से आप का चेहरा काला न हो गया हो एक बार पढ़ा था कि अमुक हिरोइन के बाथरूम के जीर्णोध्दार मात्र में उस ज़माने में १० लाख का खर्च आया था .अब यह बात डिब्बी वाले बाथरूम के बड़ा बाबू क्या समझेंगे !वर्मा जी ने अपना बाथरूम बहुत बड़ा बनवाया था .आयकर विभाग में अधिकारी थे .उन्होंने संगमरमरी फर्श के अतिरिक्त काफी साज-ओ-सामान लगवा रखा था .गर्म पानी केलिए गीजर, ठंडे पानी के लिए फ्रिज ,केबुल टी०वी० ,एक बुक-स्टैंड ,कुछ पत्रिकाएँ ,कुछ किताबें ,एक कोने में एक सोफा भी डाल रखा था सुबह ही सुबह अपना मोबाईल फोन व समाचार पत्र लेकर बाथरूम में जो घुसते तो दो घंटे बाद ही निकलते .समाचार भी पढ़ते तो पत्र का नाम -पता-अंक-वर्ष- प्रकाशन संस्करण से लेकर प्रकाशक-मुद्रक तक पढ़ डालते थे एक अधिकारी थे शर्मा जी . किसी राज्य स्तरीय घोटाले में लिप्त थे .सोचते थे मेरे घोटाले से वर्मा का घोटाला ज्यादा सफ़ेद क्यों.? मेरे बाथरूम से वर्मा का बाथरूम बड़ा क्यों? क्यों वर्मा ने बाथरूम में केबुल टी०वी० फ्रिज टेलीफोन लगा रखा है ? स्साले का बाथरूम न हुआ ड्राइंग रूम हो गया अत: शर्मा जी ने 'बाथरूम ' को बड़ा करने के बजाय बाथरूम को ही अपने ड्राइंग रूम में लेते आये.अब उनका दीवान भी समंजित हो गया .आत्म-तुष्टि हो गई .उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह पहले से ज्यादा स्पष्ट नंगा नज़र आने लगे.पूछने पर कहते हैं '...हमने तो छुप-छुपा कर ही घोटाला किया था परन्तु यह सी०बी०आइ० वालों ने नंगा कर दिया .अब बचा ही क्या है छुपाने के लिए ? और बाथरूम में तो यूँ ही सब नंगे होते है .मेरा ड्राइंग रूम ही मेरा बाथरूम है.कितना बड़ा है मेरा बाथरूम ...." और उन्हें मन ही मन अपने बड़े होने का एहसास होने लगा शायद इसी कारण उनकी सोच ,उनके विचारों में दूषित गंध है उन्हें पता नहीं है.वह स्वस्थ समाज की सुगन्धित हवाओं से परिचित क्यों नहीं हैं.वह अपनी दुर्गन्ध को ही सुगंध मानते हैं.सूअरों को गन्दगी का एहसास नहीं होता .शायद ऐसे ही जगहों पर लोट-पोट कर आनंद प्राप्त होता है.ऐसे लोगो का आतंरिक सौन्दर्य बोध व चेतना मर जाती है.फिर वह बाथरूम के भीतर नंगे हों या बाहर नंगे हो ,अंतर नहीं पड़तासाहब लोग बाथरूम में करते क्या है? बाथरूम में सभी 'दैनिक-क्रिया' का निपटान ही करते हैं /किसी को यह 'निपटान 'जल्दी हो जाता है किसी को विलंब से बड़ा साहब है तो बडा समय लगेगा. गरीबो को तो खाने के ही लाले पड़े रहते है क्या खाए ?,क्या निकाले ?आफिस के बाबू किरानी को तो साग-सब्जी पर ही संतोष करना पड़ता है .पेट में कुछ है ही नहीं तो खायेगा क्या निकालेगा क्या. अत: 5 मिनट में ही निवृत हो कर बाहर आ जाता है और बड़ा साहब ! बड़ा साहब-बड़ा पेट वह खाता है मांस-मछली,मुर्ग-मुस्सलम ,चिली-चिकेन,चिकेन-बिरयानी,.... वह पीता है बीयर,व्हिस्की अगर इस से भी तुष्टि नहीं मिलती तो खाता है चारा ,अलकतरा ,शेयर तोप,पनडुब्बी ,टेलीफोन यूंरिया ,.. इस से भी आगे खाता है गरीबो के मुंह का निवाला ,सड़क,मकान,पुल के ठेके .दूकान के ठेके ,अगर मौका मिला तो आदमी को भी कच्चा खा सकता है ....जब पेट में इतने गरिष्ठ भोजन हो तो कब्जियत की शिकायत होगी ही.विचारों में गरिष्टता छायेगी ही. फिर फिर 'बाथरूम में कौन सी पची-अनपची चीज़ पहले बाहर निकले स्पष्ट नहीं हो पाता फिर हो जाता है बवासीर...निकलता है खून जो गरीबो का पीया होता है.'ट्रिन ! ट्रिन !! ट्रिन !!! '- बड़े बाबू ने फोन किया ---'साहब है ?' नहीं, साहब बाथरूम में है
'अस्तु

---आनन्द पाठक ’आनन’





रविवार, 31 मई 2009

व्यंग्य 05: सुदामा फिर आइहौ....

एक व्यंग्य: सुदामा फिर आइहौ....

सुदामा की पत्नी ने अपनी व्यथा कही ....
' हे प्राण नाथ ! या घर ते कबहूँ न बाहर गयो,यह पुरातन फ्रीज़ और श्वेत-श्याम टी०वी० अजहूँ ना बदली जा सकी.पड़ोस की गोपिकाएं कहती हैं 'हे सखी! आज-कल आप के बाल-सखा श्रीकृष्ण का राज दरबार दिल्ली में है.आप दिल्ली में द्वारिका की यात्रा क्यों नहीं करते? क्यों नहीं मिल आते एक बार ? कम से यह कष्ट तो कट जाते प्राणनाथ!
'हे प्राणेश्वरी !कितने वर्ष बीत गए. अब कौन पहचानेगा मुझे? बचपन की बात और थी जब हम साथ-साथ गौएँ चराया करते थे और वह चैन की वंशी बजाया करते थे .उनकी बात और है .वह भाग्य के प्रबल हैं.पूर्व में गोपिकाओं से घिरे रहते थे अब सेविकाओं से. हे स्वामिनी! मुझे आवश्यकता नहीं है 'दिल्ली' यात्रा की. हम संतुष्ट हैं अपने पुरातन फ्रिज व श्वेत-श्याम टी ०वी० से .क्या हुआ? फ्रिज में पानी ठंडा होता तो है.टीवी में 'चित्रहार' रंगोली आती तो है .चित्र हिलता है तो क्या?गाता तो है. अरे बावरी !औरों को गाडी बँगला टेंडर चाहिए ,हम निर्धन ब्राह्मण लिपिकों को लिफाफा बंद दान-दक्षिणा ही पर्याप्त है "-सुदामा ने कहा
कहते हैं सुन्दर स्त्रियों के अमोघ अस्त्र होते है उनके आंसू. एक बार निकले तो उसकी उषणता से पुरुष पिघल जाता है और यदा-कदा चुल्लू भर आंसू में डूब भी जाता है .सब अस्त्र चूक सकते है ,पर यह नहीं.पति नामक निरीह प्राणी फिर समर्पण कर देता है .यही इसका रहस्य है.अंततोगत्वा सुदामा जी को एक आदर्श पति की भांति,पत्नी की बात माननी पड़ी. इच्छा न होते हुए भी 'दिल्ली' में द्वारिका की यात्रा करनी पडी सुदामा की पत्नी एक सुयोग्य व विदुषी महिला थी /यात्रा -पथ के लिए उन्होंने पूडी-सब्जी , मिस्थान के अतिरिक्त एक पोटली और तैयार की विशेष रूप से श्री कृष्ण के द्वारपाल को भेंट देने के लिए चल पड़े सुदामा
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'ऐ ठहरो ! कौन हो तुम? किससे काम है?-द्वारपाल ने बन्दूक की बट टोंकते हुए कड़कती आवाज़ में कहा
''भइए मैं ,मैं हूँ सुदामा.,श्री कृष्ण ले बाल-सखा मित्र से मिलना है "
" मिलना है? हूँ !"- द्वारपाल ने एक व्यंगात्मक व परिहासजन्य कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा -' मिलाना है? अरे ! अपना रूप देखा है?
साहब के बाल-सखा है ! चला आया मिलने ! हूँ ,अप्वांतमेंट लिया है?"-द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की.
"ई अपैंत्मेंट का होत है भैया ? हम ठहरे बाल-सखा बाल-सखा सुदामा गोकुल में साथ-साथ गौएँ चराया करते थे "
" तो जाकर चराओ न , इधर काहे वास्ते माथा खाता है तुम्हारे जैसा दर्ज़नों सुदामा आता है इधर साहब का मिलने वास्ते . साहब तुम जैसे चरवाहों से मिलना शुरू कर देगा कल वह भी उधर गौएँ चराता नज़र आएगा. चलो हटो ! अपना काम करो शीश पगा न झगा तन पे "-द्वारपाल ने सुदामा को परे धकेलते हुए कहा
दीन दुखी सुदामा धकियाये जाने के बाद ,बाहर सीढियों पे बैठ गए.सुदामा जो ठहरे ब्राहमण आदमी ,स्वभावगत भीरू व निश्छल आज तक लाठी-पैना के अतिरिक्त कोई अस्त्र-शस्त्र तो देखा नहीं था ,बन्दूक मशीनगन देख वैसे ही पसीना छूटने लगा मन ही मन कभी स्वयं को ,कभी पत्नी को कोसने लगे.अच्छा-भला ,शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर रहा था ,व्यर्थ में फंसा दिया इस माया जाल में .श्वेत-श्याम टी 0 वी० ?अरे नहीं बदलता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ? और एक यह द्वारपाल का बच्चा कि खडा है द्वार पर पहाड़ की तरह .प्रवेश की अनुमति ही नहीं दे रहा है .इसीलिए कहते हैं की स्त्रियों की बात कदापि नहीं माननी चाहिए.साथ ही यदि वह स्त्री चतुर हो तो भूलवश भी नहीं .कहती थी यह पोटली दे दीजियेगा द्वारपाल को.हूँ ! यहाँ गाडी-मोटर वाले को तो कोई पूछता नहीं तो यह पोटली कौन सा तीर मार लेगी.? सुदामा जी ने कुछ साहस बटोर कर एक बार पुन: प्रयास किया .
" भइए ! अपैंतमेंट तो नहीं लाया है ,यह पोटली लाया हूँ तुम्हारे लिए,तुम्हारी भाभी ने दी है."
द्वारपाल ने ,कक्ष के कोने में जाकर पोटली का थोडा मुख खोला पूर्ण मुख खोलने से आचार-संहिता के उल्लंघन की संभावना थी कर्तव्यनिष्ठा पर आंच आ सकती थी पोटली के भीतर कागज़ के कुछ हरे-हरे व कड़े-कड़े दुकडे नज़र आये. द्वारपाल की आँखों में एक विशेष चमक व चहरे पर एक संतोष भाव उभर आया.
जब वह अपने आस-पास देख ,पूर्ण रूप से आश्वस्त हो गया की यह सुखद क्रिया किसी अन्य आगंतुक ने नहीं देखी तो झट पोटली बंद कर अपने पास रख ली.फिर मुड़ कर वाणी में मिठास घोलते हुए कहा -" तो भईए सुदामा ! दिल्ली नगरी कब पहुँचे? रास्ता में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?
सुदामा जी स्तब्ध व अचम्भित हो गए. अभी अभी यह करेला नीम चढा था 'रसगुल्ला कैसे बन गया? बिनौला था रसीला कैसे हो गया ?
सुदामा जी ब्राह्मण ठहरे ,द्रवीभूत हो गए.'भईया' कितना प्यारा सम्बोधन दिया है.अपनापन उभर आया होगा . काश! धर्मपत्नी की बात मान पहले ही यह पोटली भेंट कर दी होती. परन्तु क्या था उस पोटली में की वाणी में मिठास आ गयी ? अवश्य ही नए गुड की डली रही होगी.पत्नी ने हमी से छुपाई थी यह बात . हो सकता है द्वारपाल महोदय पिघल गए होंगे . हमने भी तो भाभी का रिश्ता देकर सौंपी थी. पोटली आहा ! क्या द्वापर युग है .भेंट-दक्षिणा 'द्वार पर 'से ही शुरू.
सुदामा जी को मालूम नहीं ,कौन सी 'विलक्षण' वास्तु उस पोटली में हमें ज्ञात नहीं.यह रहस्य मात्र दो व्यक्ति जानते थे -एक द्वारपाल और दूसरे सुदामा की पत्नी.
उक्त पोटली के प्रभाव से सुदामा जी अन्दर पहुँच गए.
अन्दर ,श्रीकृष्ण जी ,मसनद के सहारे ,केहुँनी टिकाए लेते हुए हैं.अब मोर -मुकुट पीताम्बर की जगह खद्दर का कुरता,पायजामा ,जवाहर जैकेट , गांधी-टोपी है.अब छछिया भरी छाछ पे नहीं नाचते हैं ,अपितु कोटा-लाइसेंस के लिए अपने भक्तों को नचाते हैं .माखन की गगरी में नहीं ,वोट की नगरी में सेंध लगाते है.फल-फूल रखा है,अधिकारी ,व्यापारी,दरबारी घेरे खड़े हैं.कई सुदामा अपनी-अपनी झोली फैलाए खड़े है.किसी को तबादला करवाना है,किसी को तबादला रुकवाना है.किसी को परमिट चाहिए ,किसी को कोटा,बड़े लडके को मेडिकल में एड्मिसन दिलाना है.साहब एक संस्तुति -पत्र लिख दें तो कार्य सिद्ध हो जाएगा.भीतर चकाचौंध है.कुछ झोलाधारी,कुछ चश्माधारी .कुछ दाढ़ी बढाए ,कुछ मुंह लटकाए.कुछ स्वस्तिवाचन करते .कुछ स्तुतिगान करते.खड़े है
" सर ! आप तो जानते हैं कि कितने वर्ष से इस पार्टी कि निस्वार्थ सेवा कर रहा हूँ सर! एक गैस एजेन्सी मिल जाती तो ..... टेलीफोन कि घंटियाँ बज रही है टेलीफोन आ रहा है....टेलीफोन जा रहा है.......'हेलो हेलो ...मैं मंत्री निवास से बोल रहा हूँ ...हेलो हेलो आप सुन रहे हैं ना ....साहब की इच्छा है ......साहब चाहतें हैं .....आप सुन रहे हैं ना....साहब ने पूछा है....साहब कह रहें हैं.....साहब माँगते है......अच्छा ऐसा कर दीजिएगा ....नहीं नहीं ....लगता है...आप सुन नहीं रहे हैं.....टिकना मुश्किल हो जाएगा आप का ......आप दिल्ली आकर मिलिए ...
दरबार चल रहा है.चर्चा चल रही है देश की..विदेश की . 'गोकुल' की नहीं "अयोध्या' की .'मथुरा ' की नहीं 'राम-जन्म भूमि' की. 'राधा' की नहीं 'छमिया ' की.ग्वाल-बाल की नहीं 'मंडल 'की वैसे साहब का अपना 'बरसाना ' भी है
एक कोने में 'सुदामा जी' निरीह व निस्वार्थ भाव से औचक खड़े है. आज के कृष्ण सुदामा को नहीं पहचानते.अब दौड़ कर नहीं आते.बहुत सुदामा पैदा हो गए हैं.तब से अबतक .दिल्ली में सुदामा का पहचानना आवश्यक भी नहीं .पांच साल में मात्र एक बार तो पहचानना है ,जा कर पहचान लेंगे निर्वाचन क्षेत्र में पखार लेंगे पाँव एक बार
सुदामा जी के मुख पर संकोच का भाव है .यहाँ लोग कितने मिस्थान के पैकेट लाएं है और एक मैं कि कुछ नहीं लाया एक पोटली लाया भी था तो उस द्वारपाल के बच्चे ने रख लिया .विगत पचास-साठ साल से दिल्ली के किसी कोने में भारत का सुदामा आज भी खडा है ,अपने श्रीकृष्ण से मिलने के लिए .आज भी सुदामा दीन-हीन निरुपाय है आज भी " शीश पगा न झगा तनte पे 'है
साहब उठ गए.दरबार ख़त्म हो गया अन्य लोग भी उठ कर जाने लगे.साहब को किसी जन सभा में जाना है .भाषण देना है भारत कि दीन-हीन गरीबी पर.उनकी झोपडी पर जहाँ विकाश का रथ अभी तक नहीं पहुंचा है.उन गरीब भाइयों पर जहाँ अँधेरा है.भीड़ चल रही है .एक युवा तुर्क व्यक्ति आगे-आगे रास्ता बनाते चल रहा है ...'हटिये हटिये ...जरा बाएँ हो जाएँ...भाई साहब ...भीड़ मत लगाइए ..अभी साहब को जाना है..'- भीड़ छंट कर अगल-बगल हो जाती है कि अचानक साहब कि दृष्टि सुदामा पर पड़ती है
'अरे सुदामा! ? कब आए?'
'दर्शन करने आ गया सखे !'- वाणी में विह्वलता व ह्रदय में प्रेम भर कर सुदामा ने कहा
' ओ० के० ओ० के० फिर मिलना '
भीड़ सुदामा को पीछे धकेलते आगे बढ़ जाती है
०० ००० ००००
सुदामा का भ्रम टूट गया.सखापन वाष्प बन कर उड़ गया .मन भारी हो गया.अंतर्मन आर्तनाद से भर उठा.गला रुंध गया आँखों में प्रेम के आंसू छलछला गए.
धीरे -धीरे बोझिल कदमों से बाहर आ गए
' भैये भेंट हो गयी अपने बाल-सखा से ?--द्वारपाल ने जिज्ञासा प्रगट की
सुदामा बंगले की सीढियां उतरते सड़क पर आ गए
" फिर आईहौ लला ! पोटली लाना न भूलिअहौ"- द्वारपाल ने आवाज़ लगाईं
अस्तु!

----आनंद