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रविवार, 3 जुलाई 2022
शनिवार, 2 जुलाई 2022
मंगलवार, 16 दिसंबर 2014
व्यंग्य 25 : छ्पाना एक हिन्दी पुस्तक का....
व्यंग्य 25 : छपाना एक हिंदी पुस्तक का---
कहते हैं प्रकाशन एक विधा है जैसे लेखन एक विधा है।मैं कहता हूँ प्रकाशन एक कर्म काण्ड है।पाण्डुलिपि का प्रकाशन कराते कराते अपना ही पिण्डदान बाक़ी रह जाता है।नवोदित व्यंग्यकार यह रहस्य समझते होंगे।लेखन आसान है-लेखनी ली ,अल्लम-गल्लम लिखा,दस बीस पन्ने रंग दिए पाण्डुलिपि तैयार। परन्तु प्रकाशन -ना बाबा ना।10-20 प्रकाशकों को टोपी पहनाते हैं तो कोई एक टोपी पहनता है बमुश्किल।[पाठकों को सूचनार्थ- सिर्फ़ मेरे प्रकाशक को छोड़ कर जो लेखक को ही टोपी पहनाता है] हिन्दी के व्यंग्य लेखक को 2-ही चिन्तायें सताती रहती हैं ।एक-बड़ी होती हुई बेटी ’रचना’ और दूसरी तैयार होती हुई पाण्डुलिपि ’रचना’।अगर दोनो प्रकाशित न हुई तो आजीवन कुँवारी रह जायेंगी और जग हँसाई ऊपर से।
वही हुआ ,जिसका भय था । रचना तैयार हो गई।अब एक सुयोग्य प्रकाशक ’वर’ की खोज करनी थी।सोचा समाचार पत्र के माध्यम से वैवाहिक कालम में एक विज्ञापन दे दूँ -"प्रकाशक चाहिए अपनी रचना के प्रकाशन के लिए ।पन्ने 200 ,वज़न आधा किलो,डिमाई साईज ,हार्ड बैक। इच्छुक प्रकाशक अपना ’बायोडाटा’ भर कर प्रकाशित सूची के साथ अपना फोटो भेंजे। ISBN पंजीकृत प्रकाशको को प्राथमिकता दी जायेगी।विचारधारा ’नो-बार’।वामपंथी .दक्षिणपंथी ,नरमपंथी ,गरमपंथी प्रकाशको पर विचार किया जा सकता है। कुंजी ,गेस पेपर ,श्योर शाट सक्सेस पेपर प्रम्पलेट पेपर ,मस्त जवानी गरम हसीना छापने वाले प्रकाशक कृपया क्षमा करेंगे।"--मगर जनाब अगर विज्ञापन से ही प्रकाशक मिल जाते तो हम इसे ’कर्मकाण्ड ’क्यों कहते।
ये प्रकाशक भी कुछ विशेष प्रकार के प्राणी होते हैं। पिछले व्यंग्य संग्रह "शरणम श्रीमती जी" -में इन प्राणियों पर कुछ प्रकाश डाला था। लिखा था कि किस प्रकार आंख के अन्धे-गांठ के पूरे ...एक प्रकाशक ने उक्त ्व्यंग्य संग्रह छापने का जोखिम उठाया था कि आज तक न उबर सके।यह अलग बात है कि उक्त प्रकाशक महोदय ने न अपनी गांठ खोली न गठरी।यही क्या कम है कि बिना रायल्टी के छाप दिया।उनकी मान्यता है कि हिन्दी के सच्चे सेवक को न गाँठ देखनी चाहिए न गठरी। हिन्दी का लेखक तो साधु-सन्त होता है।गाँठ गठरी देखने का काम अंग्रेजी लेखकों का है। उनके इस गुरू-ज्ञान से मैं सहम गया ।कहीं उनकी दृष्टि मेरी गठरी पर तो नहीं है ?
। हालाँकि कुछ लेखक बड़े घाँघ होते हैं। दिन के उजाले में कहते हैं -"अरे मैं ! मेरी पुस्तक के लिए तो प्रकाशक मेरे दरवाजे पर लाईन लगाये खड़े रहते है कि पाण्डुलिपि तो बस आप मुझे ही दे दीजियेगा फिर देखिए कि कैसी आप की सेवा करता हूँ। अपना पैसा लगा कर पुस्तक छपवाना । राम राम राम कैसा कलियुग आ गया।" मगर रात के अधेरे में वही लेखक प्रकाशक के दरवाजे दरवाजे हाज़िरी देते हैं।खैर जनाब, मैं स्वयं ही एक सुयोग्य प्रकाशक की तलाश में निकल पड़ा-अपनी ’रचना’ के लिए।यह काम तो करना ही था ।खद्दर का कुर्ता सिलवाया ,पायजामा बनवाया।बाल बढ़ाये ,कुछ दाढ़ी बढ़ाई । कंधे पर झोला लटकाया ,आंखों पर मोटा ऐनक चढ़ाया ....।बम्बईया फ़िल्मवालोंने यही वेश भूषा ्निर्धारित की है बेचारे हिन्दी लेखक की॥इसी ’गेट अप" में फ़िल्म चुपके चुपके में हीरो पर्दे पर आताहै और शुद्ध हिन्दी बोलता है तो हास्य पैदा होता है-तालियाँ बजती हैं। यानी हिन्दी के मज़ाक से भी कुछ न कुछ कमाया जा सकता है।इस वेशभूषा में प्रकाशक के द्वार जायेंगे तो अभीष्ट प्रभाव पड़ेगा।अन्यथा क्या समझेगा कि कैसे कैसे लोग आ गये है आजकल हिन्दी व्यंग्य लेखन में।अन्तर मात्र इतना है कि एक नवोदित प्रकाशक किसी स्थापित लेखक के द्वार पर खड़ा रहता है और एक नवोदित लेखक प्रकाशक के द्वार पर।इसी लिए कहते हैं कि लेखक और प्रकाशक का चोली-दामन का साथ होता है । अब यह न पूछियेगा कि ’चोली’ कौन है?
पाण्डुलिपि बगल मे दबाये निकल पड़ा।चलते चलते एक प्रकाशक नुमा व्यक्ति दिखाई पड़े। सज्जन दुकान खोल कर अभी बैठे ही थे ,सोचा इन्ही से पूछते हैं।प्रश्नवाचक चिह्न की तरह मैं खड़ा हो गया । मेरे कुछ बोलने के पूर्व ही वह सज्जन बोल उठे--" आगे बढ़ो न बाबा ! अभी धन्धे का टैम है"
" मैं भिखारी नहीं ,लेखक हूं"- मैने अपना परिचय दिया
"हिन्दी में लिखते हो ? व्यंग्य लिखते हो-तो एक ही बात है"
मेरा भी स्वाभिमान जगा। लेखक का तिरस्कार सह सकता हूँ व्यंग्य का अपमान सह सकता हूँ मगर हिन्दी का नहीं\हिन्दी का सेवक जो हूं
"आप जैसे प्रकाशक ही हिन्दी का बंटाधार किए बैठे हैं-नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन नहीं देते।-मैने कहा
जाने क्या सोच कर वह उठ खड़े हुए । मुझसे भी उच्च स्वर आवृति में कहा-" गुस्सा करने को नी\ जास्ती मचमच करने को नी। देखता नहीं प्रकाशन से ही ’माल’ खड़ा किया है । मालदार प्रकाशक हूँ -मालपानी। अब मैने ’चिल्लर’ देना बन्द कर दिया है । अरे ! आगे बढ़ो नी बाबा"
"आप को कला की पहचान नहीं ,कलाकार की पहचान नहीं।मात्र ’माल’ की पहचान है । नाम है -मालपानी ,आंखो में पानी नहीं।अरे हम लेखक लिखते हैं आत्मा से..."-मैने भी गर्जना की
"आत्माराम एन्ड सन्स" अगली गली में रहते हैं--वहीं जाओ न बाबा !वहीं आईना दिखाओ ...म्हारो माथा खाओ नी..."-अरे रामू ! ज़रा इन भाई साहब को ....!’
इस से पहले कि रामू मुझे बाहर का रास्ता दिखाता मैने स्वयं ही वहाँ से चला जाना उचित समझा। हिन्दी का लेखक जो हूँ।
मैं आगे बढ़ा।देखा कि एक किताब की दुकान में एक हृष्ट पुष्ट सज्जन अपने 4-5 हट्टे कट्टे बलिष्ठ साथियों से घिरे हुए हैं।साहित्य पर चर्चा चल रही है ।हास-परिहास हो रहा है। हिन्दी लेखकों की टाँग खिंचाई हो रही है। हिन्दी साहित्य पर चिन्तन-मनन हो रहा है।इनका अपना दरबार है इनके अपने लेखक हैं इनका अपना गुट है इनके अपने आलोचक हैं इनके अपने समीक्षक हैं इनके अपने लठैत है ..वक़्त ज़रूरत हिन्दी सेवकों की सेवा भी कर सकते है जो इनके गुट में नहीं हैं इनके अपने प्रकाशक हैं --कहने का मतलब यह कि इनका अपना खेमा है और अपनी खेमाबन्दी । हिन्दी वाले इसे ’विचार धारा के स्कूल’ कहते है ,हमें तो गिरोह लगता है बोतल तो कोका कोला-पेप्सी की लग रही है भीतर क्या भरा है कहा नहीं जा सकता। शरीर संरचना से तो समर्थ प्रकाशक लगता है। मैने अपनी पाण्डुलिपि दिखाई ,परिचय दिया...संग्रह की संक्षिप्त रूप-रेखा बताई ....
अचानक...
हा! हा! हा! अठ्ठहास करते हुए उक्त सज्जन ने कहा-"अकेले आये हो? अयं। तेरा जोड़ीदार किधर है रे ?"
इस अचानक अठ्ठहास से मैं घबरा गया । अभी तो यह आदमी कुछ प्रकाशकनुमा दिख रहा था अब इसमें ’गब्बर सिंह’ कहां से आ गया?मैं समझ गया मेरा जोड़ीदार ’मिसरा जी’ की बात कर रहा है ।मेरे पिछले व्यंग्य संग्रह में मिश्रा जी ने प्रकाशन-विपणन-समीक्षा करवाने में नि:शुल्क व नि:स्वार्थ मदद की थी ।[पाठकगण कृपया ’शरणम श्रीमती जी -व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चलते चलते का सन्दर्भ लें]
" बड़ी जान है रे तेरी कलम में ..किस पेन से लिखता है अयं?"- खैनी ठोकते हुए उक्त सज्जन ने कहा -" पिछली बार प्रकाशकों पर व्यंग्य तुमने ही लिखा था? क्या सोच कर लिखा था कि सरदार [प्रकाशको का] बड़ा खुश होगा ---सरदार तुम्हें रायल्टी देगा...आ थू ! अरे वो कालिया ! कितना किताब छापते हैं रे एक साल में हम...?
"सरदार 100-200"
"बरोबर ! और यह 100-200 किताब हम यूँ ही नही छापते । सरकारी ठेका लेते है । जब ’गब्बर प्रकाशन" किताब छापता है तो दूर दूर तक प्रकाशक माथा पकड़ लेता है ....गब्बर का नाम सुन कर...आ थू"
मै थर थर काँपने लगा। कहाँ आ कर फँस गये पुस्तक छपाने के चक्कर में ।जान बची तो बहुत प्रकाशक मिलेंगे।जान नहीं तो लेखन क्या -प्रकाशन क्या?
"सरदार ! मैं चलता हूँ"-मैने पान्डुलिपि उठा ली।
"हा! हा! हा! -जो डर गया सो मर गया।हम तुम्हारा इन्साफ़ करेगा।तुम को साफ करेगा। बरोबर करेगा। अरे ! ओ साम्भा ! ज़रा उठा तो कलम और लगा तो निशाना...."- उसने आवाज़ दी...और पिच्च से मुँह की खैनी थूक दी [मेरे ऊपर नहीं] लगता है सबको एक ही छत के नीचे बैठा रखा है ---लेखक---समीक्षक---आलोचक--प्रकाशक--पुस्तक विक्रेता...। सरकारी शब्दावली में इसे "एकल-खिड़की"-सुविधा कहते हैं
वहां से जो भागा तो सीधे घर आकर ही दम लिया ...जान बची लाखों पाये...लौट के बुद्धू घर को आये ..लड़ने का माद्दा छोड़ कर आये ...
कहते हैं प्रकाशन एक विधा है जैसे लेखन एक विधा है।मैं कहता हूँ प्रकाशन एक कर्म काण्ड है।पाण्डुलिपि का प्रकाशन कराते कराते अपना ही पिण्डदान बाक़ी रह जाता है।नवोदित व्यंग्यकार यह रहस्य समझते होंगे।लेखन आसान है-लेखनी ली ,अल्लम-गल्लम लिखा,दस बीस पन्ने रंग दिए पाण्डुलिपि तैयार। परन्तु प्रकाशन -ना बाबा ना।10-20 प्रकाशकों को टोपी पहनाते हैं तो कोई एक टोपी पहनता है बमुश्किल।[पाठकों को सूचनार्थ- सिर्फ़ मेरे प्रकाशक को छोड़ कर जो लेखक को ही टोपी पहनाता है] हिन्दी के व्यंग्य लेखक को 2-ही चिन्तायें सताती रहती हैं ।एक-बड़ी होती हुई बेटी ’रचना’ और दूसरी तैयार होती हुई पाण्डुलिपि ’रचना’।अगर दोनो प्रकाशित न हुई तो आजीवन कुँवारी रह जायेंगी और जग हँसाई ऊपर से।
वही हुआ ,जिसका भय था । रचना तैयार हो गई।अब एक सुयोग्य प्रकाशक ’वर’ की खोज करनी थी।सोचा समाचार पत्र के माध्यम से वैवाहिक कालम में एक विज्ञापन दे दूँ -"प्रकाशक चाहिए अपनी रचना के प्रकाशन के लिए ।पन्ने 200 ,वज़न आधा किलो,डिमाई साईज ,हार्ड बैक। इच्छुक प्रकाशक अपना ’बायोडाटा’ भर कर प्रकाशित सूची के साथ अपना फोटो भेंजे। ISBN पंजीकृत प्रकाशको को प्राथमिकता दी जायेगी।विचारधारा ’नो-बार’।वामपंथी .दक्षिणपंथी ,नरमपंथी ,गरमपंथी प्रकाशको पर विचार किया जा सकता है। कुंजी ,गेस पेपर ,श्योर शाट सक्सेस पेपर प्रम्पलेट पेपर ,मस्त जवानी गरम हसीना छापने वाले प्रकाशक कृपया क्षमा करेंगे।"--मगर जनाब अगर विज्ञापन से ही प्रकाशक मिल जाते तो हम इसे ’कर्मकाण्ड ’क्यों कहते।
ये प्रकाशक भी कुछ विशेष प्रकार के प्राणी होते हैं। पिछले व्यंग्य संग्रह "शरणम श्रीमती जी" -में इन प्राणियों पर कुछ प्रकाश डाला था। लिखा था कि किस प्रकार आंख के अन्धे-गांठ के पूरे ...एक प्रकाशक ने उक्त ्व्यंग्य संग्रह छापने का जोखिम उठाया था कि आज तक न उबर सके।यह अलग बात है कि उक्त प्रकाशक महोदय ने न अपनी गांठ खोली न गठरी।यही क्या कम है कि बिना रायल्टी के छाप दिया।उनकी मान्यता है कि हिन्दी के सच्चे सेवक को न गाँठ देखनी चाहिए न गठरी। हिन्दी का लेखक तो साधु-सन्त होता है।गाँठ गठरी देखने का काम अंग्रेजी लेखकों का है। उनके इस गुरू-ज्ञान से मैं सहम गया ।कहीं उनकी दृष्टि मेरी गठरी पर तो नहीं है ?
। हालाँकि कुछ लेखक बड़े घाँघ होते हैं। दिन के उजाले में कहते हैं -"अरे मैं ! मेरी पुस्तक के लिए तो प्रकाशक मेरे दरवाजे पर लाईन लगाये खड़े रहते है कि पाण्डुलिपि तो बस आप मुझे ही दे दीजियेगा फिर देखिए कि कैसी आप की सेवा करता हूँ। अपना पैसा लगा कर पुस्तक छपवाना । राम राम राम कैसा कलियुग आ गया।" मगर रात के अधेरे में वही लेखक प्रकाशक के दरवाजे दरवाजे हाज़िरी देते हैं।खैर जनाब, मैं स्वयं ही एक सुयोग्य प्रकाशक की तलाश में निकल पड़ा-अपनी ’रचना’ के लिए।यह काम तो करना ही था ।खद्दर का कुर्ता सिलवाया ,पायजामा बनवाया।बाल बढ़ाये ,कुछ दाढ़ी बढ़ाई । कंधे पर झोला लटकाया ,आंखों पर मोटा ऐनक चढ़ाया ....।बम्बईया फ़िल्मवालोंने यही वेश भूषा ्निर्धारित की है बेचारे हिन्दी लेखक की॥इसी ’गेट अप" में फ़िल्म चुपके चुपके में हीरो पर्दे पर आताहै और शुद्ध हिन्दी बोलता है तो हास्य पैदा होता है-तालियाँ बजती हैं। यानी हिन्दी के मज़ाक से भी कुछ न कुछ कमाया जा सकता है।इस वेशभूषा में प्रकाशक के द्वार जायेंगे तो अभीष्ट प्रभाव पड़ेगा।अन्यथा क्या समझेगा कि कैसे कैसे लोग आ गये है आजकल हिन्दी व्यंग्य लेखन में।अन्तर मात्र इतना है कि एक नवोदित प्रकाशक किसी स्थापित लेखक के द्वार पर खड़ा रहता है और एक नवोदित लेखक प्रकाशक के द्वार पर।इसी लिए कहते हैं कि लेखक और प्रकाशक का चोली-दामन का साथ होता है । अब यह न पूछियेगा कि ’चोली’ कौन है?
पाण्डुलिपि बगल मे दबाये निकल पड़ा।चलते चलते एक प्रकाशक नुमा व्यक्ति दिखाई पड़े। सज्जन दुकान खोल कर अभी बैठे ही थे ,सोचा इन्ही से पूछते हैं।प्रश्नवाचक चिह्न की तरह मैं खड़ा हो गया । मेरे कुछ बोलने के पूर्व ही वह सज्जन बोल उठे--" आगे बढ़ो न बाबा ! अभी धन्धे का टैम है"
" मैं भिखारी नहीं ,लेखक हूं"- मैने अपना परिचय दिया
"हिन्दी में लिखते हो ? व्यंग्य लिखते हो-तो एक ही बात है"
मेरा भी स्वाभिमान जगा। लेखक का तिरस्कार सह सकता हूँ व्यंग्य का अपमान सह सकता हूँ मगर हिन्दी का नहीं\हिन्दी का सेवक जो हूं
"आप जैसे प्रकाशक ही हिन्दी का बंटाधार किए बैठे हैं-नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन नहीं देते।-मैने कहा
जाने क्या सोच कर वह उठ खड़े हुए । मुझसे भी उच्च स्वर आवृति में कहा-" गुस्सा करने को नी\ जास्ती मचमच करने को नी। देखता नहीं प्रकाशन से ही ’माल’ खड़ा किया है । मालदार प्रकाशक हूँ -मालपानी। अब मैने ’चिल्लर’ देना बन्द कर दिया है । अरे ! आगे बढ़ो नी बाबा"
"आप को कला की पहचान नहीं ,कलाकार की पहचान नहीं।मात्र ’माल’ की पहचान है । नाम है -मालपानी ,आंखो में पानी नहीं।अरे हम लेखक लिखते हैं आत्मा से..."-मैने भी गर्जना की
"आत्माराम एन्ड सन्स" अगली गली में रहते हैं--वहीं जाओ न बाबा !वहीं आईना दिखाओ ...म्हारो माथा खाओ नी..."-अरे रामू ! ज़रा इन भाई साहब को ....!’
इस से पहले कि रामू मुझे बाहर का रास्ता दिखाता मैने स्वयं ही वहाँ से चला जाना उचित समझा। हिन्दी का लेखक जो हूँ।
मैं आगे बढ़ा।देखा कि एक किताब की दुकान में एक हृष्ट पुष्ट सज्जन अपने 4-5 हट्टे कट्टे बलिष्ठ साथियों से घिरे हुए हैं।साहित्य पर चर्चा चल रही है ।हास-परिहास हो रहा है। हिन्दी लेखकों की टाँग खिंचाई हो रही है। हिन्दी साहित्य पर चिन्तन-मनन हो रहा है।इनका अपना दरबार है इनके अपने लेखक हैं इनका अपना गुट है इनके अपने आलोचक हैं इनके अपने समीक्षक हैं इनके अपने लठैत है ..वक़्त ज़रूरत हिन्दी सेवकों की सेवा भी कर सकते है जो इनके गुट में नहीं हैं इनके अपने प्रकाशक हैं --कहने का मतलब यह कि इनका अपना खेमा है और अपनी खेमाबन्दी । हिन्दी वाले इसे ’विचार धारा के स्कूल’ कहते है ,हमें तो गिरोह लगता है बोतल तो कोका कोला-पेप्सी की लग रही है भीतर क्या भरा है कहा नहीं जा सकता। शरीर संरचना से तो समर्थ प्रकाशक लगता है। मैने अपनी पाण्डुलिपि दिखाई ,परिचय दिया...संग्रह की संक्षिप्त रूप-रेखा बताई ....
अचानक...
हा! हा! हा! अठ्ठहास करते हुए उक्त सज्जन ने कहा-"अकेले आये हो? अयं। तेरा जोड़ीदार किधर है रे ?"
इस अचानक अठ्ठहास से मैं घबरा गया । अभी तो यह आदमी कुछ प्रकाशकनुमा दिख रहा था अब इसमें ’गब्बर सिंह’ कहां से आ गया?मैं समझ गया मेरा जोड़ीदार ’मिसरा जी’ की बात कर रहा है ।मेरे पिछले व्यंग्य संग्रह में मिश्रा जी ने प्रकाशन-विपणन-समीक्षा करवाने में नि:शुल्क व नि:स्वार्थ मदद की थी ।[पाठकगण कृपया ’शरणम श्रीमती जी -व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चलते चलते का सन्दर्भ लें]
" बड़ी जान है रे तेरी कलम में ..किस पेन से लिखता है अयं?"- खैनी ठोकते हुए उक्त सज्जन ने कहा -" पिछली बार प्रकाशकों पर व्यंग्य तुमने ही लिखा था? क्या सोच कर लिखा था कि सरदार [प्रकाशको का] बड़ा खुश होगा ---सरदार तुम्हें रायल्टी देगा...आ थू ! अरे वो कालिया ! कितना किताब छापते हैं रे एक साल में हम...?
"सरदार 100-200"
"बरोबर ! और यह 100-200 किताब हम यूँ ही नही छापते । सरकारी ठेका लेते है । जब ’गब्बर प्रकाशन" किताब छापता है तो दूर दूर तक प्रकाशक माथा पकड़ लेता है ....गब्बर का नाम सुन कर...आ थू"
मै थर थर काँपने लगा। कहाँ आ कर फँस गये पुस्तक छपाने के चक्कर में ।जान बची तो बहुत प्रकाशक मिलेंगे।जान नहीं तो लेखन क्या -प्रकाशन क्या?
"सरदार ! मैं चलता हूँ"-मैने पान्डुलिपि उठा ली।
"हा! हा! हा! -जो डर गया सो मर गया।हम तुम्हारा इन्साफ़ करेगा।तुम को साफ करेगा। बरोबर करेगा। अरे ! ओ साम्भा ! ज़रा उठा तो कलम और लगा तो निशाना...."- उसने आवाज़ दी...और पिच्च से मुँह की खैनी थूक दी [मेरे ऊपर नहीं] लगता है सबको एक ही छत के नीचे बैठा रखा है ---लेखक---समीक्षक---आलोचक--प्रकाशक--पुस्तक विक्रेता...। सरकारी शब्दावली में इसे "एकल-खिड़की"-सुविधा कहते हैं
वहां से जो भागा तो सीधे घर आकर ही दम लिया ...जान बची लाखों पाये...लौट के बुद्धू घर को आये ..लड़ने का माद्दा छोड़ कर आये ...
लगता है पुस्तक प्रकाशन मेरे बस का नहीं।जिन प्रकाशकों को पत्र लिखा ,सबने विनम्रता से जवाब दिया -’...आप की रचना सर्वश्रेष्ठ है ,आशा है कि आप की ये रचना हिन्दी साहित्य को समृद्ध करेगी...आप से हिन्दी जगत को बहुत संभावनायें हैं... हमें खेद है कि आप की इस पुस्तक का प्रकाशन हम अभी नहीं कर सकते कारण कि हम अभी अन्य श्रेष्ठ रचनायें यथा-डब्बे में ख़ून...ख़ूनी खंज़र..नंगी लाश..जैसी कालजयी रचनायें और कृतियों के प्रकाशन में व्यस्त हैं आप अन्यथा न लेंगे-सखेद सधन्यवाद।
मैने पाण्डुलिपि तो भेजी नहीं थी ।मात्र शीर्षक देख कर ही रचना की श्रेष्ठता समझ लेने वाले प्रकाशक धन्यवाद के पात्र ही नहीं ,महापात्र होते हैं।कुछ-कुछ पाठक तो पुस्तक कवर पर प्रकाशित मनभावन लुभावन चित्र देख कर ही रचना की उष्णता का आकलन कर लेते हैं। ऐसे पाठक और प्रकाशक दोनो ही दुर्लभ प्राणी होते हैं
आशा बलवती राजन !सोचा एक बार पुन: प्रयास करना चाहिए।अगर भगवान ने मुझे बनाया है तो कहीं न कहीं मेरे प्रकाशक को भी बनाया होगा।आवश्यकता है तो मात्र ढूँढने की।पुन: अपनी पाण्डुलिपि लेकर निकल पड़ा।अपना व्यंग्य संग्रह लेकर एक प्रकाशक के पास गया। सर्वप्रथम तो उन्होने मुझे ऊपर से लेकर नीचे तक आद्योपान्त इस तरह देखा जैसे मैं कोई लेखक नहीं तिहाड़ जेल से छूट कर आया हूँ। फिर पूछा-"नाम?"
"अच्छा तो आप ही हैं जिसने "चलते चलते .." व्यंग्य में हम प्रकाशकों की खिल्ली उड़ाई थी? माफ़ करना बाबा ,हम चालू-चलन्त.लेखकों की कृतियाँ नहीं छापते।
। उन्होने "चलन्त" शब्द का प्रयोग ऐसे किया जैसे मैं किसी नगर पालिका का "चलन्त" कूड़ादान लिए फिर रहा हूँ । उनके चलन्त शब्द में मुझे "घुमन्त" प्रकाशन का ’अन्त’ शब्द का बोध हुआ। हे भगवान ! इस प्रकाशक को थोड़ी से सदबुद्धि भी दे ।मैं बाहर निकल आया
किसी साहब ने बज़ा फ़र्माया है
मैं इसे शोहरत कहूँ या अपनी रुस्वाई कहूँ
मुझ से पहले उस गली में मेरे अफ़साने गए
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मैं अपनी औक़ात समझ गया ।नवोदित लेखकों को ये सम्पादक एवं प्रकाशक औकात ही बताते हैं। परन्तु यह धरा अभी प्रकाशकों से विहीन नहीं हुई है ।सभी तो ’गब्बर’ खानदान से ताल्लुक नहीं रखते होंगे ? एक प्रकाशक महोदय मिल ही गए।दुकान खोल कर बैठे ही थे।स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि वह पुस्तक विक्रेता हैं कि प्रकाशक।शकल से दोनो ही का भाव का बोध हो रहा था। मेरी ही तरह खद्दर का कुर्ता व पायजाम पहने ,ऊपर से जवाहर जैकेट के ऊपर कंधे पर एक उत्तरीय। शकल से किसी नगरपालिका स्कूल के मास्टर ज़्यादा और प्रकाशक कम लग रहे थे॥ जब से सुना है कि कुछ घाघ प्रकाशक लेखकों की टोपियाँ उछाल देते हैं ,तब से मैने टोपी पहनना छोड़ दिया। न रहेगी टोपी- न उछलेगी पगड़ी।
मैने अपना परिचय दिया ।अपना दर्द समझाया। अपनी विवशता बताई। जब मैने ’गब्बर सिंह’ वाली घटना बताई तो द्रवित हो गए।आँखों में आँसू भर लिए। हृदय में वात्सल्य भाव उमड़
आया। बोले-" होता है बेटा ! होता है ऐसा।कुछ कुछ प्रकाशक होते हैं ऐसे । वे सरकारी प्रकाशक होते हैं ठेकेदार प्रकाशक होते हैं। उनको हिन्दी के उत्थान पतन विकास से कुछ नहीं लेना देना। वो हमारे जैसे नहीं होते कि हिन्दी और हिन्दी के उत्थान के लिए सारा जीवन होम कर दिया ,अर्पित कर दिया।अपनी जमा-पूँजी प्रेस में लगा दी और जवानी भी।हमें हिन्दी की सेवा करनी थी एक सच्चे सेवक की तरह...। चिन्ता नहीं करो बेटा ! देर से आये हो मगर दुरुस्त आये सही जगह आए ।समझो कि तुम्हारी तलाश खत्म ...तुम्हारी चिन्ता अब मेरी चिन्ता हो गई...नो लुक बियान्ड फ़र्दर।एक काम करो...।अपनी पाणडुलिपि छोड़ जाओ..पढ़ लूंगा...।एक सप्ताह बाद आ जाना ...बता दूँगा।
मैं उनके इस वात्सल्य प्रेम से अभिभूत हो गया ।मन श्रद्धा से भाव विभोर हो उठा\ सोचने लगा -कितना भला प्रकाशक है \विचारों से यह ’भारतेन्दु’ काल का लग रहा है । ऐसे ही प्रकाशकों के दम से तो यह हिन्दी अभी टिकी हुई है वरना ’कार्पोरेट प्रकाशक तो कब का.....
मैं धन्यवाद कह बाहर निकल आया।
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एक सप्ताह बाद
"आओ बेटा ! आओ ! बैठो।मैने पाण्डुलिपि पढ़ी।तुम अपने हो।तुम्हारा कष्ट देखा नहीं जा रहा है। बुरा न मानना। व्यंग्य श्यंग लिखना छोड़ दो।इस में कुछ नहीं रखा है।अमूमन व्यंग्य-श्य़ंग्य तो कोई पढ़ता नहीं ।व्यंग्य से ज़माने को नहीं बदल पाओगे।आईना दिखाने से ज़माना नहीं बदलता ,सिर्फ़ हँसता है। पिछली बार छपवाया था तो क्या हुआ? बिकी? एक भी बिकी? गोदामों में सड़ रही है।धूप दिखाने का खर्चा सो अलग।अरे भइया ,मेरी मानो तो "लालू-चालीसा’ लिखो.."मोदी महात्म" लिखो.."राहुल सप्तसती"- लिखो...कुंजी लिखो..गेस पेपर लिखो श्योर शाट पेपर लिखो..परीक्षा पास करने के 101 तरीके लिखो...अच्छे अंक कैसे प्राप्त करे लिखो...अभिनन्दन पत्र लिखो..स्वागत गान लिखो..बड़ी माँग है इनकी आजकल । लिखने वाला मालामाल ्छापने वाला मालपानी..गंगा बह रही है हाथ धो लो..वरना व्यंग्य लिखते रहोगे तो लँगोटी भी उतर जायेगी..। भई .अगर तुम हमारे प्रकाशन के लिए लिखो तो कुछ हम भी माल-टाल बना लें। 50%-50% / वरना तो यह व्यंग्य-श्य़ंग्य तो निठ्ठलों के चोचले होते है --न लीपने के काम का..न पाथने के काम का।बेटा ! तू जानता नहीं ,’--लिखने से ज़्यादा छाप कर बेंचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं..सरकारी कार्यालयों के ’सुविधा-शुल्क’ लाइब्रेरी में ठेलने का खर्च अलग ,कागज-स्याही का भी खर्चा नहीं निकलता..फिर पुस्तक मेले में खोमचे लगा लगा कर बेचना पड़ता है।
-" तो क्या व्यंग्य पेड़ पर उगते हैं? आप क्या जानो कि व्यंग्य लिखने में कितना ’रिस्क’ होता है कितने पापड़ बेलने पड़ते है कि बेचारा लेखक अन्त मे अचार-पापड़ बेचने लग जाता है"-मैने अपना दिव्य-ज्ञान बघारा ।
स्पष्ट था मैने अपनी पाण्डुलिपि उठाई और बाहर आ गया।
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मन विद्रोह कर उठा।जो भी हो-अब तो यह संग्रह छपवा कर ही रहना है ।यही संघर्ष है ,यही साधना है यही तपस्या है। यही हिन्दी सेवा है।
एक प्रकाशक के कार्यालय गया ।बड़ा नाम सुना था।ऊँची दुकान थी पकवान देखा नहीं था। सोचा पकवान भी देख लूं।अभी उनके कक्ष में घुसा ही था कि अपने चश्मे के ऊपर से घूरते हुए देखा और कहा-"अरे बाबा ! तू फिर इधर आ गया। पिछ्ली बार बोला न तेरे कू .बोला न, इधर कू जास्ती आने का नी। तू ही ’चलते चलते ....’ लिखा था न ? तो फिर रुक क्यूँ गया? आगे चलो न बाबा। हम तुम को बोला न ,हम व्यंग्य-श्यंग्य नही ्छापता । तू जास्ती इधर को आयेगा तो पुलिस वाला भी इधर कू आयेगा...माफ़ कर न मेरे बाप....।
बाद मेम ज्ञात हुआ कि उक्त प्रकाशक महोदय सचित्र रंगीन कहानियाँ , रंगीली जवानी..रंगीन रातें वयस्कों के लिए छापते हैं ।मुद्रक प्रकाशक का पता नहीं छापते ,गुप्त रखते हैं। हिन्दी की गुप्त सेवा करते हैं। इनकी छपी किताबें शहर की हर गली-खोली -नुक्कड़ पर गुप्त रूप से मिलती हैं जिसे शहर के लौण्डे छुप छुपा कर पढ़ते हैं । बड़े बड़े साहब लोग रात को बेडरूम में अकेले पढ़ते हैं। पैसे वाले प्रकाशक है बस पुलिस से डरते हैं।
मन भिन्ना गया।
थक हार कर एक मा‘ल में घुस गया।किसी प्रकाशक का था। प्रवेश हाल में एक सुन्दर से रिशेप्स्निस्ट ।चेहरे पर सदाबहारी प्लास्टिक मुस्कान.एक ही जुमला-व्हाट आइ कैन हेल्प यू ,सर !? भीतर एक बड़ा सा चमकता हुआ आफ़िस ।मार्ब॒ल की फ़्लोर। वातानुकूलित कक्ष ।कक्ष में एक बड़ा टेबुल ,बगल में एक बड़ा सोफ़ा।सोफ़ा के बगल में एक साइड टेबुल ..और उस पर कुछ पत्र-पत्रिकाये। टेबुल के उस तरफ़ एक घूर्णनदार कुर्सी। कुर्सी पर बैठा एक नवयुवक । सूट पहने टाई लगाये।आँखो पर एक बड़ा सा काला गागल्स चढ़ाए।किसी बड़ी कम्पनी का मैनेज़र लग रहा था । मैं संकोच में पड़ गया ,लगता है ग़लत जगह आ गया हूँ\यह सेन्ट्रल माल या स्पेन्सरमार्ट तो नही? यहाँ किताबें कहाँ छपती होंगी? बाहर निकलने वाला ही था कि मैनेज़र ने पूछ लिया
-" यस ! प्लीज़ ! मै आप की क्या सेवा कर सकता हूँ?"
-’ नहीं नहीं कुछ नहीं बस यूँ ही...."
-"प्लीज़ ! आप बैठें’-मैंउसके आग्रह पर सोफ़े पर बैठ गया । इसी बीच एक सुन्दर से कन्या बड़े ही करीने से एक ट्रे में कुछ पेय पदार्थ ले आई। एक हल्की सी मुस्कान बिखेरते हुए बोली-"प्लीज़"।
बिहारी होते तो एक दोहा लिख देते मैं था तो मैं संकोच में पड़ गया।अब उठ कर भाग भी नहीं सकता। पेय पीने के बाद कुछ तनाव कम हुआ।
-" जी बतायें ! मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ "- उक्त व्यक्ति ने पुन: पूछा
मैने अपनी सारी बात बताई । अपनी व्यथा समझाई ।कथा सुनाई। मैनेज़र ने कहा -" नो प्रोब्लेम" काम हो जायेगा ।आप की किताब छप जायेगी। बस आप पैकेज़ सलेक्ट कर लें । मिनी ! सर को वह बुकलेट दे दो"
मैने ’पैकेज़’ को ’पैकेट’ समझा । हिन्दी का लेखक हूँ सम्भवत: ’रायल्टी’ का पैकेट होगा !मिनी बिटिया मुझे ’बुकलेट’ थमा गई
पढ़ा तो ’लेट’[स्वर्गीय] होते होते बचा।वह ्पैकेज़-बुकलेट’ ्क्या था ..समझिए कि ’पाकेट-कर" [पाकेट मार नहीं] था। सुधी पाठकों की ज्ञान वर्धनार्थ संक्षेप में प्रकाश डाल रहा हूँ। मैं तो नसानी तुम ना नसैहों।
सिल्वर पैक योजना : यानी मात्र पुस्तक छापने के 20,000/- रूपये।इस पैकेज़ में मात्र 500 प्रतियाँ ही छापी जायेंगी। 11-लेखकीय प्रतियाँ मुफ़्त।पुस्तक यदि ’हार्ड बाऊण्ड’ में छपवानी है तो 2000 रुपये अतिरिक्त प्रभार लिया जायेगा । सभी टैक्स सहित। दो पुस्तके एक साथ छपवाने में तीसरी पुस्तक में 50% की छूट ।यह पैकेज़ उक्त पैकेज का विस्तार स्वरूप है ।फ़िक्स्ड रेट। रेट निगोशियेबुल नहीं। भुगतान चेक के माध्यम से स्वीकार्य।पैन कार्ड की कापी लगाना अनिवार्य।
सिल्वर पैक + योजना :-वस्तुत यह योजना सिल्वर पैक योजना का विस्तार रूप है। इसमे मनमाफ़िक समीक्षा कराने का अतिरिक्त शुल्क।स्थानीय दो पत्रों में समीक्षा लिखवाने का शुल्क अलग। राज्यस्तरीय अखबारों में समीक्षा प्रकाशित करवाने का शुल्क अलग।टटपुँजिए समीक्षकों से समीक्षा करवाने पर शुल्क में छूट देने पर विचार किया जा सकता है।कृपया मोल तोल कर इस संस्था को शर्मिन्दा न करें।
विशेष योजना : पुस्तक को विवाद में लाने हेतु अतिरिक्त चार्ज़ लगेगा। प्रतियाँ जलवाने हेतु पेट्रोल किरासन का खर्च 500/- अतिरिक्त। पुस्तक की प्रतियां आप के मद में जायेंगी।भीड़ जुटाने का खर्च अलग प्रति व्यक्ति 100/- के हिसाब से चार्ज़ किया जायेगा ।इस में नाश्ता-पानी का खर्च शामिल नहीं है । यह योजना नवोदित लेखकों के लिए विशेष लाभकारी व शुभकारी है
गोल्डेन पैक योजना :-इस योजना में लेखक यदि सम्मान भी करवाना चाहता है तो उसका भी खर्च शामिल है।ढाबे में सम्मान कराने का दर अलग।यह पैकेज़ ग्रामीण और कस्बई लेखकों के लिए उचित है।मान सम्मान में धन नहीं देखते।सम्मान है तो धन है नहीं तो टन-टना-टन है।प्रतिष्ठित लेखकों के लिए अन्य योजना। पाँच सितारा होटल में 5-लाख रुपये। लेखक के 11-अतिथि मुफ़्त।
डायमंड पैक योजना :- लेखकगण कृपया इसे डायमंड बुक्स वालों की योजना न समझें ।यह हमारे प्रकाशन की विशेष योजना है जो विशेष रुप से अनिवासी भारतीय [N R I ] लेखकों के लिए बनाई गई है। कृपया देसी और विशेषत: कस्बई लेखक इस योजना के पढ़ने में अपना समय व्यर्थ न करें।इस योजना में प्रकाशन का भुगतान नगद और "डालर" में लिया जायेगा।अनिवासी भारतीय लेखक प्रकाशनोपरान्त कब भारत छोड़ वापस लौट जाय अत: सुरक्षा हेतु ’अग्रिम-भुगतान’ ही लिया जायेगा
इस योजना के अन्तर्गत पुस्तक का प्रकाशन ,पंच सितारा होटल में किसी विशिष्ट व्यक्ति के कर कमलों से विमोचन एवं लेखक के 11-अतिथियों की सेवा मुफ़्त।इस योजना में अतिथियों के आने जाने और ठहरने का खर्च शामिल नहीं है -लेखक को स्वयं वहन करना पड़ेगा। इस योजना का मूल्य मात्र 10,000 डालर......
प्रकाशन खर्च पढ़ कर मैं मूर्छित हो गया ।वह तो भला हो उस सुन्दर कन्या का जिसने मेरे मुंह पर पानी के छींटे डाल कर किसी तरह मुझे चेतनावस्था में ले आई ।फिर पूछा-
"क्या हुआ अंकल !"
"कुछ नहीं बेटी! रात नींद ठीक से नहीं आई थी"
’यस सर ! मैं आप की क्या सेवा कर सकते हैं व्हाट आई कैन हेल्प यू सर! आप चाहें तो 10,000 डालर का भुगतान ’आप अपने क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं।" -मैनेज़रनुमा प्रकाशक ने समझाया
"आप के पास ’क्रेडिट कार्ड’ है अंकल ?" -कन्या ने पूछा-" किस बैंक का है?"
"नहीं बेटा ! मेरे ऊपर ’क्रेडिट’[उधार] तो है, कार्ड नहीं है"-मैने विशुद्ध हिन्दी लेखक की तरह अपनी दयनीयता प्रगट की
"आप ने ’रायल्टी’ के बारे में कुछ नहीं लिखा है= मैने मैनेज़र से जिज्ञासावश पूछ लिया
"सर ! हम रायल्टी नहीं देते । बस किताब छाप कर लेखकों का उत्साहवर्धन करते रहते हैं। हिन्दी की सेवा करते रहते हैं"
"ठीक ही कहा । पिछली बार भी एक प्रकाशक ने मेरी पुस्तक छाप तो दी मगर रायल्टी नहीं दी"
"देता कहाँ से? बिकती तो देता न......"--पीछे से एक आवाज़ आई। एक बूढ़ा आदमी ऐनक चढ़ाए -मुनीम- रज़िस्टर में कुछ हिसाब किताब कर रहा था -" तुम्हारे जैसे लेखकों की किताब छाप छाप कर इस हालत में पहुँचा हूँ कि मुनीमगीरी कर रहा हूं...."
मैने उस व्यक्ति को पहचानने की एक समर्थ कोशिश की--" अरे! श्रीमान आप? आप यहां?...
वह मेरे पहले प्रकाशक थे।
स्पष्ट है ,मैने अपनी पाण्डुलिपि उठा ली और वापस चला आया ।
अस्तु।
-आनन्द.पाठक-
मैने पाण्डुलिपि तो भेजी नहीं थी ।मात्र शीर्षक देख कर ही रचना की श्रेष्ठता समझ लेने वाले प्रकाशक धन्यवाद के पात्र ही नहीं ,महापात्र होते हैं।कुछ-कुछ पाठक तो पुस्तक कवर पर प्रकाशित मनभावन लुभावन चित्र देख कर ही रचना की उष्णता का आकलन कर लेते हैं। ऐसे पाठक और प्रकाशक दोनो ही दुर्लभ प्राणी होते हैं
आशा बलवती राजन !सोचा एक बार पुन: प्रयास करना चाहिए।अगर भगवान ने मुझे बनाया है तो कहीं न कहीं मेरे प्रकाशक को भी बनाया होगा।आवश्यकता है तो मात्र ढूँढने की।पुन: अपनी पाण्डुलिपि लेकर निकल पड़ा।अपना व्यंग्य संग्रह लेकर एक प्रकाशक के पास गया। सर्वप्रथम तो उन्होने मुझे ऊपर से लेकर नीचे तक आद्योपान्त इस तरह देखा जैसे मैं कोई लेखक नहीं तिहाड़ जेल से छूट कर आया हूँ। फिर पूछा-"नाम?"
"अच्छा तो आप ही हैं जिसने "चलते चलते .." व्यंग्य में हम प्रकाशकों की खिल्ली उड़ाई थी? माफ़ करना बाबा ,हम चालू-चलन्त.लेखकों की कृतियाँ नहीं छापते।
। उन्होने "चलन्त" शब्द का प्रयोग ऐसे किया जैसे मैं किसी नगर पालिका का "चलन्त" कूड़ादान लिए फिर रहा हूँ । उनके चलन्त शब्द में मुझे "घुमन्त" प्रकाशन का ’अन्त’ शब्द का बोध हुआ। हे भगवान ! इस प्रकाशक को थोड़ी से सदबुद्धि भी दे ।मैं बाहर निकल आया
किसी साहब ने बज़ा फ़र्माया है
मैं इसे शोहरत कहूँ या अपनी रुस्वाई कहूँ
मुझ से पहले उस गली में मेरे अफ़साने गए
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मैं अपनी औक़ात समझ गया ।नवोदित लेखकों को ये सम्पादक एवं प्रकाशक औकात ही बताते हैं। परन्तु यह धरा अभी प्रकाशकों से विहीन नहीं हुई है ।सभी तो ’गब्बर’ खानदान से ताल्लुक नहीं रखते होंगे ? एक प्रकाशक महोदय मिल ही गए।दुकान खोल कर बैठे ही थे।स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि वह पुस्तक विक्रेता हैं कि प्रकाशक।शकल से दोनो ही का भाव का बोध हो रहा था। मेरी ही तरह खद्दर का कुर्ता व पायजाम पहने ,ऊपर से जवाहर जैकेट के ऊपर कंधे पर एक उत्तरीय। शकल से किसी नगरपालिका स्कूल के मास्टर ज़्यादा और प्रकाशक कम लग रहे थे॥ जब से सुना है कि कुछ घाघ प्रकाशक लेखकों की टोपियाँ उछाल देते हैं ,तब से मैने टोपी पहनना छोड़ दिया। न रहेगी टोपी- न उछलेगी पगड़ी।
मैने अपना परिचय दिया ।अपना दर्द समझाया। अपनी विवशता बताई। जब मैने ’गब्बर सिंह’ वाली घटना बताई तो द्रवित हो गए।आँखों में आँसू भर लिए। हृदय में वात्सल्य भाव उमड़
आया। बोले-" होता है बेटा ! होता है ऐसा।कुछ कुछ प्रकाशक होते हैं ऐसे । वे सरकारी प्रकाशक होते हैं ठेकेदार प्रकाशक होते हैं। उनको हिन्दी के उत्थान पतन विकास से कुछ नहीं लेना देना। वो हमारे जैसे नहीं होते कि हिन्दी और हिन्दी के उत्थान के लिए सारा जीवन होम कर दिया ,अर्पित कर दिया।अपनी जमा-पूँजी प्रेस में लगा दी और जवानी भी।हमें हिन्दी की सेवा करनी थी एक सच्चे सेवक की तरह...। चिन्ता नहीं करो बेटा ! देर से आये हो मगर दुरुस्त आये सही जगह आए ।समझो कि तुम्हारी तलाश खत्म ...तुम्हारी चिन्ता अब मेरी चिन्ता हो गई...नो लुक बियान्ड फ़र्दर।एक काम करो...।अपनी पाणडुलिपि छोड़ जाओ..पढ़ लूंगा...।एक सप्ताह बाद आ जाना ...बता दूँगा।
मैं उनके इस वात्सल्य प्रेम से अभिभूत हो गया ।मन श्रद्धा से भाव विभोर हो उठा\ सोचने लगा -कितना भला प्रकाशक है \विचारों से यह ’भारतेन्दु’ काल का लग रहा है । ऐसे ही प्रकाशकों के दम से तो यह हिन्दी अभी टिकी हुई है वरना ’कार्पोरेट प्रकाशक तो कब का.....
मैं धन्यवाद कह बाहर निकल आया।
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एक सप्ताह बाद
"आओ बेटा ! आओ ! बैठो।मैने पाण्डुलिपि पढ़ी।तुम अपने हो।तुम्हारा कष्ट देखा नहीं जा रहा है। बुरा न मानना। व्यंग्य श्यंग लिखना छोड़ दो।इस में कुछ नहीं रखा है।अमूमन व्यंग्य-श्य़ंग्य तो कोई पढ़ता नहीं ।व्यंग्य से ज़माने को नहीं बदल पाओगे।आईना दिखाने से ज़माना नहीं बदलता ,सिर्फ़ हँसता है। पिछली बार छपवाया था तो क्या हुआ? बिकी? एक भी बिकी? गोदामों में सड़ रही है।धूप दिखाने का खर्चा सो अलग।अरे भइया ,मेरी मानो तो "लालू-चालीसा’ लिखो.."मोदी महात्म" लिखो.."राहुल सप्तसती"- लिखो...कुंजी लिखो..गेस पेपर लिखो श्योर शाट पेपर लिखो..परीक्षा पास करने के 101 तरीके लिखो...अच्छे अंक कैसे प्राप्त करे लिखो...अभिनन्दन पत्र लिखो..स्वागत गान लिखो..बड़ी माँग है इनकी आजकल । लिखने वाला मालामाल ्छापने वाला मालपानी..गंगा बह रही है हाथ धो लो..वरना व्यंग्य लिखते रहोगे तो लँगोटी भी उतर जायेगी..। भई .अगर तुम हमारे प्रकाशन के लिए लिखो तो कुछ हम भी माल-टाल बना लें। 50%-50% / वरना तो यह व्यंग्य-श्य़ंग्य तो निठ्ठलों के चोचले होते है --न लीपने के काम का..न पाथने के काम का।बेटा ! तू जानता नहीं ,’--लिखने से ज़्यादा छाप कर बेंचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं..सरकारी कार्यालयों के ’सुविधा-शुल्क’ लाइब्रेरी में ठेलने का खर्च अलग ,कागज-स्याही का भी खर्चा नहीं निकलता..फिर पुस्तक मेले में खोमचे लगा लगा कर बेचना पड़ता है।
-" तो क्या व्यंग्य पेड़ पर उगते हैं? आप क्या जानो कि व्यंग्य लिखने में कितना ’रिस्क’ होता है कितने पापड़ बेलने पड़ते है कि बेचारा लेखक अन्त मे अचार-पापड़ बेचने लग जाता है"-मैने अपना दिव्य-ज्ञान बघारा ।
स्पष्ट था मैने अपनी पाण्डुलिपि उठाई और बाहर आ गया।
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मन विद्रोह कर उठा।जो भी हो-अब तो यह संग्रह छपवा कर ही रहना है ।यही संघर्ष है ,यही साधना है यही तपस्या है। यही हिन्दी सेवा है।
एक प्रकाशक के कार्यालय गया ।बड़ा नाम सुना था।ऊँची दुकान थी पकवान देखा नहीं था। सोचा पकवान भी देख लूं।अभी उनके कक्ष में घुसा ही था कि अपने चश्मे के ऊपर से घूरते हुए देखा और कहा-"अरे बाबा ! तू फिर इधर आ गया। पिछ्ली बार बोला न तेरे कू .बोला न, इधर कू जास्ती आने का नी। तू ही ’चलते चलते ....’ लिखा था न ? तो फिर रुक क्यूँ गया? आगे चलो न बाबा। हम तुम को बोला न ,हम व्यंग्य-श्यंग्य नही ्छापता । तू जास्ती इधर को आयेगा तो पुलिस वाला भी इधर कू आयेगा...माफ़ कर न मेरे बाप....।
बाद मेम ज्ञात हुआ कि उक्त प्रकाशक महोदय सचित्र रंगीन कहानियाँ , रंगीली जवानी..रंगीन रातें वयस्कों के लिए छापते हैं ।मुद्रक प्रकाशक का पता नहीं छापते ,गुप्त रखते हैं। हिन्दी की गुप्त सेवा करते हैं। इनकी छपी किताबें शहर की हर गली-खोली -नुक्कड़ पर गुप्त रूप से मिलती हैं जिसे शहर के लौण्डे छुप छुपा कर पढ़ते हैं । बड़े बड़े साहब लोग रात को बेडरूम में अकेले पढ़ते हैं। पैसे वाले प्रकाशक है बस पुलिस से डरते हैं।
मन भिन्ना गया।
थक हार कर एक मा‘ल में घुस गया।किसी प्रकाशक का था। प्रवेश हाल में एक सुन्दर से रिशेप्स्निस्ट ।चेहरे पर सदाबहारी प्लास्टिक मुस्कान.एक ही जुमला-व्हाट आइ कैन हेल्प यू ,सर !? भीतर एक बड़ा सा चमकता हुआ आफ़िस ।मार्ब॒ल की फ़्लोर। वातानुकूलित कक्ष ।कक्ष में एक बड़ा टेबुल ,बगल में एक बड़ा सोफ़ा।सोफ़ा के बगल में एक साइड टेबुल ..और उस पर कुछ पत्र-पत्रिकाये। टेबुल के उस तरफ़ एक घूर्णनदार कुर्सी। कुर्सी पर बैठा एक नवयुवक । सूट पहने टाई लगाये।आँखो पर एक बड़ा सा काला गागल्स चढ़ाए।किसी बड़ी कम्पनी का मैनेज़र लग रहा था । मैं संकोच में पड़ गया ,लगता है ग़लत जगह आ गया हूँ\यह सेन्ट्रल माल या स्पेन्सरमार्ट तो नही? यहाँ किताबें कहाँ छपती होंगी? बाहर निकलने वाला ही था कि मैनेज़र ने पूछ लिया
-" यस ! प्लीज़ ! मै आप की क्या सेवा कर सकता हूँ?"
-’ नहीं नहीं कुछ नहीं बस यूँ ही...."
-"प्लीज़ ! आप बैठें’-मैंउसके आग्रह पर सोफ़े पर बैठ गया । इसी बीच एक सुन्दर से कन्या बड़े ही करीने से एक ट्रे में कुछ पेय पदार्थ ले आई। एक हल्की सी मुस्कान बिखेरते हुए बोली-"प्लीज़"।
बिहारी होते तो एक दोहा लिख देते मैं था तो मैं संकोच में पड़ गया।अब उठ कर भाग भी नहीं सकता। पेय पीने के बाद कुछ तनाव कम हुआ।
-" जी बतायें ! मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ "- उक्त व्यक्ति ने पुन: पूछा
मैने अपनी सारी बात बताई । अपनी व्यथा समझाई ।कथा सुनाई। मैनेज़र ने कहा -" नो प्रोब्लेम" काम हो जायेगा ।आप की किताब छप जायेगी। बस आप पैकेज़ सलेक्ट कर लें । मिनी ! सर को वह बुकलेट दे दो"
मैने ’पैकेज़’ को ’पैकेट’ समझा । हिन्दी का लेखक हूँ सम्भवत: ’रायल्टी’ का पैकेट होगा !मिनी बिटिया मुझे ’बुकलेट’ थमा गई
पढ़ा तो ’लेट’[स्वर्गीय] होते होते बचा।वह ्पैकेज़-बुकलेट’ ्क्या था ..समझिए कि ’पाकेट-कर" [पाकेट मार नहीं] था। सुधी पाठकों की ज्ञान वर्धनार्थ संक्षेप में प्रकाश डाल रहा हूँ। मैं तो नसानी तुम ना नसैहों।
सिल्वर पैक योजना : यानी मात्र पुस्तक छापने के 20,000/- रूपये।इस पैकेज़ में मात्र 500 प्रतियाँ ही छापी जायेंगी। 11-लेखकीय प्रतियाँ मुफ़्त।पुस्तक यदि ’हार्ड बाऊण्ड’ में छपवानी है तो 2000 रुपये अतिरिक्त प्रभार लिया जायेगा । सभी टैक्स सहित। दो पुस्तके एक साथ छपवाने में तीसरी पुस्तक में 50% की छूट ।यह पैकेज़ उक्त पैकेज का विस्तार स्वरूप है ।फ़िक्स्ड रेट। रेट निगोशियेबुल नहीं। भुगतान चेक के माध्यम से स्वीकार्य।पैन कार्ड की कापी लगाना अनिवार्य।
सिल्वर पैक + योजना :-वस्तुत यह योजना सिल्वर पैक योजना का विस्तार रूप है। इसमे मनमाफ़िक समीक्षा कराने का अतिरिक्त शुल्क।स्थानीय दो पत्रों में समीक्षा लिखवाने का शुल्क अलग। राज्यस्तरीय अखबारों में समीक्षा प्रकाशित करवाने का शुल्क अलग।टटपुँजिए समीक्षकों से समीक्षा करवाने पर शुल्क में छूट देने पर विचार किया जा सकता है।कृपया मोल तोल कर इस संस्था को शर्मिन्दा न करें।
विशेष योजना : पुस्तक को विवाद में लाने हेतु अतिरिक्त चार्ज़ लगेगा। प्रतियाँ जलवाने हेतु पेट्रोल किरासन का खर्च 500/- अतिरिक्त। पुस्तक की प्रतियां आप के मद में जायेंगी।भीड़ जुटाने का खर्च अलग प्रति व्यक्ति 100/- के हिसाब से चार्ज़ किया जायेगा ।इस में नाश्ता-पानी का खर्च शामिल नहीं है । यह योजना नवोदित लेखकों के लिए विशेष लाभकारी व शुभकारी है
गोल्डेन पैक योजना :-इस योजना में लेखक यदि सम्मान भी करवाना चाहता है तो उसका भी खर्च शामिल है।ढाबे में सम्मान कराने का दर अलग।यह पैकेज़ ग्रामीण और कस्बई लेखकों के लिए उचित है।मान सम्मान में धन नहीं देखते।सम्मान है तो धन है नहीं तो टन-टना-टन है।प्रतिष्ठित लेखकों के लिए अन्य योजना। पाँच सितारा होटल में 5-लाख रुपये। लेखक के 11-अतिथि मुफ़्त।
डायमंड पैक योजना :- लेखकगण कृपया इसे डायमंड बुक्स वालों की योजना न समझें ।यह हमारे प्रकाशन की विशेष योजना है जो विशेष रुप से अनिवासी भारतीय [N R I ] लेखकों के लिए बनाई गई है। कृपया देसी और विशेषत: कस्बई लेखक इस योजना के पढ़ने में अपना समय व्यर्थ न करें।इस योजना में प्रकाशन का भुगतान नगद और "डालर" में लिया जायेगा।अनिवासी भारतीय लेखक प्रकाशनोपरान्त कब भारत छोड़ वापस लौट जाय अत: सुरक्षा हेतु ’अग्रिम-भुगतान’ ही लिया जायेगा
इस योजना के अन्तर्गत पुस्तक का प्रकाशन ,पंच सितारा होटल में किसी विशिष्ट व्यक्ति के कर कमलों से विमोचन एवं लेखक के 11-अतिथियों की सेवा मुफ़्त।इस योजना में अतिथियों के आने जाने और ठहरने का खर्च शामिल नहीं है -लेखक को स्वयं वहन करना पड़ेगा। इस योजना का मूल्य मात्र 10,000 डालर......
प्रकाशन खर्च पढ़ कर मैं मूर्छित हो गया ।वह तो भला हो उस सुन्दर कन्या का जिसने मेरे मुंह पर पानी के छींटे डाल कर किसी तरह मुझे चेतनावस्था में ले आई ।फिर पूछा-
"क्या हुआ अंकल !"
"कुछ नहीं बेटी! रात नींद ठीक से नहीं आई थी"
’यस सर ! मैं आप की क्या सेवा कर सकते हैं व्हाट आई कैन हेल्प यू सर! आप चाहें तो 10,000 डालर का भुगतान ’आप अपने क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं।" -मैनेज़रनुमा प्रकाशक ने समझाया
"आप के पास ’क्रेडिट कार्ड’ है अंकल ?" -कन्या ने पूछा-" किस बैंक का है?"
"नहीं बेटा ! मेरे ऊपर ’क्रेडिट’[उधार] तो है, कार्ड नहीं है"-मैने विशुद्ध हिन्दी लेखक की तरह अपनी दयनीयता प्रगट की
"आप ने ’रायल्टी’ के बारे में कुछ नहीं लिखा है= मैने मैनेज़र से जिज्ञासावश पूछ लिया
"सर ! हम रायल्टी नहीं देते । बस किताब छाप कर लेखकों का उत्साहवर्धन करते रहते हैं। हिन्दी की सेवा करते रहते हैं"
"ठीक ही कहा । पिछली बार भी एक प्रकाशक ने मेरी पुस्तक छाप तो दी मगर रायल्टी नहीं दी"
"देता कहाँ से? बिकती तो देता न......"--पीछे से एक आवाज़ आई। एक बूढ़ा आदमी ऐनक चढ़ाए -मुनीम- रज़िस्टर में कुछ हिसाब किताब कर रहा था -" तुम्हारे जैसे लेखकों की किताब छाप छाप कर इस हालत में पहुँचा हूँ कि मुनीमगीरी कर रहा हूं...."
मैने उस व्यक्ति को पहचानने की एक समर्थ कोशिश की--" अरे! श्रीमान आप? आप यहां?...
वह मेरे पहले प्रकाशक थे।
स्पष्ट है ,मैने अपनी पाण्डुलिपि उठा ली और वापस चला आया ।
अस्तु।
-आनन्द.पाठक-
रविवार, 25 मई 2014
व्यंग्य 22 : चिरौंजी लाल कहिन.....
चिरौंजी लाल कहिन........
"शादी तो जनाब हमारे ज़माने में हुआ करती थी । आजकल जैसा नहीं कि बस चट मँगनी और पट विवाह ,झटपट तलाक। शाम ढले बारात गई और रात रहे वापस"- आते ही आते गुस्से से भरे चिरौंजी लाल ने कहा
-" आज सुबह ही सुबह किधर से आ रहे हैं ?"-मैने जिज्ञासा प्रगट की
" अरे जनाब ! मत पूछिए। भिखमंगे हैं सब भिखमंगे। कहते थे कलकत्ता में बिजनेस है,मुम्बई में बिजनेस है। सुबह होने से पहले ही हाथ जोड़ लिए।न नाश्ता .न पानी। विदाई कर दी...ढोल के पोल है सब...। यह भी कोई शादी हुई ? आप ही बताइए।"
मैं उनकी मुखाकॄति व आक्रोश भाव से समझ गया कि आज फिए किसी बारात से सीधे आ रहे हैं और वहाँ उनकी सेवा भाव में कुछ कमी रह गई होगी।
"अरे कोई बात नहीं ,हम आप को नाश्ता-पानी करा देते हैं’- मैने तो यह बात मित्र-धर्म भाव से कही थी परन्तु श्रीमती जी सचमुच नाश्ता-पानी की व्यवस्था करने चली गईं\चिरौंजी लाल जी सद्य: अनुभवित शादी वृतान्त क्रम जारी रखे रहे।
"....जनाब शादियाँ तो हमारे ज़माने में हुआ करती थीं। क्या शादियाँ हुआ करती थीं।साल भर से बात चला करती थी।जाति परखी जाती थी ,परिवार परखा जाता था,खानदान परखा जाता था खून परखा जाता था।अब आप समझिए कि उस ज़माने में लड़्का-लड़की की शादी नहीं हुआ करती थी ’मूछों’ की शादी होती थी । गाँव की इज़्ज़त का सवाल होता था। गाँव की मूछ नीची नहीं होनी चाहिए।बाबू साहब की मूँछ नीची हो गई तो पूरे गाँव की मूछ नीची हो जायेगी।चिरौंजी लाल जो कहिन सो कहिन..।
और अब?
-"अब तो लोगो ने मूछें ही रखना ही छोड़ दिया।क्लीन शेव हो गये सब के सब...."
चिरौंजी लाल अपना दुख दर्द सुनाते रहे और बीच बीच में मैं हाँ हूँ करता रहा, उनको यह प्रतीत न हो कि मैं उनका कथा-पुराण नहीं सुन रहा हूँ।उनका आख्यान जारी रहा।
"....कितने शान से हम लोग कहा करते थे फ़लाना गाँव में हमारी बेटी व्याही हुई है।हमारी बेटी ,माने सारे गाँव की बेटी। पूरा गाँव घराती हो जाता था।चिरौंजी लाल जो कहिन सो कहिन ...। और अब...?अब तो समझिए जनाब कि....अखबार में विज्ञापन देकर शादी कर रहे हैं...जैसे एवरेस्ट मसाले...अशोक मसाले...बेंच रहें हो...."
चिरौंजी लाल जी अभी और कुछ ’पुराने ज़माने’ ’नये ज़माने’ की तकनीकी पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते और बीच बीच में ’कहिन सो कहिन’ करते-मैनें बीच ही में बात काटना उचित समझा। बिल्कुल वाल्मीकि जी की तरह स्वत: एक श्लोक अकस्मात प्रस्फुटित हो गया-
पुराणमित्येव न साधु सर्वम् ,न चापि सर्वम नवेति अवद्यम्
सन्त: हृदयात् अन्त: परिक्ष्यते ,मूढ: परिप्रत्यनेव बुद्धि
अर्थात हे चिरौंजी लाल! यह परम्परा पुरानी है इसलिए सब कुछ अच्छा है और यह परम्परा नई है इसलिए अच्छा नहीं है- ऐसी बात नहीं है। श्रेष्ठ जन किसी भी चीज़ को पहले हृदय से विचार करते हैं जब कि मूढ़ लोग तुरन्त मान लेते हैं
मेरे इस अक्स्मात व अप्रत्याशित श्लोक वाचन से चिरौंजी लाल जी का मुँह खुला का खुला रह गया जैसे लालू जी ने ’जूलियस सीज़र’ का कोई संवाद बोल दिया हो।चेतनावस्था में आते ही उन्होने अपनी शंका प्रस्तुत की-" तो जनाब ! पूर्व जनम में आप संस्कृताचार्य थे?"
" अरे नहीं भाई !जैसे पूर्व जनम में आप नारद नहीं थे’-मैने कहा
फिर हम दोनों सद्य: नेवेदित परस्पर विशेषणों पर हँसने लगे कि इसी अन्तराल में श्रीमती जी ने नाश्ता प्रस्तुत किया
ऽऽऽऽ ----- ..............
चिरौंजी लाल कोई काम करते हो या न करते हों ,परन्तु एक काम बड़े मनोयोग और ईमानदारी से करते हैं-और वो काम है हर किसी की शादी में शामिल होना। मुहल्ले में किसी की शादी हो और चिरौंजी लाल जी शामिल न हों-हो नही सकता।
दुनिया इसे उनका आत्मसुख मानती है पर वो इसे पुनीत कार्य में अपना ’योगदान’ मानते हैं।यदा-कदा अपने इस योगदान में उन्हें ख़तरा भी उठाना पड़ जाता है विशेषत: तब जब ’वर-पक्ष’ और ’कन्या-पक्ष’ किसी बात पर वास्तविक रूप से भिड़ जाते हैं। और इनके पक्ष वाले इन्हें अग्रिम मोर्चे पर किसी सैनिक की तरह खड़ा कर देते हैं और एकाध डंडा ये भी खा लेते हैं। ऎसे लोग महान होते है,हानि-लाभ से परे होते हैं,यश-अपयश से ऊपर होते हैं,हास-परिहास से मुक्त होते हैं। निन्दा-स्तुति से निर्विकार होते हैं। इनके इन्हीं गुण विशेष और विशेषत: इनके इसी योद्धापन से प्रभावित होकर, मुहल्ले वाले शादी का प्रथम निमन्त्रण पत्र इन्हें अवश्य भेंजते हैं।
चिरौंजी लाल जब किसी बारात से लौट कर आते हैं तो किसी विजयी योद्धा की तरह सप्ताह पर्यन्त आद्योपान्त सजीव वर्णन करते हैं । द्वार पूजा से लेकर विदाई तक।कैसे नत्थू भाई ने गोली चलाई कि घोड़ी भड़क गई।कैसे घोड़ी ने दुलत्ती मारी कि दुल्हे भाई जमीन पर आ गिरे।कैसे लड़की वालों ने मितव्ययिता का परिचय दिया कि एक ही कुल्हड़ में मिठाई और नमकीन रख दी । नाश्ता कर लेना और उसी कुल्हड़ से पानी पी लेना। कैसे हम बारातियों ने लड़की के बाप के पसीने छुड़ा दिये कि अन्त में पानी माँगने लगा।कैसे लड़के ने ’खिचड़ी’ नहीं खाई तो लड़की के बाप ने पैर पर ’पगड़ी’ रख दी। मुहल्ले वाले बड़े चाव से सुनते थे ऐसे क़िस्से।सम्भवत: वो भूल जाते थे कि उनके भी घर में कोई लड़की है जिसकी शादी में ऐसा ही कोई चिरौंजी लाल आयेगा।......
लेकिन उससे ज़्यादा रोचक प्रसंग वह तब सुनाते थे जब किसी शादी में वास्तविक लड़ाई हो जाती थी और ’वर-पक्ष’ और ’कन्या-पक्ष’ सशरीर भिड़ जाते थे।तब चिरौंजी लाल जी बराती न होकर ’योद्धा’ बन जाते थे। फिर ’लोहा सिंह’ के नाटक की तरह वर्णन करते थे--"....जब मैं काबुल के मोर्चे पर था ...खदेरन का मदर...तब दुश्मन की फ़ौज़ को...। कैसे हलवाई की भट्टी से एक जलता हुआ चैला निकाला ...कि सारे लड़की वाले भाग खड़े हुए"। इनकी अपनी वर्णन शैली है और इनका अपना इतिहास है।
चिरौंजी लाल का वास्तविक नाम ’चिरंजीव लाल ’ है ।उनके माता-पिता ने कितना सोच कर इतना अच्छा नाम रखा था। मगर वो जब से शहर में आ कर बसे है कि चिरंजीव लाल से ’चिरंजी लाल’ हो गए औए कालान्तर में भाषा-विज्ञान के श्राप से ’चिरौंजी लाल ’ हो गए। शहरवालों की यह अपनी नामकरण शैली है-जैसे गाँव का ’लालू’ शहर में आकर ’लल्लू’ और फिर ’ललुवा’ हो जाता है। जैसे पहले यहाँ का श्रमिक मारीशस सूरीनाम में पहले ’एग्रीमेन्ट-लेबर’ फिर ’एग्रेमेन्टिया लेबर ’ और अन्त मे ’गिरमिटिया लेबर’ हो जाता था। भाषा-विज्ञान में इसे मुख-सुख कहते हैं।
चिरौंजी लाल अपना कोई काम करें न करें परन्तु दूसरों का काम करने हेतु सर्वदा तत्पर रहते हैं।किसी का कोई कचहरी का काम हो,आफ़िस पोस्ट-आफ़िस का काम हो,स्कूल-अस्पताल का काम हो ,हमेशा आप के साथ खड़े मिलेंगे। परन्तु थाना-पुलिस के कार्यों से क्यों दूर रहते हैं आज तक रहस्य बना हुआ है।उनके इन्ही गुण-विशेष से उन्हें कभी भी चाय-पानी की दिक्कत नहीं हुई।जहां बैठ गए ,वहीं महफ़िल।मुद्दों की कोई कमी नहीं।बिना मुद्दे के वह घंटों गुज़ार सकते हैं किसी सिद्ध नेता की तरह। आवश्यकता है तो बस छेड़ने की।फिर क्या!
अख़बार का पुलिंदा दबाए चिरौंजी लाल जी सुबह ही सुबह पधारे
"...कैसे कैसे हो गए हैं आजकल लोग ,दहेज के नाम पर...हर लड़के का बाप लगता है कि भूखा-नंगा खड़ा है...कैसे नोच लें लड़की के बाप को...?"
मैं समझ गया आज फिर कोई लड़की फाँसी चढ़ गई । चिरौंजी लाल जी जारी रहे...
"....अरे जनाब ! दहेज तो हमारे ज़माने में लोग माँगा करते थे -देने वाला खुश.लेने वाला खुश।चिरौंजी लाल कहिन सो कहिन।जनाब एक बार एक बारात में गए थे हम,।...वर-पक्ष और कन्या-पक्ष में पहले से ही सब कुछ तय हो गया था। लड़की के पिता अच्छे गृहस्थ थे,अच्छी खेती बारी थी । बारात गई ,द्वार-पूजा हुई ,स्वागत भाव हुआ ,जलपान हुआ।मंगलाचरण के समय लड़के के पिता [समधी] की दृष्टि खूंटे पर बँधी एक गाय पर पड़ गई।समधी जी का मन विचलित हो गया।कैसे यह गाय माँगी जाय। लेन-देन तय होते समय यह ’गाय’ सूची में तो नहीं थी । अब इसे कैसे जोड़ा जाय।अब उन्हें द्वार-पूजा,पाँव-पूजा मंगला चरण विधि-विधान से कोई लगाव नहीं रह गया । यह सब तो पंडितों का काम है वो तो कर ही रहे हैं ।हमें तो ’गाय’ लेनी है ,जुगत भिड़ानी है।लड़के के बाप जो ठहरे।
द्वार-पूजा कार्यक्रम के पश्चात ,बारात वर ठहराव स्थल [जनवास] वापस भी आ गई।मगर समधी जी का मन वहीं द्वार पर बँधी ’गाय’ में अटक गया।विवाह के अगले कार्यक्रम की तैयारी होने लगी मगर समधी जी उधेड़ बुन में लग गए।कन्या-पक्ष से ’वर-मेटी’[आज्ञा] माँगने का संदेश आया। अचानक समधी जी का दिव्य-ज्ञान जग गया-यही अवसर है बदले में गाय माँगने का।अत: उन्होने नि:संकोच अपनी माँग रख दी।इस अकस्मात और असामयिक माँग से कन्या-पक्ष ’भौचक’ हो गया और उस के बाद ’भौं’..भौं..चक..चक शुरु हो गया}अब कन्या-पक्ष ने अपनी असमर्थता व्यक्त की। दोनों पक्षों में हुज्जत शुरु हो गई। दोनो समधी ’मुख-सुख’ पर उतर आये।’आप ने मुझे क्या दिया....आप ने मुझे कहाँ का छोड़ा...अरे अपनी भी इज्जत है 10 गाँव में.......तो हम क्या भिखमंगे नज़र आते हैं ..हम लड़के के बाप है ..लड़के के....
विवाद निरन्तर बढ़ती ही जा रहा था । चिरौंजी लाल का ’योद्धापन’ करवटें बदलने लगा। उन्होने ’शिरस्त्राण’ और ’कवच’ पहना शुरु कर दिया न जाने कब इसकी आवश्यकता पड़ जाय।इसी वाद-विवाद के मध्य कन्या-पक्ष के किसी योद्धा ने ललकारा-"...अरे नहीं देता है मेटी तो छीन लो इस समधी के बच्चे से"
इस ललकार पर समधी जी सावधान हो गये।सचमुच अगर यह मेटी छिन जायेगी तो गाय नहीं मिल पायेगी। इस से पहले कि सचमुच कोई योद्धा आकर पॄथ्वीराज की तरह मेरी ’मेटी’ का अपहरण कर ले,समधी जी स्वयं मेटी लेकर पलायन कर गए। आगे आगे समधी जी ,पीछे पीछे कन्या पक्ष।अनिवर्चनीय दॄश्य। इससे पहले कि वह पकड़े जाते,समधी जी मेटी लेकर पेड़ पर चढ़ गए।कन्या-पक्ष ठिठक कर पेड़ के नीचे खड़ा हो गया बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमें एक कौआ था ,उसकी चोंच मे वर की मेटी थी और नीचे कई लोमड़ियाँ खड़ी थीं।.........
मान मनौव्वल अनुग्रह-मनुहार शुरु हो गया । समधी जी की वीरता महानता का बखान शुरु हो गया।लोग उनके पराक्रम के क़सीदे पढ़ने लगे, तो कुछ लोग स्तुति वाचन करने लगे।कुछ लोग पुराने रिश्तों की दुहाई देने लगे तो कुछ लोग उनकी वंश परम्परा का इतिहास बताने लगे। इन सबका असर न उन पर पड़ना था, न पड़ा।चिरौंजी लाल ने कहा -’कन्या के पिता को गाय दे देनी चाहिए ,अरे वर के पिता ने ’गऊ माता’ की इच्छा ही तो प्रगट की है ,कोई सोना-चाँदी तो नहीं माँगा है। आख़िर लड़के का बाप है ।उसका भी कुछ हक़ बनता है कि नहीं?"। बारातियों में से 2-4 लोगों ने समवेत स्वर से समर्थन किया।
अन्त में पण्डित जी ने संदेश भिजवाया-" जजमान शीघ्रता करें ,मुहुर्त निकला जा रहा है।अन्ततोगत्वा ,कन्या के पिता ने समधी जी से कहा-"आप के लड़के के लिए अपनी बछिया तो दे ही रहा हूँ महराज, आप के लिए गाय की बछिया दे दूँगा । अब तो नीचे उतर आइए।"
दोनों समधी अपनी लेन-देन की क्षमता पर आत्म-मुग्ध हुए। फिर शादी का कार्यक्रम आगे बढ़ा।समधी जी ने भी दान की बछिया के दाँत नहीं गिने। यह अन्य बात है कि कालान्तर में वह बछिया ’बाँझ’ निकली।
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आज चिरौंजी लाल के हाथ में कोई अख़बार तो नहीं था ,मगर माथे पर चिन्ता की रेखा अवश्य थी। चेहरे पर कुछ सकुचाहट का भाव था जैसे वो कुछ पूछना चाहते हैं ,मगर पूछ नहीं पा रहे हों।अन्तत: उन्होने पूछ ही लिया
" किब्ला, ये इन्टर्नेट चैटिंग क्या बला होती है?"
" जब हम-आप टाइम पास करते हैं तो ’गलाचार’ कहते हैं और जब कम्प्युटर के माध्यम से लड़का-लड़की आपस में बात करते हैं तो ’इन्टर्नेट-चैटिंग’ कहते हैं। मगर आप को क्या आन पड़ी?"
-’सुना है फ़िरंगी लाल का बेटा इन्टरनेट चैटिंग से शादी कर रहा है। चैटिंग से शादी कैसे होती होगी? इसमें बारात में जाने का अवसर मिलता है क्या?"-चिरौंजी लाल ने अपना दर्द बताया
अब मैं पूरा मामला समझ गया।चिरौंजी लाल जी की चिन्ता का कारण-बारात सुख से वंचित- भी समझ गया। फिर मैने उन्हे विस्तार से समझाया कि कैसे लड़का-लड़की इंटरनेट से बातें करते हैं ,फिर एक दूसरे को समझते-बूझते हैं ,मिलते-जुलते हैं फिर शादी करते है। कभी कभी ’चैटिंग’ में ’चीटिंग’[धोखा] भी हो जाती है।
अभी मैं उन्हे समझा ही रहा था कि चिरौंजी लाल बीच में ही बोल उठे-’राम राम राम ! कईसा घोर कलियुग आ गया है ।जनाब! शादी से पहले मिलना-जुलना??"
-"हाँ ,तो क्या हुआ?"
-" आप कहते हैं कि क्या हुआ? अरे! कहिये कि क्या नहीं हुआ?’शादी से पहले मिलना-जुलना? तो बचा ही क्या?’चैटिंग से शादी? न खून का पता,न ख़ानदान का पता -चिरौंजी लाल कहिन सो कहिन
न अगुआ ,न पंडित ,न नाऊ
इन्टर्नेटी शादी देन हाऊ ?
[अगुआ : वो व्यक्ति जो दोनो पक्षों के बीच शादी और बातचीत लेन देन तय कराने में आगे रहता है और झगड़ा होने पर भाग जाता है फिर दोनो पक्ष उसे मिल कर खोजने लगते हैं]
’वाह वाह क्या मिसरा पढ़ा है ....सुभानाल्लाह सुभानाल्लाह..’-मैने दाद दिया उन्होने सर झुका लिया।
"अरे ! शादी तो जनाब हमारे ज़माने में हुआ करती थी ...शादी से पहले मिलना जुलना तो दूर.....लड़का लड़की एक दूसरे को देख भी नहीं सकते थे।
एक बार एक लड़के ने शादी से ठीक 2 दिन पहले लड़की देखने की इच्छा प्रगट की----जानते हैं लड़की के बाप ने क्या कहा? कहा-अगुआ जी !अगर यह लड़का मेरा होने वाला दामाद न होता न तो देता कान के नीचे दो...आज उसी लड़के का लड़का इंटरनेट से शादी कर रहा है...राम राम राम क्या घोर कलियुग आ गया है !"
" आप तो इन्हीं दकियानूसी विचारों के कारण अब तक यहीं बैठे रह गए।आगे नहीं बढ़ पाए "-मैने छेड़ा
’जनाब ! हम तो शादी कर के बैठे हैं ,वो तो तलाक़ दे के बैठे हैं"-चिरौंजी लाल जी ने रहस्य समझाया
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"दहेज के नाम पर लड़की ने बारात वापस कर दी ...कानपुर देहात..लड़के के पिता ने..." -चिरौंजी लाल जी ने आते ही आते मेरे सामने अख़बार पटक दिया। मैं समझ गया अब यह ’हिज मास्टर वायस’ की तरह पूरा रिकार्ड बजा कर ही दम लेगा।
-"...लड़की ने बारात वापस कर दी...? चिरौंजी लाल जी शुरु हो गए-"..राम राम राम ,क्या ज़माना आ गया।अरे बारात तो हमारे ज़माने में वापस हुआ करती थी।" न भूतो,न भविष्यत’। ऐसी घटनायें ,सैकड़ों में एक होती हैं। भृगु क्षेत्र बलिया गया था । कन्या पक्ष से आमन्त्रित था। बारात काशी क्षेत्र से कहीं से आई थी।लेन-देन में क्या तय हुआ था यह पता न चलता अगर उस रात झगड़ा न हुआ होता ।बारात सही समय पर पहुँची,द्वारपूजा हुआ ,मंगलाचरण हुआ। पता नहीं किस बात पर उन्नीस-बीस हो गई।
दोनों समधी एक ही व्यवसाय के थे ,समान मेधा स्तर के थे।दोनों ही पैसे को दाँत से पकड़ते थे। दोनों की मान्यता थी जो पैसा जेब से न निकले ,वही आमदनी है ,वही कमाई है।दोनों अपने को मितव्ययी कहते थे पर दुनिया उन्हे ’कंजूस’ कहती थी।कन्या के पिता को लगा कि जो स्वर्ण-हार वर पक्ष को चढ़ाना था वह किधर है? तो वर के पिता को लगा कि जो धनराशि लेन-देन में तय हुआ था वो किधर है? दोनो पक्ष अविश्वास के वातावरण से ग्रसित हो गये। फिर दोनों पक्षों के लोगों ने अपने अपने पक्ष को हवा देना शुरु कर दिया । अविश्वास का बादल घनीभूत होने लगा।
दोनों लोग पुनर्संशोधित ’लेन-देन’ पर बहस कर ही रहे थे कि ’तम्बू-कनात’ वाले को कुछ शंका हो गई।इस पानीपत की लड़ाई में उसे अपना पैसा डूबता नज़र आया।तम्बू लगाया तो था लड़के वालों के लिए पर सट्टा[Agreement] किया था लड़की वालों ने। बारात वापस चली गई तो पैसा किस से वसूलेगा? लड़के वाले फिर कहाँ मिलेंगे?यही सुनिश्चित करने के लिए उस ने अपने बिल के भुगतान हेतु ’वर के पिता के समक्ष प्रस्तुत किया।वर के पिता भड़क उठे। डाँटते हुए भगा दिया -" हमसे क्यों माँगता है? जा उन से माँग जिस ने तुम से सट्टा किया है। इस अप्रत्याशित उत्तर से तम्बू वाला सकपका गया।
वर पिता यह रहस्य जानते थे कि सट्टा तो कन्या के पिता के नाम है। हम क्यों भरें? वही भरें ,वही भुगतें। जो ही 3000/- 4000/- की बचत होगी।ऊर्जा की बचत-ऊर्जा की कमाई।तम्बू वाला अब कन्या के पिता के पास गया।अपनी व्यथा कथा सुनाई।अब कन्या के पिता श्री के भड़कने की बारी थी ।
’क्या कहा?सट्टा हमने किया है ? लड़के वाले ने ऐसा कहा?अरे वो तो हमने उनके कहने पर उनकी तरफ़ से मदद के तौर पर तम्बू-कनात की व्यवस्था करा दी वरना लाते अपने यहाँ से।भलाई का ज़माना ही नहीं रहा ।अब कहते हैं कि पैसा नहीं देंगे। यह तो धोखाधड़ी है , विश्वासघात है । हे राम ! क्या ज़माना आ गया!आदमी का आदमी पर भरोसा करना मुश्किल हो गया...."
’मालिक हमारा हिसाब हो जाता तो ..."-तम्बू वाले ने गुहार लगाई
"अरे ! ठहर तो ज़रा ,क्या शोर मचाता है ...ज़रा फेरे तो पूरे होने दे ..हम कौन से भागे जा रहे हैं ...कि तू मरे जा रहा है ?"
सिन्दूरदान हो गया।फेरे भी पूरे हो गये।कन्या के पिता ने तम्बू वाले को बुलाया-" ला अपना बिल ...ले अपना हिसाब। कहते हैं सट्टा मेरे नाम से है ...तो जा उखाड़ दे तम्बू ...’-कन्या के पिताश्री ने आदेश दिया।
उधर वरपक्ष तम्बू में बैठ कर अगली रणनीति पर गहन विचार कर रहा था कि तम्बू वाले ने सचमुच तम्बू उखाड़ना शुरु कर दिया । इस अप्रत्याशित ’तम्बू उखाड़न प्रक्रिया’ से वरपक्ष भौचक रह गया। अब कौन सी रणनीति बनेगी ? युद्ध में जो पहले प्रहार कर दे वो विजयी।अब खुले आसमान के नीचे बारात पड़ी रहे ये तो सरासर अपमान है। अरे भाई ,हम लड़के वाले हैं ,कोई उठाईगीर नहीं । वर पक्ष के सिपहसालारों ने सलाह दी-" अरे तम्बू उनका है तो क्या रेलवे प्लेटफ़ार्म तो उनका नहीं । अब अगली रणनीति हम वहीं बैठ कर बनायेंगे।
आधी रात को पूरी की पूरी की बारात रेलवे प्लेटफ़ार्म पर आ गई- चिरौंजी लाल ने बताया
"नहीं ,पूरी बारात तम्बू उखड़ने के पहले ही प्लेटफ़ार्म पर आ गई थी"- मैने संशोधन प्रस्तुत किया
"अरे! आप को कैसे मालूम? घटना तो 30 साल पुरानी है"- चिरौंजी लाल विस्मित हो गए
" क्योंकि उस शादी की रात मौर पहने खाली पेट प्लेटफ़ार्म पर मैं ही सोया था"
" अजी छोड़िए भी ,क्या एक ही बात को फेंट रहे है 30-साल से"--श्रीमती जी ने सकुचाते हुए कहा और नाश्ता रख कर भीतर चलीं गईं
अस्तु
-आनन्द.पाठक
रविवार, 14 जुलाई 2013
व्यंग्य 20 : पोस्टमार्टम एक गीत का..
[और वो गीत है १....२...३...४..५..६..७...८..९..१०..११..१२..बारा तेरा]
जब से ’शोले’ फ़िल्म ’न भूतो ,न भविष्यति’ पद को प्राप्त हुई है तब से कई फ़िल्मकार इस पद पर पुनर्स्थापना हेतु निरन्तर प्रयासरत हैं। जिसे देखो वही ’शोले’ फ़िल्म का ’रिमेक’ बना रहा है । ्तेलगु से लेकर हिन्दी तक ,मलयालम से लेकर भोजपुरी तक।हर कोई चाहता है कि उसे ’गब्बर सिंह’ वाली भूमिका मिले। अब ’बाबी डार्लिंग ही बच गईं है । हर कोई ’गब्बर सिंह’ की तरह संवाद अदायगी कर रहा है- कितने आदमी थे? आयं ! लगा तो निशाना इस हरामजादे पर। हा! हा ! हा! यह भी बच गया स्साला ! लगता है आने वाली पीढ़ी ’गाँधी’ जी के विचार भूल जायेगी मगर ’गब्बर जी’ के डायलाग नहीं भूल पायेगी।इसी उत्साह से अति प्रभावित होकर हमारे युवाओं ने माँग रख दी -बहुत पढ़ चुके हम ’सूर’ कबीर’ तुलसी’। सूर सूर तुलसी शशि।अब समय आ गया है नये युग के साथ चलने का । कुछ नई सोच का।हमारा मानना है कि हमारे हिन्दी के अति कठिन पाठ्यक्रमों में’बम्बईया फ़िलिम’ का भी एक पाठ्यक्रम शामिल किया जाय।इससे हिन्दी को एक नया बल मिलेगा ,एक नई दिशा मिलेगी,एक नया सोच मिलेगा। हमें फ़िलिम देखने का औचित्य मिलेगा। गुरु जी को विदेश जाने का आधार मिलेगा। देखने को तो हम फ़िल्में अब भी देखते हैं परन्तु इसका पठन-पाठन में कहीं उपयोग नहीं हो पा रहा है । यदि यह विषय पाठ्य क्रम में समाहित हो जाय तो कम से कम एक विषय में तो अच्छे नम्बर से पास हो जाते ।परन्तु सरकार है कि सुनती ही नहीं।लगता है कि अपुन का अब दादागिरी के बजाय ’गांधीगिरी’ करना पड़ेगा। आन्दोलन करना पड़ेगा..रास्ता जाम करना पड़ेगा..2-4 गाड़ियां फूँकनी पड़ेगी...भूख हड़ताल करनी पड़ेगी..आमरण अनशन करना पड़ेगा....युवाओं ने सोचा। हमारे युवा हमारे भविष्य हैं ।यही सोच कर सरकार ने प्रायोगिक तौर पर ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के रूप में शामिल कर लिया।युवाओं में एक नये उत्साह का संचरण हुआ। कुछ तो अपनी कंघी निकाल अपने अपने बाल सेट करने लगे कुछ लड़कियां ’गोरे गोरे मुखड़े पर काला काला चश्मा’ लगाने लगीं और कुछ छात्र ’वाह रे करिश्मा’ गाने लगे।नये पाठ्यक्रम की नई शुरुआत।’रजत-पट’ पर नये ’टेक्स्ट बुक’ लिखे जाने लगे ।कुछ प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छाप-छाप कर ’रजत(चाँदी) काटने लगे।कुछ हमारे जैसे बैठे-ठाले निठ्ठल्लुआ लेखक उन ’टेक्स्ट-बुक’ की कुंजी लिखने लग गये और भाग्य की कुंजी खोजने लग गये।कुछ लोग फ़िल्मों के संभावित प्रश्न और उत्तर और ’गेस-पेपर’ छापने में लग गये। कुछ शिक्षा विभाग में सक्रिय हो गये कि पाठ्य पुस्तकों में उनकी भी ’फ़िल्म’ शामिल कर ली जाय जो भले ही ’बाक्स-आफ़िस’ पे भले ही पिट चुकी हो ।कोर्स में लग जायेगी तो उद्धार हो जायेगा उधार निपट जायेगा। मरणोपरान्त का क्या भरोसा !वह जानता है कि एक बात पाठ्यक्रम में घुस गई तो अमर हो जायेगी यही फ़िल्म। हम क्या गलत कर रहें हैं? हिन्दी के बहुत से लेखक भी तो यही करते हैं। फिर यही पीढ़ी देख-देख (पढ-पढ़ )कर जवान होगी । शोध होगा चर्चा होगी सेमिनार होगा । हो सकता है कि इस फ़िल्म के तकनीकि पहलुओं के अध्ययन हेतु विदेश यात्रा का योग बने जैसे हमारे कुछ स्वनामधन्य साहित्यकारों ने ’विश्व-हिन्दी-सम्मेलन’ भारत में न कर ’न्यूयार्क. मे किया कि हिन्दी पल्लवित हो गई। फिर अमेरिका की धरती से पता चला कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये "इंडिया" में अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है । विश्व भाषा बनानी है तो विश्व-भ्रमण करना ही पड़ेगा। ******* सत्र प्रारम्भ हो गया। कक्षायें शुरू हो गईं।नया नया पाठ्यक्रम है । अभी प्रशिक्षित अध्यापकों का टोंटा है। एक दो ’मास्साब’ से ही कार्य चलाना है ,कोर्स उठाना है। एक मास्टर साहब वयोवृद्ध हैं ,गांधी टोपी लगाते हैं ,बन्द गले का कोट पहनते हैं।पौराणिक काल के लगते हैं ।कालेज प्रशासन ने उन्हें ’धार्मिक’ पौराणिक एवं ऐतिहासिक फ़िल्में पढ़ाने का दायित्व सौंपा है।सप्ताह में 3 क्लास लेना है ।जब वो धार्मिक फ़िल्म ’सती अनसूईया’ व ’राम वनवास’ आदि पढ़ाते हैं तो भाव-विभोर हो जाते हैं।आंखें बन्द कर तल्लीन हो जाते हैं कि ...कैसे भगवान राम अयोध्या का सिंहासन छोड़...कैसे सीता मईया भगवान राम के साथ..घर ते निकसी रघुबीर बधु ,,..धरि धीर दिए मग में डग द्वै....कि उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकल पड़ती है। गुरु जी की इस ’चक्षु-मूँदन’ क्रिया का उचित लाभ उठा कर कुछ नवयुवक विद्दार्थी क्लास छोड़ ’कैन्टिन-गमन’करने लगते थे ।जब राम जी ’वन-गमन’ से लौटेंगे तो यह भी अपनी क्लास में लौट आयेंगे। परन्तु जो प्रागैतिहासिक व पौराणिक काल की छात्रायें हैं वो बड़े ही मनोयोग व श्रद्धा भाव से सर पर ओढनी रख कर ’सीता-हरण’ का लेक्चर अटेन्ड करती हैं और अपनी अभ्यास पुस्तिका में रह रह कर कुच नोट करती रहती हैं।यद्दपि ऐसे क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति प्राय: नगण्य ही होती है ।परन्तु जब रोमान्टिक फ़िल्मों का ’उदभव और विकास’ पढ़ाया जाता है तो उपस्थिति आवश्यकता से अधिक सन्तोषजनक रहती है। अध्यापक महोदय भी युवा किस्म के हैं।सलीके से बाल निकाल कर आते हैं। जीन्स पैन्ट व टी-शर्ट पहनते हैं । ’गागल्स’ सर पर रख लेते हैं मस्तिष्क प्रदेश पर। जिस फ़िल्म पर व्याख्यान देना होता है देर रात तक देख कर आते हैं ,फिर सुबह विस्तार से समझाते हैं। प्रेम क्या है ? प्रेम के स्वरूप क्या है?उसके प्रकार क्या हैं? उसकी परिभाषा क्या है? बीच बीच में अपने कथन की पुष्टि हेतु युगल-गीत भी-सस्वर..भाव-भंगिमापूर्ण ।लौकिक ,दैहिक व अलौकिक प्रेम क्या है? अमुक फ़िल्म में प्रेम के त्रिकोण में तीसरा कोण कहाँ था? कुछ जीन्स धारिणी छात्रायें अपना त्रिकोण खोजने लगती थीं। गुरु जी विस्तार से समझाते हैं कि अमुक फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान ने कहाँ लचर ऐक्टिंग की है ।यदि इस फ़िल्म में वो हीरो होते तो वो फ़िल्म बाक्स-आफिस पर यूँ न पिटती। हम पिट जाते वो अलग बात है।प्रेम विषयक फिल्मों पर विशेषत: प्रणय-आलिंगन-चुम्बन जैसे दृश्यों पर इनके गहरी पकड़ है संभवतया गहरा अनुभव भी है।यद्दपि ’समानान्तर -सिनेमा’ का विषय भी इनको पढ़ाना है ,परन्तु इस विषय की न इनको विशेष जानकारी है न ही कोई विशेष अभिरुचि।मुम्बई से गेस्ट फ़ैकेल्टी बुला लिए जायेंगे। बहुत से डाइरेक्टर निठ्ठल्ले खाली बैठे रहते है साल-ओ-साल इस काम के लिए। कुछ ’मास्साब’ तो कक्षा में अभिनय सहित ही प्रवेश करते हैं -गब्बर स्टाईल में । ठक !ठक !! ठक !!! अब छड़ी नहीं बेल्ट निकालत हैं फिर पूछते हैं---" कितने बच्चे हैं आज ?आँय !अरे रमुवा ! कल क्लास छोड़ कर कहाँ भाग गया था ?अयं क्या सोच कर भागा था कि सरदार बहुत खुश होगा???तेरा अटेनडेन्स लगा देगा?? हराम ...... कुछ मास्टर साहब अपने अपने क्लास में आगामी परीक्षा में पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों की तैयारी करवा रहे थे। उदाहरणत: -’मेरा गाँव मेरा देश"-से क्या शिक्षा मिलती है? -राम तेरी गंगा मैली ’ -में गंगा कहां आकर मैली हो जाती है? -’परजानियां ’ फ़िल्म गुजरात में क्यों प्रदर्शित नहीं हो सकी? किन्हीं 2-कारणों पर प्रकाश डालते हुए सविस्तार व्याख्या करें -’जोधा-अकबर-फिल्म पर विवाद के मुख्य विन्दु क्या हैं? सोदाहरण प्रस्तुत करें। -फ़िल्म रिलीज होने के पूर्व विवाद में फंस जाने से क्या क्या फायदे होते हैं ? स्पष्ट करें छात्र -छात्राओं ने सोचा , पाठ्यक्रम की तैयारी करनी है तो नियमित व ध्यान से फिल्म देखना ही पड़ेगा। अंक जो उठाना है । [व्यंग्य अभी जारी है ......] आनन्द पाठक ०९४१३३९५५९२
तांक से आगे.... [...पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किस तरह युवाओं की आग्रह पर सरकार ने ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के तौर पर अनुमति दे दी और कैसे हमारे शिक्षकों ने उस विषय पर पढ़ाना शुरु कर दिया ...कैसे ’गेस-पेपर’ छापे जाने लगे..कैसे हमारे शिक्षाविदों ने कोर्स में घुसने के लिए ’जुगत’ भिड़ाने लगे और कैसे ’सर’ इम्पार्टेन्ट क्वेश्चन’ बता बता कर परीक्षा की तैयारी कराने लगे.....। अब आगे पढिए.....] परीक्षा की घड़ी आ गई । सर ने समझाया था कि परीक्षा -कक्ष में घबड़ाना नहीं ,अपने इष्ट हीरो-हिरोईन को स्मरण करना ,अवश्य मदद करेंगे। कई निर्देशको व फ़ाईनेन्सरों का करते हैं। लिखना ,धुंआधार लिखना ,मगर लिखना ज़रूर।मूलोनास्ति कुतो शाखा ??लिखोगे नहीं तो नम्बर कहां से मिलेगा?कुछ कुछ परीक्षक तो मात्र पन्ने गिन कर अंक प्रदान करते हैं। प्रश्न-पत्र मिला तो आंखों के सामने अँधेरा छा गया।प्रथम प्रश्न था-अरे! यह क्या प्रश्न है? यह तो पाठ्यक्रम के बाहर का प्रश्न है।हम इसका बहिष्कार करेंगे?कहाँ तो हम प्रात: स्मरणीया ’प्रीटि ज़िन्टा’ जी का जीवन परिचय रट कर आये थे -क्या खातीं है...क्या पहनती हैं.कैसे चलती हैं...उन्हें क्या क्या पसन्द है....आजकल उनका किससे टांका..उस फ़िल्म की शूटिंग बीच में छोड़ कर क्यों चली गईं थी...फिर निर्माता ने एड्वान्स दिया तो कैसे मान गईं...। मगर इस खूँसट पेपर-सेटर साले को इतनी अच्छी अच्छी सुमुखी जिन्स धारिणी अभिनेत्रियों को छोड़ कर गिनती रटने की क्या ज़रूरत थी।अरे! यही गिनती पहाड़ा रटना होता तो हम ’मैथ’ विषय न ले लिए होते। साइन्टिस्ट इंजीनियर न बने होते! हाल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है।लगता है फ़िल्में तो सभी ने देखी होंगी मगर उस फ़िल्म के साहित्यिक ,सामाजिक ,राजनैतिक,आर्थिक तकनीकि पहलुओं पर ध्यान न दिया होगा।मात्र हीरो-हिरोईन के लटके-झटके में या फिर हीरो-विलेन के ढिशुंग-ढिशुंग में ही 3-घण्टे गँवा दिए।अब इस परीक्षा में गंवाने पड़ेंगे। मेरा चिट-भंडार किसी ठंडे बारूद की तरह निष्क्रिय हो गया ।लगता है अब पास वाले मित्र या परीक्षार्थी से मदद याचना करनी पड़ेगी। -"अरे बंटी ! यह कौन सा प्रश्न है यार !।एक-दो-तीन-चार? -"आगे चार-पाँच-छह सात भी लिखा है क्या" -अरे हां !हाँ ! तू जानता है क्या? -उसके आगे 9-2-11 भी लिखा है क्या? अरे! यार ,यह तो गाना है ’फ़िलिम’ का ।क्या राप्चिक गाना था ..मस्त...मज़ा आ गया था फ़िलिम देख कर..क्या मस्त हिरोईन थी....वाऊ.."-बंटी जी खड़े हो गये नाचने के लिए। आवेश के क्षणों में भूल गये यह सड़क नहीं ,परीक्षा-कक्ष है।यह तो अच्छा हुआ कि उन्होने एक-दो ठुमका नहीं लगाया अन्यथा पूरा परीक्षा-कक्ष ही ठुमका लगाने लगता। "अरे ! वो गाना !..." अब मेरे हॄदय में भी विश्वास का संचार होने लगा। हम भी कहें कि फ़िल्मी-कोर्स की परीक्षा में यह गणित का प्रश्न-पत्र कहाँ से आ गया?? "साइलेन्स प्लीज़-कृपया शान्त रहें"- कक्ष-निरीक्षक नें ऊँघते-उँघते हुए वहीं से आवाज़ लगाई।कक्ष में फिर एक ्बार सन्नाटा फ़ैल गया और मैं उत्तर लिखने में व्यस्त हो गया। प्रथमत: मैं चक्षु बन्द कर ध्यान-योग मुद्रा में उस फ़िल्म का ’डान्स-स्वीकेन्स’ याद करने लगा। गुरू जी ने कहा था -वत्स !संकट की घड़ी में घबड़ाना नहीं ....अपने इष्ट हीरो-हिरोईनों का स्मरण करना- अनिल कपूर ...माधुरी दीक्षित.जी...फिर वह गाना...फिर नाचना ---फिर गाना...फिर छेड़-छाड़--फिर...फिर...सब कुछ आंखों के सामने एक एक कर के दृश्य आने लगे किसी चल् चित्र की तरह..। 1 -2 -3 -4- 5- 6 -7- 8 -9 -10 --11 -12 -13 [एक दो तीन चार पाँच छै सात आठ नौ दस ग्यारा बारा तेरा तेरा करूँ गिन गिन के मैं इन्तज़ार ,आजा सनम आई बहार] पर्दे पर यह गीत कई बार देख चुका हूँ मगर आज तक मैं यही समझता था कि श्रीमान हीरों जी सुश्री हिरोईन जी को गणित सिखा रहा है -नाच गा कर। काश ! कि हमारे ज़माने में गुरु जी या मैडम जी ने मुझे भी ऐसे से ही गणित पढ़ाई होती तो ’मैथ’ में मैं 3 बार फ़ेल न हुआ होता और आज यह कलम घिसाई न कर रहा होता। परन्तु आज यह महसूस हुआ कि इस महान गीत की आत्मा को न समझ सका। इसके साहित्यिक या सामाजिक ,[संभवत: आर्थिक भी] पहलू न पहचान सका।छोटा आदमी हूँ बड़ा कुछ सोच न सका।महान गीतकारों की रचनायें महान होती हैं ।उनको समझने के लिए उर्वरा मस्तिष्क होना चाहिए ।यही कारण है कि जब महान कवि काव्य-पाठ करते हैं तो श्रोता गण ’हूट’ कर देते हैं लेकिन जब मस्तराम आवारा ’मस्त’ जी अपनी कविता सुनाते है तो श्रोता तालियां बजाते हैं ।वैसे तालियां मेरे भी कविता पाठ पर भी नहीं बजती। ऊपर वाले गाने की व्याख्या सुन कर मेरा दिव्य-ज्ञान जग गया। मेरे अन्तर्नेत्र खुल गये।सर जी इस गाने के ’यथार्थवाद ’ में ही उलझ कर रह गये ।’रहस्यवाद’ नहीं पकड़ा ,मैने पकड़ लिया। इस गीत के माध्यम से कवि कहना चाहता है.... ’हे मूढ़ श्रोता ! मन्दबुद्धि !’एक’ का अर्थ भगवान से है । भगवान 1-है तुम उसे अल्लाह कहो ..राम कहो..यीशु कहो..-सब एक हैं।यहाँ ’एक’ शब्द का प्रयोग सर्वधर्म समभाव व धार्मिक सहिष्णुता के रूप में किया गया है-सबका मालिक एक है।यह एक असम्प्रदायिक परिभाषा है।यही अद्वैतवाद है।परन्तु कवि ने इसका प्रयोग ’फिल्म’ में हीरोईन महोदया के लिए किया है -हे सुमुखी !चैन हारिणी! तुम चांद की तरह ’एक’ हो जिसके इर्द-गिर्द हीरो-डाइरेक्टर प्रोड्यूसर तथा मेरे जैसे लगुये-भगुये कीड़े-मकोड़े ’फ़ैन’ निश दिन चक्कर काटते रहते हैं। और ’दो" शब्द का प्रयोग? यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग दो रूप में क्या गया है।आप इसे ’द्वैतवाद’ के रूप में भी समझ सकते हैं।जैसे बिना ’द्वैतवाद’ का जीवन दर्शन पूर्ण नहीं हो सकता वैसे ही बिना २-पात्रों -हीरो और हीरोईन के बिना कोई फ़िल्म पूर्ण नहीं हो सकती। ’अद्वैत वाद ’ से मात्र ’समान्तर सिनेमा’ ही बन सकता है जो फ़िल्म के ’मोक्ष’[फ़्लाप] की गारन्टी है। हिन्दी मास में २-पक्ष होते हैं-शुक्ल पक्ष एवं कॄष्ण पक्ष । कवि कहना चाहता है हे सुमुखी ! हे हीरोईन कूल्हा-मटकावनी मल्लिका -तुम्हारी केश राशि कॄष्ण पक्ष की तरह काले और मुख शुक्ल पक्ष की तरह गौर वर्ण अर्थात गोरा है ।अत: हे...... और तीन ? तीन शब्द का प्रयोग कवि ने बहुत सोच विचार कर किया है। वह एक रहस्य है.। यह भगवान ’शंकर’ के त्रि-नेत्र की तरफ़ इंगित करता है कि जब हीरो शान्त भाव से ,हीरोईन के ध्यान में ध्यानस्थ रहता है तो सर्वत्र शान्ति बनी रहती है।ऐसा प्राय: फ़िल्म के ’इन्टर्वल’[मध्यान्तर] तक रहता है तत्पश्चात जब हीरो अपना ’त्रिनेत्र’ खोलता है तो मुहल्ले के सारे गुण्डे-मवाली-टपोरी और कभी कभी हीरोईन का बाप भी भस्म हो जाता है।सारी बुराईयां खत्म हो जाती है। ’विलेन’ जेल चला जाता है और फिर सर्वत्र ओम शान्ति ओम छा जाती है और चार? महीने में चार हफ़्ते होते हैं।यहाँ पर यह ’चार’ -विलेन जी के ’हफ़्ता’ वसूलने को इंगित करता है।यही लक्षणा है ,यही व्यंजना है।यही इस कविता का सौन्दर्य भी है । ’पाँच’ के बारे में आप को क्या बताना ! तुलसी दास जी पहले ही बता गये हैं क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच तत्व मिल बना शरीरा हीरो कहता है -हे विलेन की विधवा ! तू शोक न कर। मैने उसको गोली मार कर ’पंचतत्व में विलीन कर दिया है ।मेरे हाथों उसका मोक्ष हो गया है। परिक्षक भ्रम में न रहें। यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग इस सन्दर्भ में नहीं किया है । एक कवि ,एक गीतकार जब फ़िल्मी गीत लिखता है तो बहुत कुछ देखना पड़ता है उसे -सिवा अपनी कल्पनाशीलता के- सिचुएशन देखना पड़ता है -हीरो का ध्यान रखना पड़ता है हीरोईन का ख्याल रखना पड़ता है । मल्लिका शेरावत से निरुपाराय जी के गीत तो नहीं गवा सकते न।फिर डाइरेक्टर -प्रोड्युसर जी का भी ,अपने पेमेन्ट की संभावनाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है-सिवा अपने गीत के भाव के। गीत का भाव क्या? जैसा पैसा वैसा भाव।यहां पर गीतकार ’पाँच’ शब्द के प्रयोग कर यह संकेत देना चाहता है कि हे प्रोड्युसर भईया ! अगर यह गाना ’हिट’ हो गया तो तेरी ’पाँचों’-ऊगलियाँ घी में होगी।न शोचयन्ति अर्हसि’- और छ:? [व्यंग्य जारी है......] आनन्द.पाठक 09413395592
[और वह गीत है 1 --2--3--4--5--6--7--8--9--10---11--12] गतांग से आगे --- [पिछले किस्त में आप ने पढ़ा कि कैसे हमारे युवाओं ने अपने पाठ्यक्रम में ’हिन्दी फ़िल्में’का एक ऐच्छिक विषय डलवा लिया और कैसे हमारे कालेज़ों ने इसकी पढ़ाई शुरू कर दिया और परीक्षा की तैयारी करवाई। परीक्षा कक्ष में कैसे हमारे एक युवा परीक्षार्थी परीक्षा दे रहे हैं और उक्त गीत की व्याख्या कर रहे हैं....गाने के बोल के 5-अंक तक तो वह समीक्षा कर चुके हैं .....अब आगे पढ़िए.... एक बात और ,जो पाठक इस व्यंग्य के पिछले अंश के ’पठन सुख’ से वंचित रह गये हों ,वो इसे यहां.....,,,,,........ और छ:? छह के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि इस फ़िल्म के हीरो का पराक्रम अदम्य है । वह ’विलेन’ का ’छक्का’ छुड़ा देगा और ’छठी’ का दूध याद दिला देगा।फ़िल्म में ’छक्कों’ की ज़रूरत नहीं ,हम ही काफी हैं। परन्तु आज मैं इस गीत का वास्तविक रहस्य बताता हूँ जो गुरु जी भी न जानते होंगे। जब ’हीरोईन’ अपने मीनाक्षी नयनों से कामदेव के पंच बाण से हीरो के दिल पर कटाक्ष करेगी तो हृदय प्रदेश के ’छह’ टुकड़े हो जायेंगे।यहाँ ’छह’ इसी सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है। यह अन्य बात है कि अमूमन हर फ़िल्म में ’फिर वही दिल लाया हूं’। यही ’बम्बईया फ़िल्म’ की विशेषता है ,यहीं ’सातवां’ आश्चर्य है...यही.. अरे हाँ ! सातवां पर मुझे याद आया कि इस गाने में ’सात’ का भी बख़ूबी प्रयोग हुआ है ।अज्ञानी पाठक ’सात’ के कई अर्थ ले सकते है ,यथा-सप्त-ऋषि,इन्द्र धनुष के सात रंग,सात पीढ़ियां सप्ताह के सात दिन.सात समुन्दर,सातवां आसमान सात सुर ..। जो धार्मिक पाठक हैं वो सप्त सती सात जनम, सात वचन सात फेरे ..। मगर जो रसिक पाठक हैं वो एक ही सन्दर्भ लें-नायिका के सात यार। पाठक गण कृपया धैर्य रखें और कवि की अंक-गणना को धैर्य से देखें... और ’आठ’? ’आठ’ अंक के प्रयोग से प्रात: स्मरणीय कवि जी ने पंचाग की तरफ़ इंगित किया है जिसमें काल चक्र की गणना आठ प्रहर से होती है -ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है।परन्तु मेरा मानना है कि कवि महोदय ने ’आठ’ का प्रयोग इस सन्दर्भ में कदापि न किया होगा।चूँकि इस गीत का सम्बन्ध किसी फ़िल्मी पृष्ठभूमि से है तो इस का उत्तर भी फिल्मी धरातल पर ही खोजना चाहिए। हमें प्रतीत होता है कि हीरो ’आठो’ प्रहर वंशी बजाता होगा और हीरोईन अष्टांग योग से हीरो के इर्द-गिर्द नाचती-गाती होगी।यह शब्द उसी का परिचायक है ,उसी का द्योतक है। जहाँ तक ’नौ’-शब्द का प्रश्न है ,इस पर विद्वानों का मत भेद है। कोई ’नव-ग्रह’ के रूप में देखता है तो कोई ’नव-रस’ में । परन्तु इस गीत में कवि जी चंचला नायिका को सावधान करना चाहते हैं कि हे भोली-भाली अनजान नायिके !इस हीरो के साथ ज़्यादा नाच-गाना ,लप्पो-चप्पो न कर अन्यथा ’नौ’ महीने बाद तू मुंह दिखाने के योग्य न रहेगी..।अब यह नायिका पर निर्भर करता है कि वह इस ’नौ’ अंक को किस सन्दर्भ में लेती है। पाठक गण कृपया धैर्य बनाये रखें ’दस’ शब्द का प्रयोग कवि ने बड़ी चतुराई से किया है -साँप मरे,ना लाठी टूटे। इस ’दस’ शब्द के आप कई अर्थ निकाल सकते है जिसे हम ’श्लेष’ अलंकार कह सकते हैं।प्राय:हमने देखा है कि कुछ विद्यार्थियों को ’श्लेष’ और ’यमक’ में भ्रम की स्थिति बनी रहती है इसीलिए हमारे व्याकरणाचार्यों ने ’भ्रम-अलंकार’ की एक अलग श्रेणी दे दी है। यमक अलंकार में जब एक ही शब्द, दो बार.... अरे ! मैं विषय वस्तु से भटक रहा हूं।परीक्षक महोदय कृपया ध्यान न लें।हाँ तो ’दस’ शब्द का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा था । इस शब्द के एक अर्थ में कवि महोदय ने निर्माता जी को यह चेतावनी देने का प्रयास किया है कि यदि इस गीत का पारिश्रमिक नहीं मिला तो आप की फ़िल्म का ’दसवां’ भी हो सकता है । दूसरा अर्थ यह कि भविष्य में अगर किसी फ़िल्म मे वो या उसका बेटा जमाई राजा बना तो ’कन्या राशि स्थितौ, जामाता दशमो ग्रह" तो फिर नौ ग्रह भी आप को नहीं बचा सकते.. और ’ग्यारा’ बारा’ तेरा’...??? परीक्षक महोदय के ज्ञान वर्धनार्थ यह बताना यहाँ उचित होगा कि मूल शब्द ’ग्यारह’ बारह ’तेरह’ है मगर कवि जी को छन्द विन्यास व मात्रा अनुशासन वश ’ग्यारा ..बारा..तेरा.. लिखना पड़ा क्योंकि अगली पंक्ति में उसे ’तेरा करूं गिन गिन के मैं..इन्तज़ार ’-भी लिखना है। अत: छान्दिक विधान से त्रुटि नहीं मानी जायेगी और भाव पक्ष में कोई अन्तर नहीं पड़ता। ’ग्यारा’[ग्यारह] शब्द से कवि ने हीरोईन को यह समझाने की प्रयास किया है किहे! मुक्त हासिनी ,सुमुखी कन्या ! यदि तुझे यह हीरो ’वर’ रूप में पसन्द है और प्राप्त करना है तो फिर तू भी ’ग्यारह निर्जला एकादशी’ व्रत रख ,अभीष्ट फल मिलेगा। व्रत पुस्तिका मिलने का पता-ठाकुर प्रसाद एन्ड सन्स,कचौड़ी गली ,वाराणसी -एकादश व्रत महात्म्य । और ’बारह’ शब्द की अपनी महिमा है [महिमा चौधरी नहीं]जिसे हर हिन्दू परायण धार्मिक जन-मानस जानता है।’बारह जातक कर्म से लेकर ’बारह खड़ी ’तक।बारह राशियों से लेकर बारह महीनों तक। परन्तु हे नायिके ! इस बारह महीने में सावन का महीना बड़ा ही कष्ट दायक होता है । इस महीने में जितनी ही वर्षा होती है उतनी ही नायिका के बदन में आग लगती जाती है -’ ’सावन में लग गई आग दिल मेरा...’ जलने की संभावना बढ़ जाती है---संयम से काम लेना चाहिए .अन्यथा... और ’तेरा’ "? इस पूरे गीत में बस इसी एक शब्द का सम्यक प्रयोग हुआ है।पाठकगण इसे ’तेरह’ समझने की भूल न करें, वरना हो सकता है कि कवि जी मेरे पुतले की ’तेरहवी’ करा दें । आखिर ’चेला’ और पुतला बनाने में कितना समय लगता है । इस अमर गीत की विशद व्याख्या तो मैं अभी और भी कर सकता हूँ ,परन्तु पाठकों का धैर्य अभाव व परीक्षा में समय अभाव को देखते हुए इस प्रश्नोत्तर का उप-संहार कर रहा हूं.. ऽऽऽऽऽऽ %%%%%% ******* पाठकों की जानकारी हेतु ,उक्त परीक्षा में ’पप्पू’-यानी कि मैं उत्तम अंकों से उत्तीर्ण हो गया । कई वर्ष बाद किसी परीक्षक नें मुक्त कंठ से मेरी प्रशंसा की थी तथा मुक्त हस्त से अंक प्रदान किए थे। मेरा उत्तर पढ कर परीक्षक ने लिखा था-"परीक्षार्थी ,परीक्षक से ज़्यादा ज्ञानी है जो अर्थ हीन व बकवास गीतों का भी इतना विशद ,व्यापक और सार्थक व्याख्या कर सकता है । भविष्य में ,परीक्षार्थी में ’फ़िल्म -समीक्षक’ बनने की पूरी पूरी संभावना व्याप्त है जो बिना विषय और अर्थ हीन फ़िल्मों की समीक्षा में 5-10 पन्नें रंग सकता है।परीक्षार्थी को ’व्यंग्यकार’ बनने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है-आवश्यकता है तो उसे उचित प्रशिक्षण की, सम्यक संरक्षण की, सही वातावरण की...। इस टिप्पणी से मैं गदगद हो गया-’कलम आज उनकी जय बोल’ - ।आज भी ऐसे पारखी है जिन्हें कंकड़ में हीरे की पहचान है।बाद में ज्ञात हुआ कि उक्त परीक्षक महोदय ने पूरा उत्तर न पढ़ कर मात्र पन्ने गिन गिन कर अंक प्रदान किए थे । 5-पन्ने ,5-अंक। गुरु जी ने सत्य वचन कहा था कि बेटा...। अब मैं द्वितीय प्रश्न-पत्र की तैयारी में जुट गया । प्रश्न था-- - ’सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे ...जाड़े में सजना.. अथवा बीड़ी जलाय ले जिगर से पिया ...जिगर मा बड़ी आग है. गीत का सामाजिक प्रभाव व हिन्दी गीत की नवगीत दशा व दिशा का सजीव [साभिनय नहीं] वर्णन करें -अस्तु -आनन्द.पाठक 09413395592 -
मंगलवार, 1 दिसंबर 2009
व्यंग्य 15 : तितलियाँ ज़िंदा हैं ........
एक व्यंग्य : तितलियाँ ज़िन्दा हैं..
जब से अस्थाना साहब इस विभाग में स्थानान्तरित होकर आये हैं काफी उदास रहते हैं।उदास रहने का कोई प्रत्यक्ष कारण तो नहीं था।फिर भी उन्हें अन्दर ही अन्दर कुछ न कुछ कमी महसूस होती थी।कहने को विभाग ने तो प्रोन्नति देकर यहाँ भेजा था,तथापि वह सन्तुष्ट नहीं थे।एकान्त में प्राय: इस विभाग को कोसते रहते थे....स्साला उद्दान विभाग भी कोई विभाग है ! उगाते रहो फूल-पौधे और बेचते रहो माला-फूल।
यहाँ आने से पूर्व ,वह राज्य के वन-विभाग में अधिकारी थे। उनके कार्य-क्षेत्र में साखू-सागौन के पाँच-पाँच जंगल थे। एक एकड़ में फैला बडा़-सा बंगला,एक कोने में गोशाला ,दो-तीन दुधारू गायें,नौकर-चाकर ,आम-जामुन के पेड़...आवश्यकता से अधिक था।बाकी ज़मीन पर खेती-बाडी़ कराते थी ,कुछ अनाज पैदा हो जाता था सो अलग से ।घरेलु कार्य हेतु,दो-तीन नौकर-चाकर अलग से लगा रखे थे .....कोई झाडू-बहारू करता,कोई खाना पकाता। ड्राईवर बच्चे को स्कूल छोड़ आता । फिर तो मेम साहब के पास समय ही समय था। कभी सिनेमा,कभी पार्टी ,कभी क्लब ,कभी किटी ,कभी पिकनिक,कभी शापिंग । क्या चीज़ नही थी अस्थाना साहब के पास। जिन वन-अधिकारी के कार्य-क्षेत्र में पाँच-पाँच जंगल हो समझिये उसके पाँचों उंगलिया घी में....
इस सुख-सुविधा के स्थायित्व के लिए ,अस्थाना साहब को कुछ विशेष परिश्रम करना पड़ता था ...बड़े साहब के लिए यदा-कदा लिफ़ाफ़ा बन्द पत्रम-पुष्पम. हें !हें! बच्चों के लिए है । होली-दिवाली के लिए विशेष डालियाँ काफी थी । क्षेत्र के एम०एल०ए० एम०पीके लिए अलग व्यवस्था। कभी सागौन की लकड़ी ,कभी साखू के बोटे।चुनाव काल में विशेष उपहार योजना।पार्टी फण्ड में चन्दा अलग। अस्थाना जी ने इस सेवा में कभी कमी न होने दी।बडी़ श्रद्धा भक्ति से कार्यरत थे।यही उनकी कर्मठता थी ,यही उनकी कार्य कुशलता। यही उनकी निष्ठा थी ,यही उनकी क्षमता । सरकारी शब्दावली में उनके दो दो ’गाड-फ़ादर’ थे। टिकने-टिकाने के सभी गुर मालूम थे उन्हें।
कहते हैं शातिर से शातिर खिलाडी़ भी मात खा जाता है। इस क्षेत्र में आप के सहयोगी भी बड़े घाघ होते हैं आप की ठकुरसुहाती भी उन्हें नहीं सुहाती।आप को देखते ही एक कुटिल व्यंग्य मुस्कान छोड़ेंगे। करीबी हुए तो कह भी देंगे-" अरे यार अस्थाना ! अब तो बेबी भी बडी हो गई शादी भी यहीं से करेगा क्या?" अर्थ स्पष्ट है -यार खिड़की वाली सीट छोड़ तो हम भी एकाध साल के लिए बैठ लें।परन्तु अस्थाना साहब ही कौन सी कच्ची गोली खेले हुए हैं।वह भी उसी शैली में प्रतिवाचन कर देते हैं -"यार सक्सेना!हम तो कब से बोरिया-बिस्तर बाँधे हुए है,परन्तु सरकार छोड़े तब न,बहुत झंझट है यहाँ,हमेशा टेन्शन ही टेन्शन है। कभी अमुक मंत्री आ रहे हैं...कभी अमुक मंत्री जा रहे हैं...।’
सक्सेना जी इस वाचन का निहित अर्थ समझते हैं।
सक्सेना ,अस्थाना जी का पद-स्थायित्व रहस्य-मन्त्र बड़े ही मनोयोग से सीखने लगा और बड़े साहब की सेवा में तल्लीन हो गया।यदा-कदा अस्थाना जी से बड़ा लिफ़ाफ़ा पर्व-उत्सव पर प्रस्तुत करने लगा। एम०पी० ,एम०एल०ए० के स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं होने देता था क्योकि चन्दा दान की कोई सीमा नहीं होती है। सेवा करवाने वाले को इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सेवा कौन कर रहा है। बड़ी सेवा ,बड़ा पद।अच्छी सेवा , अच्छा पद।अन्तत: सक्सेना ने बाज़ी मार ही ली और एक दिन अस्थाना साहब की खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। सेवा करवाने वालों ने अपने सिद्धान्त में ईमानदारी बरती-जैसी सेवा-वैसा पद।
अस्थाना जी को उद्यान विभाग में ठेल दिया गया।जब से आए हैं,दुखी रहते हैं।उनकी व्यथा ,उनका दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलकता है। सोचते हैं ,कहाँ आकर फँस गए। कहाँ वहाँ नरक की राजसी ठाठ ,कहाँ यहाँ सरग की दासता!
अस्थाना जी को सक्सेना से ज्यादा अपने आकाओं पर खीझ थी । अपने साहब से नाराज़गी थी-..’कॄतघ्न ...खाली सेवा देखता है,भक्ति नहीं। अरे ! कुत्ते होते हैं कुत्ते सब के सब.....दो रोटी जिधर ज्यादा देखी...लगे लार टपकाने उधर...अरे ! पैसे की आवश्यकता थी तो हमको इशारा कर दिया होता ....एकाध लाख के लिए मर नही गये थे ...हुँ ...समझता है कि हार्टिकल्चर विभाग से ही रिटायर हो जाएंगे....अरे ! बदलने दीजिए यह सरकार ....फ़िर देखिए "सूट्केस" की ताकत..’सूटकेस" की ताकत अभी जानते नहीं हैं....."अस्थाना जी ने दुर्वासा शैली में मन ही मन श्राप दिया।
न सरकार बदली,न अस्थाना बदले
विभाग रास नहीं आ रहा था ,करते रहो शहर भर के पार्कों की रखवाली। इन पार्कों में जितने माली न होंगे उस से ज्यादा तो मेरे वन-विभाग वाले बंगले पर खटते थे।हमने क्या उद्यान विभाग की सेवा के लिए इस धरा पर शरीर धारण किया है? अरे! हम तो वन-संरक्षण के लिए अवतरित हुए हैं। हमे देश की सेवा करनी है। वन रहेगा तो देश रहेगा ,हम रहेंगे। जितना बड़ा वन-क्षेत्र ,उतनी बड़ी देश सेवा।
अस्थाना जी अपने वेतन को तीस दिन की मज़दूरी मानते थे,अफ़सरी नहीं।मीठे पानी की बड़ी मछली थे ,उद्यान विभाग में छटपटा रहे थे । कहाँ वहाँ गहरे पानी का तैरना और कहाँ यहाँ कीचड़ में लोटना।
अब तो उतनी भी नहीं मिलती मयखाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में
अभी बिटिया की शादी करनी है,फ़्लैट का किश्त देना है,बेटे को बाहर भेजना है,छोटे साले की फ़ैक्टरी लगवानी है,अभी.....। कुछ तो जुगाड़ करना पड़ेगा।
इसी जुगाड़ करने के सन्दर्भ में प्रथम कार्य स्वरुप शहर भर के मालियों का स्थानान्तरण आदेश निर्गत कर दिया.....स्साले कई कई साल से एक ही स्थान पर बैठे हैं...गन्ध मचा रखी है..।
अल्प वेतन भोगी कर्मचारियों पर मानो कहर ही वरपा हो गया । भाग-दौड़ शुरू हो गई,सोर्स....हुँ...सोर्स लगाते हैं सब।अरे! मेरी पैरवी कौन सुन रहा है कि मैं यहाँ सड़ रहा हूँ।
अस्थाना जी को अपना आदेश न बदलना था,न बदले।
अन्तत: समाधान निकला।साहब और मालियों के मध्य एक अलिखित मूक सहमति बनी। अब कोई दूध लाता है तो कोई दही।कोई सब्ज़ी लाता है,कोई घी। कोई मुर्गा,कोई मछली।अन्तत: उक्त आदेश निरस्त हुआ और साहब का कुछ-कुछ जुगाड़ हो गया।
अगले आदेश के क्रम में रात्रि आठ बजे के बाद जन साधारण का सरकारी उद्यानों में प्रवेश वर्जित कर दिया।रात के अँधेरे में झाड़ी के पीछे रास-लीला रचाते हैं। चौकिदारों ने स्थानीय मजनुओं द्वारा देर रात गये पार्क के "एडल्ट" उपभोग के लिए अतिरिक्त सुविधा शुल्क बाँध दिया,जिसका वह कुछ अंश साहब की मासिक सेवा हेतु तथा शेष अंश दूध-दही,साग-सब्ज़ी के लिए सुरक्षित रख लेते थे।
कहते हैं अस्थाना जी लहरें गिन-गिन कर भी व्यवस्था करने वाले प्राणी थे।एक दिन प्रात: उद्यान भ्रमण व निरीक्षण क्रम में अस्थाना जी ने फूलों पर ओस की कुछ बूँदें देखी,बड़ी मनोहारी लग रही थी जैसे नायिका के कपोल पर दो श्वेत-श्रम-बिन्दु उभर आएं हो। हल्की -हल्की हवा बह रही थी । अहा ! क्या मनोरम दॄश्य है ! क्या शबनम के मोती है!अस्थाना साहब जैसे व्यक्ति में भी सौन्दर्य बोध का संचरण होने लगा। अत:गुनगुनाते हुए उद्यान के दूसरे छोर पर निकल गये।
वापसी क्रम में देखा ,ओस की बूँदे गायब हो गई।माथा ठनका ।अभी-अभी तो यहीं थी ,कहाँ गायब हो गईं?चिन्ताग्रस्त हो गये। माली ठीक से रखवाली नहीं करता ।काम चोर है।
"माली"- साहब ने गुस्से से पुकारा-"उद्यान की रखवाली करता है कि सोता रहता है?"
"नहीं साहब ! ठीक से ड्यूटी करता हूँ’
"तो फूलों से ओस की बूँद ,किसने चुराये हैं। बोलो ,किसने चुराये हैं"
"मैने तो नही....मैने तो नहीं"-मारे डर से ,माली के मुँह से एक फ़िल्मी गाने का अन्तरा निकल गया
"चुप ! गाना गाता है"पता लगा कर मुझे सूचित करो"-आदेश निर्गत कर के अस्थाना साहब वापस आ गये
माली मन ही मन दुखी।कैसा खब्ती साहब है!न अपने चैन से रहता है ,न हमे चैन से रहने देता है।कल कहेगा-ये पत्ते कैसे गिरे?यह घास कैसे उगी?और कैसे घुसे.....धत ...??मन में एक प्रत्यक्ष भय जगा ।कहीं इसी बात पर तबादला न कर दे।साग-सब्ज़ी कितने दिन तक मदद करेगी??
इसी अप्रत्यक्ष भयवश,चौकिदार ने दूसरे दिन प्रात: हाथ में डंडा लिए जाँच कार्य में लग गया।कहीं चोरो से मुठभेड़ हो गई तो? वन विभाग में होता तो रायफ़ल भी रख लेता।पता लगाना है कौन चुराता है साहब के शबनम के मोती?कौन घुस आता है यहाँ मेरे रहते?जाँच क्रम में देखा कि कुछ रंग-विरंगी तितलियां फूलों पर बैठ जाड़े की हल्की-हल्की धूप का आनन्द ले रही थीं।बड़ी प्यारी लग रही थी कि अकस्मात.....
"मिल गया ! मिल गया ! अकस्मात माली चीख पड़ा आर्किमिडीज़ की तरह----" ससुरी यही सब हैं जो कल हमका डटवा दिया...बताता हूँ अभी...."
दूसरे दिन माली ने साहब के सामने अपना मौखिक जाँच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया-"....स्साब ! वह कुछ तितलियां है जो आप का मोती चुरा ले जाती हैं"
"उन्हे पेश किया जाय ,ज़िन्दा या मुर्दा"-पॄथ्वीराज शैली में आदेश दिया। आदेश देने के क्रम में अस्थाना साहब भूल गये कि वह मुगले-आज़म के अक़बर नहीं अपितु सरकारी विभाग के एक लोक सेवक हैं।
माली बड़ी निष्ठा व तन्मयता से साहब के आदेश पालन में लग गया।वह तितलियों को ज़िन्दा तो क्या पकड़ पाता ,अत: मुर्दा ही पकड़ना शुरू कर दिया।कुछ दिनों के पश्चात ,मॄत तितलियों को एक फ़ोटो-फ़्रेम में जड़ कर तथा बड़े ही सलीके से सजा कर साहब की सेवा में प्रस्तुत किया।
" इन्हे दीवार में चुन, आई मीन ,दीवार पे टांग दिया जाय"-जैसे अभियुक्तों को सजा-ए-मौत सुना रहे हों
बात आई-गई हो गई।साग-सब्ज़ी आती रही,दूध दही आता रहा।परन्तु फ़्रेम में जड़ित तितलियां महीनों दीवार पे टंगी रहीं।गर्व है इन तितलियों को।मर कर भी उतनी ही सुन्दर व सजीव लग रही है जितना ज़िन्दा रह कर। अगर नहीं है अब तो,उनकी अदाएं,उनका इतराना ,उनका इठलाना., उनकी चंचलता ,उनकी चपलता...। मर कर भी ड्राईंग रूम की शोभा बनी हुई हैं।
उस दिन ,अस्थाना साहब ने अपने छोटे बच्चे के जन्म दिन पर एक पार्टी का आयोजन किया था। उसमें अपने विभाग के बड़े साहब शर्मा जी को भी आमन्त्रित किया था।सोचते हैं.....अरे ! अब यह भी कोई पार्टी है !मात्र रस्म अदायगी रह गई अब तो।पार्टी तो वहाँ करते थे हम वन-विभाग में।लाखों खर्च हो जाते थे ...कौन नही आता था ...डी०एम० ,एस०पी०,एम०एल०ए०, एम०पी०...क्या रौनक हुआ करती थी.... शराब?? शराब तो पानी की तरह बहता था....एक से बढ़ कर एक ...व्हिस्की ..वोडका..रम...जिन..डिप्लोमेट..बैग पाइपर...डिम्पल..।एक बार तो डी०एम० साहब ने मजाक में कह भी दिया था -" अस्थाना ! ऐसा बर्थ-डे पार्टी हर महीने मनाया कर।
मगर अब ! अब कहाँ वैसे दिन!अब तो इस खूसट शर्मा को ही बुला कर सन्तोष करना पड़ रहा है।शर्मा जी ने आते ही आते उचारा -" अरे अस्थाना ! ड्राईंग रूम तो बड़ा सुन्दर सजाया है"
"नो स्सर,यस स्सर,आप की कृपा दॄष्टि है ,स्सर !"-अस्थाना जी ने कुछ सहमते ,कुछ सकुचाते कुछ लडखड़ाते नवनीत लेपन शैली में कहा। अन्दर ही अन्दर भयग्रस्त भी हो गये -कहीं यह शर्मा का बच्चा नज़र तो नहीं लगा रहा।
"और यह तितलियों का सेट? कहाँ से मँगवाया है?-शर्मा जी ने जिग्यासा प्रगट की
"स्सर ! अपने पार्क-पन्नालाल पार्क की है। एक माली दे गया था"-अस्थाना जी ने चहकते हुए कहा
’अपने पार्क की?-शर्मा जी ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा कि अचानक जोर-जोर से चीखने लगे-" अस्थाना ! तुम्हे मालूम है?इन तितलियों को मार कर बहुत बड़ी गलती की,अपराध किया है।प्रलुप्त जाति की दुर्लभ तितलियां थी और तुम इन्हे अपने ड्राईंग रूम की शोभा बनाए हुए हो?ये संरक्षित जाति की थीं,इन्हे मारना ज़ुर्म है।तुम्हे सजा भी हो सकती है,विभागीय जाँच भी । तुम निलम्बित भी हो सकते हो......मैं विभाग कों लिखूँगा.."-शर्मा जी ने लगभग डांटते हुए,धमकी देते हुए कहा।
लगता है इस शर्मा के बच्चे ने समस्त जीवन नौकरी नहीं ,बल्कि तितलियां निहारने में गुज़ार दी और बाल सफ़ेद हो गए।
अस्थाना जी को काटो तो खून नही।कहाँ से मंगल गॄह में "शनीचर" आ गया।चिन्ता्ग्रस्त हो गए।अब बर्थ-डे पार्टी क्या होनी थी.....
अगले सप्ताह,अस्थाना जी ने वैसी ही मॄत तितलियों का एक शो-केस और बनवाया और शर्मा जी को उपहार स्वरूप दे दिया। सौंपते हुए कहा-"स्सर यह आप के बैठक कक्ष के लिए है.मृत तितलियाँ है स्सर !आप के शयन-कक्ष के लिए "ज़िन्दा-तितलियाँ" आप के जुहू के हिल-व्यू वाले बंगले पर पहुँचवा दिया है"आस्थाना जी ने लगभग
फ़ुस्फ़ुसाते हुए कान में कहा
"ज़िन्दा तितलियाँ?" -इस अन्तिम वाक्य को सुन कर शर्मा जी अति गदगद हो गये।सफेद मूँछे काली हो गईं। चेहरे पर चमक आ गई।
उस शाम शर्मा जी अपने हिल-व्यू वाले बंगले के शयन कक्ष में शराब और कबाब के साथ "ज़िन्दा तितलियों" के शबाब में रात भर रसमय व सराबोर होते रहे।
दूसरे ....दिन
शर्मा जी ने विभागीय जाँच के बदले प्रोन्नति हेतु अस्थाना जी के पक्ष में संस्तुति कर दी।
अस्तु
--आनन्द.पाठक
रविवार, 19 जुलाई 2009
सुदामा की खाट : व्यंग्य संग्रह[भूमिका से]
प्रिय मित्रो !
"सुदामा की खाट’-
"सुदामा की खाट’-
मेरा दूसरा सद्द: प्रकाशित व्यंग्य-संग्रह’ है.जिसमें विभिन्न सामाजिक विद्रूपताओं पर लिखे गए १७ व्यंग्यों का संकलन है’ ।इस पुस्तक का प्रकाशन
’अयन प्रकाशन
१/२० ,महरौली ,नई दिल्ली ,११० ०३०
दूरभाष ०११-२६६४५८१२
ने किया है
आशा करता हूँ सुधी पाठकों को यह संग्रह पसन्द आयेगा
०० ०००
पुस्तक की भूमिका से----
’अयन प्रकाशन
१/२० ,महरौली ,नई दिल्ली ,११० ०३०
दूरभाष ०११-२६६४५८१२
ने किया है
आशा करता हूँ सुधी पाठकों को यह संग्रह पसन्द आयेगा
०० ०००
पुस्तक की भूमिका से----
’बात जहां पर तय होनी थी किस पर कितने चढ़े मुखौटे
जो चेहरे ’उपमेय’ नही थे ,वो चेहरे ’उपमान’ बन गये ।
सच।
यह एक विडम्बना है-सामाजिक विडम्बना।आप के आस-पास दिखते हुए चेहरे -अनेक चेहरे। कोई चेहरा साफ़ नहीं,स्पष्ट नही,निश्छ्ल नहीं।बाहर कुछ-भीतर कुछ। जो वह है -वह दिखता नहीं। जो दिखता है- वह है नहीं।हर चेहरे पर एक चेहरा-हर मुखौटे पर एक मुखौटा।कभी मगरमच्छ की तरह आँसू बहाता,कभी गिरगिट की तरह रंग बदलता ,कभी तोते की तरह आँखे फेर लेता है। वह आदमी नहीं ’वोट’ पहचानता है ,वोट बैंक पहचानता है । गिनता है मॄतक किस पार्टी से संबद्ध था ,देखता है ।उस पर भी
विडम्बना यह कि वह स्वयं को ’हिप्पोक्रेट’ नही मानता ,अवसरवादी नही मानता अपितु इसे सीढियां मानता है-सफलता की सीढियां।
........ सच बोलने पर बुरा मानते लोग..,आइना दिखाने पर पत्थर उठाते लोग,... झूठे आश्वासनों का बोझ ढोता... ’बुधना’ ,गरीबी रेखा के नीचे दबा आम आदमी... ’वोट’ के लिए नित नए-नए स्वांग रचते लोग...रंगीन तितलियों से खेलते सत्ता के दलाल...रोटी माँगने पर भीड़ पर गोली चलाती व्यवस्था...कर्ज़ के बोझ से दबे आत्महत्या करते किसान...बारूद की ढेरी पर बैठा शहर...कुर्सी की खातिर सिद्धान्तों व मानवीय मूल्यों को तिलांजली देती पार्टियां...’सुदामा की खाट" पर कब्जा किए हुए युवा सम्राट..क्या काफी नही है
एक संवेदनशीलमना व्यक्ति को उद्वेलित करने के लिए.? संवेदना ज़िंदा है तो हम आप ज़िंदा हैं अन्यथा जब संवेदना मर जाएगी तो ’ बिल्लो रानी’ चाहे ज़िगर मा आग से ’बीडी़’ जला लें या बम्ब धमाके से ५० मरे -मात्र एक समाचार से ज्यादा कुछ नही होगा......
विडम्बना यह कि वह स्वयं को ’हिप्पोक्रेट’ नही मानता ,अवसरवादी नही मानता अपितु इसे सीढियां मानता है-सफलता की सीढियां।
........ सच बोलने पर बुरा मानते लोग..,आइना दिखाने पर पत्थर उठाते लोग,... झूठे आश्वासनों का बोझ ढोता... ’बुधना’ ,गरीबी रेखा के नीचे दबा आम आदमी... ’वोट’ के लिए नित नए-नए स्वांग रचते लोग...रंगीन तितलियों से खेलते सत्ता के दलाल...रोटी माँगने पर भीड़ पर गोली चलाती व्यवस्था...कर्ज़ के बोझ से दबे आत्महत्या करते किसान...बारूद की ढेरी पर बैठा शहर...कुर्सी की खातिर सिद्धान्तों व मानवीय मूल्यों को तिलांजली देती पार्टियां...’सुदामा की खाट" पर कब्जा किए हुए युवा सम्राट..क्या काफी नही है
एक संवेदनशीलमना व्यक्ति को उद्वेलित करने के लिए.? संवेदना ज़िंदा है तो हम आप ज़िंदा हैं अन्यथा जब संवेदना मर जाएगी तो ’ बिल्लो रानी’ चाहे ज़िगर मा आग से ’बीडी़’ जला लें या बम्ब धमाके से ५० मरे -मात्र एक समाचार से ज्यादा कुछ नही होगा......
--आनन्द पाठक-
शनिवार, 11 जुलाई 2009
व्यंग्य 09 : एक इन्टरव्यू मेरा भी....
जब से प्रसारण क्रान्ति आई ,टी०वी० चैनलों की बाढ़ आ गई। जिसको देखो वही एक चैनेल खोल रहा है।कोई न्यूज चैनेल,कोई व्यूज चैनेल।समाचार के लिए ८-१० चैनेल। दिन भर समाचार सुनिए ,एक ही समाचार दिन भर सुनिए। हिन्दी में सुनिए ,अंग्रेजी में सुनिए,कन्नड़ में सुनिए ,मलायलम में सुनिए. यदि आप धार्मिक प्रवृत्ति के हैं तो धार्मिक चैनेल देखिए-आस्था चैनेल देखिए ,संस्कार चैनेल देखिए। यदि आप युवा वर्ग के हैं तो एम०टी०वी० देखिए, रॉक टी०वी० देखिये । यदि आप हमारी प्रवृत्ति के हैं तो दिन के उजाले में भजन-कीर्तन देखिए ,रात के अन्धेरे में फ़ैशन टी०वी० देखिए- अकेले में।मेरी बात अलग है ,मैं अपने अध्ययन कक्ष में रहता हूँ तो फ़ैशन टी०वी० देखता रहता हूँ परन्तु जब श्रीमती जी चाय-पानी लेकर आ जाती हैं तो तुरन्त ’साधना’ चैनेल बदल भजन-कीर्तन पर सिर चालन करता हूँ । इससे श्रीमती जी पर अभीष्ट प्रभाव पड़ता है ।
उन दिनों, जब मैं जवान हुआ करता था तो यह चैनेल नहीं हुआ करते थे और जब मैं जवान नहीं तो १००-२०० चैनेल खुल गये। पॉप डान्स, रॉक डान्स,हिप डान्स,हॉप डान्स। उन दिनों ले-देकर एक ही चैनेल हुआ करता था-दूरदर्शन। शाम को २ घन्टे का प्रोग्राम आता था .आधा घंटा तो चैनेल का ’लोगो’ खुलने में लगता था -सत्यं शिवं सुन्दरम। फिर टमाटर की खेती कैसे करें ,समझाते थे ,धान की फ़सल पर कीट-नाशक दवाईयाँ कैसे छिड़के बताते थे । फिर समाचार वगैरह सुना कर सो जाते थे। सम्भवत: आज की जवान होती हुई पीढी को इस त्रासदी का अनुभव भी नहीं होगा।इन चैनलों से देश के युवा वर्ग कितने लाभान्वित हुए ,कह नही सकता परन्तु मेरे जैसे टँट्पुजिए लेखक का बड़ा फ़ायदा हुआ।चैनेल के शुरुआत में कोई विशेष प्रोग्राम या प्रायोजक तो मिलता नहीं तो दिन भर फ़िल्म दिखाते रहते हैं,गाना सुनाते रह्ते हैं या किसी पुराने धारावाहिक को धो-पोछ कर पुन: प्रसारण करते रहते हैं।’रियल्टी शो" के लिए कैमेरा लेकर निकल पड़ते हैं गली-कूचे में शूटिंग करने गाय-बकरी-कुत्ते-सूअर-साँड़-भैस।फ़िर चार दिन का विशेष कार्यक्रम बनाएगे दिखाने हेतु। नगर में गाय और यातायात की समस्या, बकरे कि माँ कब तक खैर मनायेगी देखिये इस चैनेल पर...सिर्फ़ इस चैनेल पर ..पहली बार ..ए़क्स्क्लूसिव रिपोर्ट..गलियों में सूअरों का आतंक....सचिवालय परिसर में स्वच्छ्न्द घूमते कुत्ते ,एक-एक घन्टे का कार्यक्रम तैयार...दिन में ३ बार दिखाना है सुबह-दोपहर-शाम ...दवाईओं की तरह ..समाज को स्वस्थ रखने हेतु।
एक शाम इसी चैनेल की एक टीम गली के नुक्कड़ पर ’ चिरौंजी" लाल से टकरा गई । संवाददाता संभवत: चिरौंजी लाल का परिचित निकला -’ अरे यार ! चिरौंजी ! तू इधर ? यार तू किधर?
इस इधर-उधर के उपरान्त दोनों अपने पुराने दिनों की यादों में खो गये परन्तु ’मिस तलवार" को याद करना दोनों मित्र नहीं भूले ."मिस तलवार...अरे वही जो...। चेतनावस्था में लौटते ही उक्त संवाददाता महोदय ने अपनी वास्तविक व्यथा बताई।
’यार चिरौंजी ! हिन्दी के किसी साहित्यकार का एक इन्टरव्यू करना है ,मुझे तो कोई मिला नहीं, जितने महान साहित्यकार हैं वो आज-कल विश्व हिंदी सम्मेलन में ’न्यूयार्क’ गये हुए हैं हिंदी की दशा-दिशा पर ,हिंदी को भारत की राष्ट्र -भाषा बनाने के लिये.हिंदी लेखन पर महादशा चल रही है न आज-कल । तू इस गली में किसी लब्ध प्रतिष्ठित हिंदी लेखक को जानता है?
’अरे है न ! पिछली गली में मेरे मकान के पीछे’
’अच्छा! क्या करता है?’
’अरे यही कुछ अल्लम-गल्लम लिखता रहता है ।मैं तो जब भी उसके पास गया हूँ तो निठ्ठ्ल्ला बैठ कुछ सोचता रहता है या लिखता रहता है। डाक्टर ने बताया कि यह एक प्रकार की बीमारी है . भाभी जी कहती हैं घर में काम न करने का एक बहाना है
’ अरे यार ! किस उठाईगीर का नाम बता रहा है ,किसी महान साहित्यकार का नाम बता न।’
अरे तू एक बार उसका इन्टरव्यू चैनेल पर दिखा न ,वह भी महान बन जायेगा. राखी सावंत को नही देखा ?
चिरौंजी लाल के प्रस्ताव पर सहमति बनी. इन्टरव्यू का दिन तय हो गया. तय हुआ कि इन्टरव्यू मेरे इसी मकान पर मेरे अध्ययन कक्ष में होगी.मैने तैयारी शुरु कर दी ,अपने अन्य साथी लेखकों से तथा कुछ कबाड़ी बाज़ार से पुरानी पुस्तकें खरीद कर अपने ’बुक-शेल्फ़" में करीने से सजा कर लगा दी. कैमरे के फ़ोकस में आना चाहिए।कमरे का रंग-रोगन करा दिया। श्रीमती जी ने अपनी एक-दो साड़ी ड्राई क्लीनर को धुलने को दे आईं..इन्टरव्यू में साथ जो बैठना होगा.मैने भी अपना खद्दर का कुरता ,पायजामा,टोपी, अंगरखा, जवाहिर जैकेट ,शाल वगैरह धुल-धुला कर रख लिया .राष्ट्रीय प्रसारण होगा ,दूसरी भाषा के लेखक क्या धारणा बनायेगे हिंदी के एक लेखक के प्रति.। अत: हिंदी की अस्मिता के रक्षार्थ तैयारी में लग गया। कुछ स्वनामधन्य लेखकों के इन्टरव्यू पढे़ ,अखबार की कतरने पढी़
००० ०००००० ०००००००
नियति तिथि पर चैनेल वाले आ गये।कैमरा नियति कोण पर लगाया जाने लगा. फ़ोकस में रहे.माईक टेस्टिंग हो रही थी । आवाज़ बरोबर पकडे़गी तो सही. इन्टरव्यू प्रारम्भ हो गया.
टी०वी०- आनन्द जी ! आप का स्वागत है. आप व्यंग लिखते है? आप को यह शौक कब से है?
श्रीमती जी बीच ही में बात काटते हुए और साडी़ का पल्लू ठीक करते हुए बोल पडी़- " आप शौक कहते है इसे? अरे रोग कहिए
रोग,मेरी तो किस्मत ही फ़ूट गई थी कि....
"आप चुप रहेंगी ,व्यर्थ में ....’ मैने डांट पिलाते हुए अपना पति-धर्म निभाया
’ हां हां मै तो चुप ही रहूगी ,३० साल से चुप ही तो हूँ कि आप को यह रोग लग गया. भगवान न करे कि किसी कलम घिसुए से...’
’ना माकूल औरत .’- मैने दूसरी बार पति-धर्म क निर्वाह किया
वह तो अच्छा हुआ कि कैमरा मैन ने कैमरा चालू नही किया था ,शायद वह भी कोई विवाहित व्यक्ति था\
मैं - " हाँ ज़नाब ! पूछिए"
टी०वी०--’आप व्यंग लिखते हैं? आप को यह शौक कब से है??
मैं --" ऎ वेरी गुड क्योश्चन ,यू सी ,एक्चुअली ...आई लाइक दिस क्यूश्चन ...आई मीन..यू नो..इन हिंदी...’ मैं कुछ कन्धे उचका कर कहने ही जा रहा था कि उस चैनेल वाले ने एक सख्त आदेश दिया -पिन्टू कैमेरा बन्द कर.फ़िर मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ
टी०वी०-" सर जी ! आप हिंदी के लेखक हो ,हिंदी में लिखते हो तो इन्टरव्यू अंग्रेजी में क्यों दे रहे हो?
मैं-- क्यों? इन्टरव्यू तो अंग्रेजी में तो देते हैं न! देखते नहीं हो हमारे हीरो-हीरोइन सारी फ़िल्में तो हिंदी में करते हैं ,गाना हिंदी मे गाते हैं .संवाद हिंदी में बोलते हैं परन्तु इन्टरव्यू अंग्रेजी में देते हैं.जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो भी ..यू सी..आई मीन..बट.आल दो..दैट्स आल....कह कर इन्टरव्यू देते हैं उन्हे तो कोई नहीं टोकता .वो लोग तो हिंदी से ऐसे बचते हैं कि हालीवुड वाला उन्हे कहीं गँवई-गँवार न समझ ले .फ़िर यह भेद-भाव हिंदी लेखक के साथ ही क्यों....?
टी०वी० -- वे फ़िल्मों में हिंदी की खाते है आप हिंदी को जीते है.सर आप अपनी तुलना उनसे क्यों करते हैं?
कुछ देर तक तो मुझे यही समझ में नहीं आया कि यह चैनेल वाला मुझे सम्मान दे रहा है या मुझ पर व्यंग कर रहा है
खैर ,इन्टरव्यू आगे बढ़ा
टी०वी०-- श्रीमान जी ! आप को व्यंग में अभिरुचि कब जगी?
मैं---- बचपने से.. वस्तुत: मैं पैदा होते ही व्यंग करने लग गया था .सच पूछिए तो मैं पैदाईशी व्यंगकार हूँ जैसे हर बड़ा एक्टर कहता है.बचपन में व्यंग करता था तो मां-बाप की डांट खाता था अब व्यवस्था को आईना दिखाता हूँ तो मार खाता हूँ
टी०वी० --- तो आप व्यंग लिखते ही क्यों हो?
मैं - क्या करुँ ,दिल है कि मानता नहीं
फ़लक को ज़िद है जहाँ बिज़लियाँ गिराने की
हमें भी ज़िद है वहीं आशियाँ बनाने की
टी० वी० -- आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर करते है?
मैं - - महोदय प्रथमत: आप अपना प्रश्न स्प्ष्ट करें .व्यंग करना और व्यंग लिखना दोनो दो बातें हैं
टी०वी० -- मेरा अभिप्राय यह है कि आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर कसते हैं
मैं-- श्रीमती जी पर । ज्यादा निरापद वही हैं। पिट जाने की स्थिति में पता नही चलता कि व्यंग के कारण पिटा हूँ या अपने
निट्ठल्लेपन के कारण पिटा हूँ .वैसे मुहल्ले वाले समझते हैं कि मैं अपनी बेवकूफ़ी के कारण पिटा हूँगा
ज़ाहिद व्यंग लिखने दे घर में ही बैठ कर
या वह जगह बता दे जहाँ न कोई पिटता होए
टी०वी० - बहुत से लोग व्यंग को साहित्य की विधा नहीं मानते ,आप को क्या कहना है
मैं -- भगवान उन्हे सदबुद्धि दे
टी०वी०-- सशक्त व्यंग से आप क्या समझते हैं?
मैं - सशक्त व्यंग कभी भी सशक्त व्यक्ति ,विशेषकर पहलवानों के सामने नहीं करना चाहिए.अंग-भंग की संभावना बनी रहती है.
टी०वी०- हिंदी व्यंग की दशा व दिशा पर आप की क्या राय है?
मैं- व्यंग की दशा पर महादशा का योग चल रहा है और दिशा हास्य की ओर।हास्य-व्यंग के बीच एक बहुत ही पतली रेखा है. आप
के लेखन से यदि आप के पेट में बल पड़ जाये तो समझिए की हास्य है और यदि माथे पर बल पड़ जाए तो समझिए कि
व्यंग है
टी०वी० आप क श्रेष्ठ व्यंग कौन -सा है?
मैं (कुछ शरमाते व सकुचाते हुए) यह प्रश्न तो बड़ा कठिन है .यह तो ऐसे ही हुआ जैसे लालू प्रसाद जी से कोई पूछे आप की इतनी
सन्तानों में सबसे प्रिय़ सन्तान...
टी०वी० फ़िर भी...
मैं अभी लिखा नही
टी०वी० तो भी..
मैं जो टी०वी० पर दिखाई जाए.जिस रचना पे सबसे ज्यादा एस०एम०एस० मिल जाय तो घटिया से घटिया रचना भी श्रेष्ट हो जाती है
टी०वी० सुना है आप ग़ज़ल भी लिख लेते हैं
मैं (कुछ झेंपते हुए) कुछ नहीं बस यूँ ही /वैसे गज़ल लिखी नहीं, कही जाती है.(मैने अपने इल्मे-ग़ज़ल का इज़हार किया।
फ़िर चैनेल वाला श्रीमती जी की तरफ मुखातिब हुआ ।तब तक श्रीमती जी ने अपना पल्लू वगैरह ठीक कर लिया था ताकि
प्रसारण में कोई दिक्कत न हो
टी०वी० भाभी जी ! आप की शादी हो गई है?
श्रीमती जी (शरमाते हुए) आप भी क्या सवाल पूछ रहे हैं ?
टी०वी० हम चैनेल वालों को पूछने पड़ते हैं ऎसे सवाल" इसी बात का प्रशिक्षण दिया जाता है हमें।यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा
होता है तो भी हम ऎसे सवाल पूछते हैं हम चैनेलवाले.....भाई साहब ,आप को डूबने में कैसा लग रहा है...
खैर छोड़िए यह व्यक्तिगत प्रश्न .आप बतायें कि आप ने इन में क्या देखा कि आप इन पर फ़िदा हो गई?
श्रीमती जी इनकी अक्ल
मैं हाँ जब आदमी की अक्ल मारी जाती है तभी वह शादी करता है
श्रीमती जी नहीं ,इनका अक्ल के पीछे लट्ठ (व्यंग) लिये फिरना ।पापा की पेन की एजेन्सी थी ,चिरौंजी भाई साहब ने बताया था कि
लड़का कलम क धनी है । पापा ने सोचा कि कलम के धन्धे में इज़ाफ़ा होगा ...मुझे क्या मालूम था कि कलम का धनी कलम
घिसुआ होता है ...वह तो मेरे करम फ़ूटे थे कि.....
मैं हाँ हाँ मैं ही गया था तुम्हारे पापा के पास.....
सम्भवत: आगामी दॄश्य -श्रव्य की कल्पना कर कैमरामैन ने कैमेरा बन्द कर दिया था । अनुभवी विवाहित व्यक्ति जो था.। शूटिंग
खत्म ...इन्टरव्यू खत्म।
जाते -जाते मैने पूछ लिया ," भाई साहेब ,इस इन्टरव्यू क प्रसारण कब होगा??
टी०वी० सर जी ! अगले सोमवार को प्राइम टाइम नौ बजे...
पाँच साल हो गये वह ’अगला सोमवार नहीं आया। संभवत: वह चैनेल भी बन्द हो गया होगा अब तक तो।
अस्तु
--आनन्द
उन दिनों, जब मैं जवान हुआ करता था तो यह चैनेल नहीं हुआ करते थे और जब मैं जवान नहीं तो १००-२०० चैनेल खुल गये। पॉप डान्स, रॉक डान्स,हिप डान्स,हॉप डान्स। उन दिनों ले-देकर एक ही चैनेल हुआ करता था-दूरदर्शन। शाम को २ घन्टे का प्रोग्राम आता था .आधा घंटा तो चैनेल का ’लोगो’ खुलने में लगता था -सत्यं शिवं सुन्दरम। फिर टमाटर की खेती कैसे करें ,समझाते थे ,धान की फ़सल पर कीट-नाशक दवाईयाँ कैसे छिड़के बताते थे । फिर समाचार वगैरह सुना कर सो जाते थे। सम्भवत: आज की जवान होती हुई पीढी को इस त्रासदी का अनुभव भी नहीं होगा।इन चैनलों से देश के युवा वर्ग कितने लाभान्वित हुए ,कह नही सकता परन्तु मेरे जैसे टँट्पुजिए लेखक का बड़ा फ़ायदा हुआ।चैनेल के शुरुआत में कोई विशेष प्रोग्राम या प्रायोजक तो मिलता नहीं तो दिन भर फ़िल्म दिखाते रहते हैं,गाना सुनाते रह्ते हैं या किसी पुराने धारावाहिक को धो-पोछ कर पुन: प्रसारण करते रहते हैं।’रियल्टी शो" के लिए कैमेरा लेकर निकल पड़ते हैं गली-कूचे में शूटिंग करने गाय-बकरी-कुत्ते-सूअर-साँड़-भैस।फ़िर चार दिन का विशेष कार्यक्रम बनाएगे दिखाने हेतु। नगर में गाय और यातायात की समस्या, बकरे कि माँ कब तक खैर मनायेगी देखिये इस चैनेल पर...सिर्फ़ इस चैनेल पर ..पहली बार ..ए़क्स्क्लूसिव रिपोर्ट..गलियों में सूअरों का आतंक....सचिवालय परिसर में स्वच्छ्न्द घूमते कुत्ते ,एक-एक घन्टे का कार्यक्रम तैयार...दिन में ३ बार दिखाना है सुबह-दोपहर-शाम ...दवाईओं की तरह ..समाज को स्वस्थ रखने हेतु।
एक शाम इसी चैनेल की एक टीम गली के नुक्कड़ पर ’ चिरौंजी" लाल से टकरा गई । संवाददाता संभवत: चिरौंजी लाल का परिचित निकला -’ अरे यार ! चिरौंजी ! तू इधर ? यार तू किधर?
इस इधर-उधर के उपरान्त दोनों अपने पुराने दिनों की यादों में खो गये परन्तु ’मिस तलवार" को याद करना दोनों मित्र नहीं भूले ."मिस तलवार...अरे वही जो...। चेतनावस्था में लौटते ही उक्त संवाददाता महोदय ने अपनी वास्तविक व्यथा बताई।
’यार चिरौंजी ! हिन्दी के किसी साहित्यकार का एक इन्टरव्यू करना है ,मुझे तो कोई मिला नहीं, जितने महान साहित्यकार हैं वो आज-कल विश्व हिंदी सम्मेलन में ’न्यूयार्क’ गये हुए हैं हिंदी की दशा-दिशा पर ,हिंदी को भारत की राष्ट्र -भाषा बनाने के लिये.हिंदी लेखन पर महादशा चल रही है न आज-कल । तू इस गली में किसी लब्ध प्रतिष्ठित हिंदी लेखक को जानता है?
’अरे है न ! पिछली गली में मेरे मकान के पीछे’
’अच्छा! क्या करता है?’
’अरे यही कुछ अल्लम-गल्लम लिखता रहता है ।मैं तो जब भी उसके पास गया हूँ तो निठ्ठ्ल्ला बैठ कुछ सोचता रहता है या लिखता रहता है। डाक्टर ने बताया कि यह एक प्रकार की बीमारी है . भाभी जी कहती हैं घर में काम न करने का एक बहाना है
’ अरे यार ! किस उठाईगीर का नाम बता रहा है ,किसी महान साहित्यकार का नाम बता न।’
अरे तू एक बार उसका इन्टरव्यू चैनेल पर दिखा न ,वह भी महान बन जायेगा. राखी सावंत को नही देखा ?
चिरौंजी लाल के प्रस्ताव पर सहमति बनी. इन्टरव्यू का दिन तय हो गया. तय हुआ कि इन्टरव्यू मेरे इसी मकान पर मेरे अध्ययन कक्ष में होगी.मैने तैयारी शुरु कर दी ,अपने अन्य साथी लेखकों से तथा कुछ कबाड़ी बाज़ार से पुरानी पुस्तकें खरीद कर अपने ’बुक-शेल्फ़" में करीने से सजा कर लगा दी. कैमरे के फ़ोकस में आना चाहिए।कमरे का रंग-रोगन करा दिया। श्रीमती जी ने अपनी एक-दो साड़ी ड्राई क्लीनर को धुलने को दे आईं..इन्टरव्यू में साथ जो बैठना होगा.मैने भी अपना खद्दर का कुरता ,पायजामा,टोपी, अंगरखा, जवाहिर जैकेट ,शाल वगैरह धुल-धुला कर रख लिया .राष्ट्रीय प्रसारण होगा ,दूसरी भाषा के लेखक क्या धारणा बनायेगे हिंदी के एक लेखक के प्रति.। अत: हिंदी की अस्मिता के रक्षार्थ तैयारी में लग गया। कुछ स्वनामधन्य लेखकों के इन्टरव्यू पढे़ ,अखबार की कतरने पढी़
००० ०००००० ०००००००
नियति तिथि पर चैनेल वाले आ गये।कैमरा नियति कोण पर लगाया जाने लगा. फ़ोकस में रहे.माईक टेस्टिंग हो रही थी । आवाज़ बरोबर पकडे़गी तो सही. इन्टरव्यू प्रारम्भ हो गया.
टी०वी०- आनन्द जी ! आप का स्वागत है. आप व्यंग लिखते है? आप को यह शौक कब से है?
श्रीमती जी बीच ही में बात काटते हुए और साडी़ का पल्लू ठीक करते हुए बोल पडी़- " आप शौक कहते है इसे? अरे रोग कहिए
रोग,मेरी तो किस्मत ही फ़ूट गई थी कि....
"आप चुप रहेंगी ,व्यर्थ में ....’ मैने डांट पिलाते हुए अपना पति-धर्म निभाया
’ हां हां मै तो चुप ही रहूगी ,३० साल से चुप ही तो हूँ कि आप को यह रोग लग गया. भगवान न करे कि किसी कलम घिसुए से...’
’ना माकूल औरत .’- मैने दूसरी बार पति-धर्म क निर्वाह किया
वह तो अच्छा हुआ कि कैमरा मैन ने कैमरा चालू नही किया था ,शायद वह भी कोई विवाहित व्यक्ति था\
मैं - " हाँ ज़नाब ! पूछिए"
टी०वी०--’आप व्यंग लिखते हैं? आप को यह शौक कब से है??
मैं --" ऎ वेरी गुड क्योश्चन ,यू सी ,एक्चुअली ...आई लाइक दिस क्यूश्चन ...आई मीन..यू नो..इन हिंदी...’ मैं कुछ कन्धे उचका कर कहने ही जा रहा था कि उस चैनेल वाले ने एक सख्त आदेश दिया -पिन्टू कैमेरा बन्द कर.फ़िर मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ
टी०वी०-" सर जी ! आप हिंदी के लेखक हो ,हिंदी में लिखते हो तो इन्टरव्यू अंग्रेजी में क्यों दे रहे हो?
मैं-- क्यों? इन्टरव्यू तो अंग्रेजी में तो देते हैं न! देखते नहीं हो हमारे हीरो-हीरोइन सारी फ़िल्में तो हिंदी में करते हैं ,गाना हिंदी मे गाते हैं .संवाद हिंदी में बोलते हैं परन्तु इन्टरव्यू अंग्रेजी में देते हैं.जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती वो भी ..यू सी..आई मीन..बट.आल दो..दैट्स आल....कह कर इन्टरव्यू देते हैं उन्हे तो कोई नहीं टोकता .वो लोग तो हिंदी से ऐसे बचते हैं कि हालीवुड वाला उन्हे कहीं गँवई-गँवार न समझ ले .फ़िर यह भेद-भाव हिंदी लेखक के साथ ही क्यों....?
टी०वी० -- वे फ़िल्मों में हिंदी की खाते है आप हिंदी को जीते है.सर आप अपनी तुलना उनसे क्यों करते हैं?
कुछ देर तक तो मुझे यही समझ में नहीं आया कि यह चैनेल वाला मुझे सम्मान दे रहा है या मुझ पर व्यंग कर रहा है
खैर ,इन्टरव्यू आगे बढ़ा
टी०वी०-- श्रीमान जी ! आप को व्यंग में अभिरुचि कब जगी?
मैं---- बचपने से.. वस्तुत: मैं पैदा होते ही व्यंग करने लग गया था .सच पूछिए तो मैं पैदाईशी व्यंगकार हूँ जैसे हर बड़ा एक्टर कहता है.बचपन में व्यंग करता था तो मां-बाप की डांट खाता था अब व्यवस्था को आईना दिखाता हूँ तो मार खाता हूँ
टी०वी० --- तो आप व्यंग लिखते ही क्यों हो?
मैं - क्या करुँ ,दिल है कि मानता नहीं
फ़लक को ज़िद है जहाँ बिज़लियाँ गिराने की
हमें भी ज़िद है वहीं आशियाँ बनाने की
टी० वी० -- आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर करते है?
मैं - - महोदय प्रथमत: आप अपना प्रश्न स्प्ष्ट करें .व्यंग करना और व्यंग लिखना दोनो दो बातें हैं
टी०वी० -- मेरा अभिप्राय यह है कि आप सबसे ज्यादा व्यंग किस पर कसते हैं
मैं-- श्रीमती जी पर । ज्यादा निरापद वही हैं। पिट जाने की स्थिति में पता नही चलता कि व्यंग के कारण पिटा हूँ या अपने
निट्ठल्लेपन के कारण पिटा हूँ .वैसे मुहल्ले वाले समझते हैं कि मैं अपनी बेवकूफ़ी के कारण पिटा हूँगा
ज़ाहिद व्यंग लिखने दे घर में ही बैठ कर
या वह जगह बता दे जहाँ न कोई पिटता होए
टी०वी० - बहुत से लोग व्यंग को साहित्य की विधा नहीं मानते ,आप को क्या कहना है
मैं -- भगवान उन्हे सदबुद्धि दे
टी०वी०-- सशक्त व्यंग से आप क्या समझते हैं?
मैं - सशक्त व्यंग कभी भी सशक्त व्यक्ति ,विशेषकर पहलवानों के सामने नहीं करना चाहिए.अंग-भंग की संभावना बनी रहती है.
टी०वी०- हिंदी व्यंग की दशा व दिशा पर आप की क्या राय है?
मैं- व्यंग की दशा पर महादशा का योग चल रहा है और दिशा हास्य की ओर।हास्य-व्यंग के बीच एक बहुत ही पतली रेखा है. आप
के लेखन से यदि आप के पेट में बल पड़ जाये तो समझिए की हास्य है और यदि माथे पर बल पड़ जाए तो समझिए कि
व्यंग है
टी०वी० आप क श्रेष्ठ व्यंग कौन -सा है?
मैं (कुछ शरमाते व सकुचाते हुए) यह प्रश्न तो बड़ा कठिन है .यह तो ऐसे ही हुआ जैसे लालू प्रसाद जी से कोई पूछे आप की इतनी
सन्तानों में सबसे प्रिय़ सन्तान...
टी०वी० फ़िर भी...
मैं अभी लिखा नही
टी०वी० तो भी..
मैं जो टी०वी० पर दिखाई जाए.जिस रचना पे सबसे ज्यादा एस०एम०एस० मिल जाय तो घटिया से घटिया रचना भी श्रेष्ट हो जाती है
टी०वी० सुना है आप ग़ज़ल भी लिख लेते हैं
मैं (कुछ झेंपते हुए) कुछ नहीं बस यूँ ही /वैसे गज़ल लिखी नहीं, कही जाती है.(मैने अपने इल्मे-ग़ज़ल का इज़हार किया।
फ़िर चैनेल वाला श्रीमती जी की तरफ मुखातिब हुआ ।तब तक श्रीमती जी ने अपना पल्लू वगैरह ठीक कर लिया था ताकि
प्रसारण में कोई दिक्कत न हो
टी०वी० भाभी जी ! आप की शादी हो गई है?
श्रीमती जी (शरमाते हुए) आप भी क्या सवाल पूछ रहे हैं ?
टी०वी० हम चैनेल वालों को पूछने पड़ते हैं ऎसे सवाल" इसी बात का प्रशिक्षण दिया जाता है हमें।यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा
होता है तो भी हम ऎसे सवाल पूछते हैं हम चैनेलवाले.....भाई साहब ,आप को डूबने में कैसा लग रहा है...
खैर छोड़िए यह व्यक्तिगत प्रश्न .आप बतायें कि आप ने इन में क्या देखा कि आप इन पर फ़िदा हो गई?
श्रीमती जी इनकी अक्ल
मैं हाँ जब आदमी की अक्ल मारी जाती है तभी वह शादी करता है
श्रीमती जी नहीं ,इनका अक्ल के पीछे लट्ठ (व्यंग) लिये फिरना ।पापा की पेन की एजेन्सी थी ,चिरौंजी भाई साहब ने बताया था कि
लड़का कलम क धनी है । पापा ने सोचा कि कलम के धन्धे में इज़ाफ़ा होगा ...मुझे क्या मालूम था कि कलम का धनी कलम
घिसुआ होता है ...वह तो मेरे करम फ़ूटे थे कि.....
मैं हाँ हाँ मैं ही गया था तुम्हारे पापा के पास.....
सम्भवत: आगामी दॄश्य -श्रव्य की कल्पना कर कैमरामैन ने कैमेरा बन्द कर दिया था । अनुभवी विवाहित व्यक्ति जो था.। शूटिंग
खत्म ...इन्टरव्यू खत्म।
जाते -जाते मैने पूछ लिया ," भाई साहेब ,इस इन्टरव्यू क प्रसारण कब होगा??
टी०वी० सर जी ! अगले सोमवार को प्राइम टाइम नौ बजे...
पाँच साल हो गये वह ’अगला सोमवार नहीं आया। संभवत: वह चैनेल भी बन्द हो गया होगा अब तक तो।
अस्तु
--आनन्द
रविवार, 21 जून 2009
व्यंग्य 008-V : एक ग़ज़ल की मौत ......
व्यंग्य 008-V: एक ग़ज़ल की मौत
विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं - वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -
'रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से क्या काम
रोटी कपडा और मकान "
'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है बाएं से उतर सकता है ,दाएं से उतर सकता है .वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -
तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
'यह मकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -
ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
"अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
"अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
"या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे"र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
"पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, करुण रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था -
दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं
पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है '
'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी
फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें
अस्तु
-आनन्द पाठक---
विवाहित कवियों को जो एक सुविधा सर्वदा उपलब्ध रहती है और अविवाहित कवियों को नहीं - वह है एक अदद श्रोता और वह श्रोता होती है उनकी श्रीमती जी -अभागिन अभागिन इसलिए कि वह हमारे जैसे चिरकुट कवि की धर्मपत्नी होती है अगर वह किसी हवलदार की पत्नी होती तो वह हमसे ज्यादा ही कमा कर लाता इसीलिए वह आजीवन अपने भाग्य को कोसती रहती हैं एक वह दिन कि आज का दिन वह तो विधि का विधान था कि इस कलम घिसुए कवि से शादी हुई कौन मिटा सकता है इसे.!हर कवि की आदि श्रोता वही होती है और अंतिम श्रोता भी वही -बेचारी उधर किसी गीत का मुखडा बना नहीं कि कवि महोदय के पेट में प्रसव-पीडा शुरू हो जाती है- कब सुनाए ,किसे सुनाए उस समय तो कोई मिलता है नहीं अत: पत्नी को ही आवाज़ लगाते हैं -'अरे ! भाग्यवान ! इधर तो आना एक गीत सुनाता हूँ -
'रोटी कपडा और मकान
कवियों का इस से क्या काम
रोटी कपडा और मकान "
'बोलो कैसी लगी ?'- कवि महोदय ने समर्थन माँगा
पत्नी इस कविता का अर्थ नहीं ,मर्म समझती है -अपना निठ्ठ्ल्लापन ढांप रहा है यह आदमी.जल्दी रसोई घर में भागती है .तवे पर रोटी छोड़ कर आई थी. रोटी पलटनी थी . देखा रोटी जल गई . सोचती है -क्या जला? रोटी ,दिल या अपना भाग्य? इनकी कविता सुनते-सुनते काश ! कि हम बहरे होते
ऐसी ही एक प्रसव-पीडा एक कवि जी को रात २ बजे हुई कि सोती हुई पत्नी को जगा कर एक अंतरा सुनाने की चेष्टा की थी.पत्नी ने उनके मुख पर तकिया रख कर दबा दिया फिर सारे अंतरा-मुखडा सुप्त हो गए कहते हैं कि वह एक विदुषी महिला थीं
परन्तु अविवाहित कवियों को एक जो सुविधा सर्वदा उपलब्ध होती है वह विवाहित कवियों को आजीवन उपलब्ध नहीं होती . चाहें तो वाजपेई जी से पूछ सकते हैं और वह सुविधा है रात्रि शयन में खाट से उतरना अविवाहित कवि स्वेच्छा से जिस तरफ से चाहें उतर सकता है बाएं से उतर सकता है ,दाएं से उतर सकता है .वह स्वतंत्र है स्वतंत्र लेखन करता है यह स्वतंत्रता विवाहित कवियों को नहीं है यही कारण है की विवाहित कवि या तो 'वाम-पंथी' विचारधारा के होते हैं या फिर 'दक्षिण-पंथी' विचारधारा के होते है जो खाट से उतरते ही नहीं वह 'निठ्ठल्ले" कवि होते हैं -नाम बताऊँ?
मगर शायरों की बात अलग है. एक बार ऐसा ही जच्चा वाला दर्द मुझे भी हुआ था . शे'र बाहर आने के लिए कुलांचे मार रहा था' 'मतला' हो गया (मिचली नहीं) .सोचा नई ग़ज़ल है .बेगम को सुनाते है -
तुमको न हो यकीं मगर मुझको यकीन है
रहता है दिल में कोई तुझ-सा मकीन है
'यह मकीन कौन है?कोई कमीन तो नहीं ? -बेगम ने शक की निगाह से पूछा
दिलखुश हो गया. चलो एक लफ्ज़ तो ऐसा लिखा जिसका मायने इन्हें नहीं मालूम. वज़नदार शे'र वही जिसका न तासीर समझ में आये न अल्फाज़ .लगता है शे"र अच्छा बना है मैंने बड़े प्यार से समझाया- 'मकीन माने जो घर में रहता है मकान वाला -उर्दू में मकीन बोलते हैं . उन्हें मेरे उर्दू की जानकारी पर फक्र हुआ हो या न हुआ हो मगर शुबहा ज़रूर हो गया की हो न हो मेरे दिल में उनके अलावा और भी कोई रहता है .मेरा कहीं लफडा ज़रूर है
यकायक चिल्ला उठी - मुझे तो पहले से ही यकीन था की ज़रूर तुम्हारा कहीं लफडा है आपा ठीक ही कहती थी कि ये शायर बड़े रोमानी आशिकाना मिजाज़ के होते हैं .इश्किया शायरी की आड़ में क्या क्या गुल खिलाते है ज़रा इन पर कड़ी नज़र रखना लगता है आपा ने ठीक ही कहा था
' बेगम तुम औरतों के दिमाग में बस एक ही बात घूमती रहती है अरे! इस शे'र का मतलब समझो ,शे'र का वज़न देखो -शायर कहना चाहता है की या अल्लाह ,परवरदिगार मेरे ,आप को यकीन हो न हो परन्तु हमें पूरा यकीन है की मेरे दिल में आप की मानिंद एक साया इधर भी रहता है
अभी मैं समझा ही रहा था की बेगम साहिबा बीच में ही चीख उठी -" चुप रहिए! हमें चराने की कोशिश न कीजिए .हम वो बकरियां नहीं कि आप चराएं और हम चर जाएँ. आप क्या समझते हैं की हमे आप की नियत नहीं मालूम !,नज़र किधर है नहीं मालूम !हमे सब मालूम्हें .अरे! यह शायर लिखते तो है अपने उस 'छमक-छल्लो' के लिए और नाम लेते है 'खुदा' का . अल्लाह का > अरे कमज़र्फ़ आदमी !शर्म नहीं आती परवरदिगार को बीच में लाने पर.
" कौन है वह?'-उन्होंने गुस्से में आँख तरेरते हुए पूछा
'कौन? -मैंने सकपकाते हुए पूछा
' अरे! वही कलमुंही ,मकीन,कमीन यकीन जो भी नाम हो उसका जो तुम्हारे दिलमें दिल-ओ-जान से रहती है ?'
'लाहौल विला कूवत. लानत है तुम्हारी समझदारी पर '
'हाँ हाँ !अब तो लानत भेजोगे ही मुझ पर जब शादी कर के लाए थे तब लानत नहीं भेजी थी '
'बेगम साहिबा ! तुम तो समझती ही नहीं '
'हाँ हाँ अब मैं क्यों समझने लगूं. तुम क्या समझते हो कि हमें शे'र समझने की तमीज नहीं !अरे! हमने भी कमेस्ट्री से एम० ए० किया है हम ने भी हाई स्कूल तक हिंदी पढ़ी है .खूब समझती हूँ तुम्हारी ग़ज़ल और ग़ज़ल की असल ....
फिर क्या होना था .वही हुआ जो ऐसे मौके पर हर पत्नी करती है -रोना-धोना सर पीटना (अपना) अचूक अस्त्र अचूक निशाना
अब ग़ज़ल का अगला शे'र क्या सुनाना
०० ०० ००००००
शायरों की यही तो कमज़ोरी है .इस तरह की दाद पर मायूस हो जाएं तो हो चुकी शायरी अरे! शायरी तो दीवानापन है ,बेखुदी है.सड़े अंडे-टमाटर की परवाह कौन करे मजनू ने की थी क्या? महीने गुज़र गए अब तक तो बेगम का गुस्सा भी ठंडा हो गया होगा चलते हैं दूसरा शे'र सुनाते हैं -
ताउम्र इसी बात की जद्द-ओ-ज़हद रही
अपनी ज़मीन है या उनकी ज़मीन है
अभी शे'र का काफिया ख़त्म भी न हुआ था की बेगम साहिबा एक बार फिर भड़क उठी -"हाय अलाह !अब ज़मीन जायदाद भी उसके नाम कर दिया क्या! "
"अरे! चुप ,किस की बात कर रही हो तुम?"
"अरे! तुम्हारे कमीन - मकीन की "
"या अल्लाह इस नाशुक्री बीवी को थोडा-सा अक्ल अता कर वरना तुम्हारा यह शायर इस कमज़र्फ़ बीवी के हाथों ख्वामख्वाह मारा जाएगा मैंने तो यह शे"र तुम्हारी शान में पढा था यह जिस्म यह जान किस की है ..अपनी या तुम्हारी ...."
"पहले ज़मीन-जायदाद का कागज़ दिखाओ ..ज़रूर उस सौतन को लिखने का इरादा होगा ...." बेगम साहिबा ने मेरा हाथ ही पकड़ लिया
अब इस शे'र के मानी क्या समझाते अगला शे'र क्या सुनाते चुप ही रहना बेहतर समझा
०० ०००००००००
अब मैंने यह तय कर लिया की अब इस औरत को न कोई शे'र सुनाना, न कोई ग़ज़ल इस से अच्छा तो किसी चाय की दुकान पे सुनाते तो कम से कम चाय तो मिलती.घर की मुर्गी साग बराबर .इस औरत के लिए तो घर का जोगी जोगडा ...इसे मेरी औकात का क्या पता आज शाम नखास पर मुशायरा है बड़े अदब से बुलाया है उन लोगो ने अपनी शेरवानी निकाली.चूडीदार पायजामा पहना,फर की टोपी पहनी ,आँखों में सुरमा लगाया ,कानो के पास इतर लगाया ,करीने से रुमाल रखा.फिल्मवालों ने यही ड्रेस कोड तय कर रखा है हम जैसे शायरों के लिए .शायरी में दम हो न हो मगर ड्रेस में तो दम हो .
कवि की बात अलग है ,शायरी की बात अलग वीर रस के कवि हैं तो मंच पर आये ,हाथ-पैर पटक गए,श्रृंगार रस के कवि हैं तो आए और लिपट गए, करुण रस के कवि हैं तो रो-धो कर निपट गए मगर शायरी ! शायर को एक एक शे'र तीन-तीन बार पढ़ना पड़ता है फिर देखना पड़ता है किधर से गालियाँ आ रही है ,किधर से तालियाँ .हम गुमनाम शायरों के लिए सड़े अंडे-टमाटर तो छोड़ दीजिए यहाँ भी 'ब्रांड-वैल्यू' बिकता है नामचीन शायर है तो मंच पर आने से पहले 'तालियाँ बजती हैं ,हम जैसों के लिए जाने के बाद 'तालियाँ' बजती है -गया मुआ ! पता नहीं कहाँ -कहाँ से पकड़ लाते हैं यह प्रोग्राम वाले.
अब तो ड्रेस पर ही भरोसा था .शीशे के सामने खड़े हो कर शे'र अदायगी का रिहर्सल कर रहा था -
दीदार तो नहीं है चर्चे मगर सुने -
वह भी किसी हसीं से ज्यादा हसीन हैं
पीछे से किसी ने ताली बजाई ,सामने से मैंने शुक्रिया अदा किया .मुड़ कर देखा बेगम साहिबा हैं.-'वाह ! वाह ! सुभान अल्लाह !सुभान अल्लाह !क्या शे'र मारा है .अब जाओ दीदार भी कर लो ,बेकरार होगी .कब्र में पाँव लटकाए बैठे है ज़नाब की न जाने कब फाख्ता उड़ जाय ...वह भी हसरत पूरी कर लो ....'-बेगम साहिबा ने भडास निकाली .
'बेगम ! किसकी बात कर रही हो?'
'अरे! उसी कलमुंही कमीन मकीन की.हसीन हैं न ! हम से भी ज्यादा हसीन है न '
'लाहौल विला कूवत ! कमज़र्फ़ औरत! शे'र समझने की तमीज नहीं तमीज होगी भी कैसे -सास बहू सीरियल देखने से.टेसूए बहाने से .किट्टी पार्टी करने से फुरसत होगी तब न ,शायरी समझने की तमीज आयेगी '
'हाँ हाँ ,हमें क्यों तमीज आयेगी ! सारी तमीज या तो उस छमकछल्लो के पास है या आप के पास है '
'बेगम ! इस शे'र का मतलब तुम नहीं समझती हो ,इस का मतलब है या मेरे मौला ,परवरदिगार जिन्दगी गुजर गयी मगर आज तक दीदार नहीं हो सका ,मगर खुदा के बन्दे बताते है की आप इस ज़हान के सब से खूबसूरत हसीन .....'
देखिए जी .कहे देती हूँ !हमें इतनी भोली मत समझिए ,हमारे अब्बा ने मुझे भी तालीम दी है ,हमें भी अदीब की जानकारी है हम उड़ती चिडिया के पर गिन सकते हैं ,खुली आँखों से सुरमा चुरा सकते हैं आप हम से नज़रें नहीं चुरा सकते हैं .....वो तो मेरे करम ही फूटे थे की......'-कहते -कहते रो पडी
फिर उसके बाद क्या हुआ ,विवाहित पाठकों की कल्पना पर छोड़ देता हूँ वहां से जो भागा तो मुशायरे में जा कर ही दम लिया .पूरी ग़ज़ल वहीँ पढ़ी -गालियाँ मिली या तालियाँ आप स्वयं ही समझ लें
अस्तु
-आनन्द पाठक---
शुक्रवार, 12 जून 2009
व्यंग्य 07 :विश्वासमत और छींक .....
राजनैतिक गहमागहमी व उठापटक के मध्य सदन-पटल पर एक पंक्ति का प्रस्ताव रखा गया - यह सदन सरकार के प्रति अपना विश्वास प्रगट करता है
अध्यक्ष जी ने ,सदन की कार्यवाई शुरू करते हुए चर्चा में भाग लेने हेतु 'क' जी का नाम पुकारा 'क' महोदय जैसे ही अपना पक्ष रखना शुरू किया -'माननीय अध्यक्ष जी ! इस सदन के माध्यम से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान सरकार ..... तभी अचानक किसी ने बिना नाक पर रुमाल रखे एक जोरदार छींक मारी कि सारा सदन गूंज गया .सभी लोग उनकी ओर देखने लगे ज्ञात हुआ कि वह किसी विपक्षी दल के सदस्य थे
विश्वासमत पर बहस के प्रारम्भ में ही यह छींक ! किसी अनागत अनिष्ट कि आशंका से सत्तापक्ष चिंतित हो गया प्रथम ग्रासे मच्छिका पात: नहीं छींक पात: यह छींक शुभ नहीं है प्रस्ताव गिर सकता है .सरकार गिर सकती है सतापक्ष मैं बेचैनी बढ़ने लगी तभी अचानक सत्तापक्ष के एक त्रिशूलधारी सदस्य खड़े हो गए
'अध्यक्ष जी ! अभी-अभी विपक्ष के किसी मित्र ने इस भरे सदन में एक छींक मारी है जो उचित नहीं है .यह छींक किसी आने वाले अनिष्ट का संकेत मात्र है ...शास्त्रों में लिखा है ...
" सम्मुख छींक लड़ाई भाखे
छींक दाहिने द्रव्य विनाशे
"पहले आप बैठिये ! प्लीज़! "-अध्यक्ष महोदय ने आग्रह किया
" महोदय ! खेद है मैं यहाँ बैठने हेतु नहीं आया हूँ मैं अपने चुनाव क्षेत्र से खडा हो कर आया हूँ .क्षेत्र की समस्याओं को खडा करने आया हूँ .देश की ....'
"प्लीज़ आप चुप रहिये 'क' जी को अपनी बात कहने दीजिये .आप का जब क्रम आएगा तो अपनी बात कहियेगा '
" अध्यक्ष जी ! छींक तो उस ने अभी मारी है .जब अनिष्ट हो ही जाएगा ,विशवास मत गिर ही जाएगा तो कहने को क्या रह जाएगा !?
"नहीं ,नहीं, प्लीज़ उस से पहले आप को मौका दिया जाएगा."
" अभी आप बैठे ,प्लीज़ आप चुप रहे सदस्य 'क' को बोलने दें...'क' जी आप चालू रहे .'- अध्यक्ष जी ने अपनी व्यवस्था दी.
'क' जी ने गतांश से आगे कहना शुरू किया -."हाँ तो मैं कह रहा था कि....."
अचानक तीन-चार भगवाधारी सदस्य एक साथ खड़े हो समवेत स्वर में कहना शुरू किया ---"सर!यह छींक भारतीय संस्कृति से जुडा प्रश्न है..विशेषत: हिन्दू संस्कृति से. महोदय यह एक गंभीर प्रश्न है...
ऊँची छींक कहे जयकारी
नीची छींक होय भयकारी
" प्लीज़ !आप तीनो ,नहीं चारो बैठ जाए "क' जी को बात कहने दें.
" महोदय अगर हम बैठ गए तो हिन्दू-संस्कृति बैठ जायेगी ,करोडों हिन्दुओं का विश्वास बैठ जाएगा धर्म बैठ जाएगा . विश्वासमत पर छींक शुभ नहीं है."
" अध्यक्ष जी ,यह धरम-करम की बातें कर रहे हैं' -कई तिरंगाधारी के साथ खड़े हो गए.
"छींक विपक्ष के सदस्य ने मारी है "
"छींक 'क' जी के पृष्ठ भाग से मारी है इसका फलाफल प्रभाव कम होता है"-एक सदस्य ने चुटकी ली
'तो क्या ! मारी तो अध्यक्ष जी के सम्मुख ही न ! इसका प्रभाव अनिष्ट होता है '- किसी दूसरे सदस्य ने चुटकी ली.
'यह भारतीय संस्कृति की अस्मिता का प्रश्न है -कमंडलधारियों ने कहा
"यह सरासर 'कम्युनलिज्म' है '--लाल झंडा वालों ने कहा
'यह दलित सदस्य का अपमान है '- नीला झंडा धारियों ने कहा -" यह साजिश है षडयंत्र है '
'यह व्यवस्था का प्रश्न है '-एक खैनी-सुरती ठोकने वाले ने कहा
'प्लीज़ प्लीज़ आप लोग शांत हो जाए '-अंत में अध्यक्ष जी ने कहा -प्लीज़ आप बैठ जाए.'क' जी को अपनी बात कहने दें .हाँ 'क' जी आप चालू रहें '
विश्वास मत पर गंभीर बहस चल रही थी क्यों की स्थिति उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही थी.लोकतंत्र समृद्ध हो रहा था क्यों कि लोग चीखने -चिलाने कि कला में समृद्ध हो रहे थे.सदन में सरकार के भाग्य का फैसला होना है लोग देश कि अस्मिता पर बहस कर रहे थे,छींक पर बहस कर रहे थे .सच भी है .आदमी रहेगा तो छींक रहेगी ,छींक रहेगी तो संस्कृति का प्रश्न उठेगा.भारत कि अस्मिता का प्रश्न उठेगा.फिर देश रहेगा तो सरकार रहेगी.सरकार का क्या है ! आनी-जानी है.परन्तु नासिका-रंध्र से निकली छींक वापस नहीं जानी है.अत: विचार और बहस इस मुई छींक पर ही होनी चाहिए.
अध्यक्ष जी के आदेशानुसार 'क' महोदय ने अपना वक्तव्य गतांश से आगे पढ़ना शुरू किया -' धन्यवाद अध्यक्ष जी ! हाँ तो मैं कह रहा था कि जब से यह वर्तमान सरकार ...."
'महोदय यह व्यवस्था का प्रश्न है '- त्रिशूलधारी जे ने ,जो अबतक खड़े थे,गोला दागा -विश्वास मत पर बहस से पहले छींके गए अशुभ छींक जैसे गंभीर विषय पर बहस होनी चाहिए '
'अरे! आप अभी तक बैठे नहीं?प्लीज़ पहले आप बैठ जायें. '-अध्यक्ष जी ने कहा -'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये /हाँ तो 'क' जी आप चालू रहें...
लोकतंत्र की आधी उर्जा सदस्यों को मनाने में लग जाती है और आधी उर्जा रूठे सदस्यों को चुप कराने में लग जाती है.सरकारी कार्य निष्पादन हेतु उर्जा बचती ही नहीं अत; सारे विकास कार्य बिना उर्जा के ही चलता है .यही भारतीय लोकतंत्र का 'आठवां' आर्श्चय है .
'क' जी ने कहना शुरू किया -'हाँ तो मैं कह रहा था कि यह सरकार .......
सदन के एक कोने से एक निर्दलीय जी अचानक उठ खड़े हुए और कहने लगे '....महोदय! विपक्षी पार्टियों की यह छींक कोई साधारण छींक नहीं है यह राजनैतिक छींक है एक सोची-समझी रणनीति के तहत छींक है यह एक साजिस है एक षडयंत्र है ...'
'प्लीज़ ! आप चुप हो जाए ,आप को भी मौका मिलेगा. पहले 'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये प्लीज़ प्लीज़ ! नो नो इट इश नॉट फेयर .- अध्यक्ष जी ने कहा
" महोदय ! अगर मैं चुप हो आया तो मेरे क्षेत्र की जनता चुप हो जायेगी,देश गूंगा हो जाएगा .हो सकता है विश्वास मत गिर जाने के पश्चात पुन: चुनाव क्षेत्र में जाना पड़ जाए तो क्या मुंह दिखाऊंगा "
" मुंह नहीं ,मुखौटा दिखाना ...'-एक सदस्य ने चुटकी ली
निर्दलीय जी को न बैठाना था ,न बैठे .अपनी बात पर अडे रहे
"....तो क्या मुंह दिखाऊंगा .इस छींक में विरोधियों के साजिस की घिनौनी बू आ रही है ..." और झट से नाक पर एक रुमाल रखते हुए पुन: कहा --'...हमारे मित्र ने स्वयं नहीं छींका है उन से छींकवाया गया है कि विश्वास मत को अशुभ कर दें. इसमें किसी विदेशी शक्ति का भी हाथ हो सकता है .मैं नाम नहीं लेना चाहता परन्तु हम क्या ,आप क्या सारा सदन जानता है कि साथ वाली पार्टी में विदेशी शक्ति कौन है ..."
'प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप चुप हो जाइए ...नो..नो.. पहले आप...देखिये आप के इस अंश को सदन की कार्यवाही से निकाल दूंगा..."-अध्यक्ष जी अपनी व्यवस्था सुनाई
कमलधारी जी को इस से क्या अंतर पड़ता है की उनके बहस के इस अंश को सदन की कार्यवाही में रखा जा रहा है या निकाला जा रहा है .उन्हें कौन सा अपने क्षेत्र की जनता को पढवाना है .जनता ही कौन सी पढी लिखी है. जो पढ़े लिखे हैं वो चुनाव में वोट देने जाते नहीं . अत: उन्होंने व्यवस्था की परवाह किए बिना अपना वक्तव्य जारी रखा -"... हो सकता है इस में किसी स्वदेशी शक्ति का हाथ हो .इस छींक के पीछे धोती-कुर्ताधारी भाई जी का हाथ हो जो सदन में अभी-अभी खैनी-सुरती बना कर ठोंक रहे थे ..."
" छीकने पर पार्टी ने व्हिप जारी नहीं किया है "- सुरती-खैनी भाई साहब ने आपत्ति जतायी
कमलधारी जी चालू रहे "...यही वह साजिस है जो लोकतंत्र को खोखला बनाती है और यह छींके सदन की गरिमा गिराती हैं "
'प्लीज़ ! प्लीज़ !! आप चुप जाइए . अगर आप चुप नहीं होंगे तो मैं सदन स्थगित कर दूंगा '- अध्यक्ष जी ने कहा --' प्लीज़ देखिये मैं पैर पर खडा हूँ . स्पीकर इज ऑन लेग ."
" वह भी पैरों पर खडा है ...सिर्फ बेंच पर खडा होना बाकी है '- किसी ने चुटकी ली. लोग उचक-उचक कर यह देखने लगे कौन किस के पैर पर खडा है.
'क' जी आप चालू रहे '-अध्यक्ष जी ने कहा
'महोदय ! पहले आप उस कमलधारी के बच्चे को तो चुप कराइए"
"प्लीज़!आप जल्दी-जल्दी चालू रहिये जब आप बोलेंगे तो वह चुप हो जाएगा '
भारतीय लोकतंत्र इस तरह जल्दी जल्दी आगे बढ़ रहा था
'अ' जी ने अयाचित सुझाव दिया -' अरे! काहे का तंत मजाल किए हैं 'क' जी ! छोडिये न ' पुराणो में लिखा है -
एक नाक दो छींक
काम बने सब ठीक
तो मार दीजिये एक छींक आप भी"
अब 'क' जी का मुखारविंद अध्यक्ष महोदय जी की तरफ से हट कर 'अ' जी की तरफ हो गया .गोला उगलते तोप का मुंह घूम गया
'का बात करते है 'अ' जी ? इ तंत मजाल है?यह छींक का प्रश्न नहीं है. हम लोग तो रोजे खैनी-सुरती ठोंकते रहते हैं ...छींक मारते रहते हैं...आज सदन की गरिमा का प्रश्न है ...देश की सौ करोड़ जनता का प्रश्न है /"
अचानक सदन के एक छोर से १०-१५ सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और आपत्तियां उठाने लगे -'क' जी ने अमर्यादित व असंसदीय भाषा का प्रयोग किया है .यह सदन की अवमानना है .देश का अपमान किया है यह हमारे विशेषाधिकार का हनन हुआ है . कुत्ते के बच्चे हो सकते है , ,आदमी के बच्चे हो सकते है मगर कमलधारी के बच्चे नहीं हो सकते ...यह भारतमाता की अस्मिता का प्रश्न है .../भारत माता की जय ..वन्दे मातरम का नारा लगाते हुए सदन की 'वेळ' में आ गए
दूसरे छोर से कुछ तिरंगाधारी ---हाय हाय ! भगवाधारी हाय हाय ! के नारे लगाते हुए सदन के 'वेळ' में आ गए अध्यक्ष जी प्लीज़ प्लीज़ करते करते खड़े हो गए सदन के बाईं तरफ से लाल-झंडे वाले 'साम्प्रदायिक शक्तियां ! धर्म ढोंगियों हाय हाय ! ' के नारे लगाते सदन के 'वेळ' में आ गए.तीसरे कोने से " तिलक त्रिपुंडी हाय हाय ! तिलक तराजू हाय हाय !मनुवादी सब हाय हाय ! के नारे लगाते हुए हाथी छाप वाले भी 'वेल' में आ गए
इसी बीच ,कुछ हाथी छाप वालों ने एक जोरदार नारा उछाला -'तिलक तराजू और तलवार ,इनको मारो जूते चार'....'और सचमुच एक सदस्य ने अति-उत्साही नेता के आह्वान पर जूता चला दिया फिर क्या था ! दूसरे सज्जन ने अपना जूता खोला तो पूरे सदन में दुर्गन्ध फ़ैल गई लोगो ने तुंरत अपने-अपने रुमाल निकाल कर अपने-अपने नाक पर रख लिए .किसी एक सज्जन ने टेबुल से माइक उखाड़ कर प्रक्षेपास्त्र की तरह प्रहार किया .कोई लेज़र गाईडेड मिसाइल तो थी नहीं कि किसी विपक्षी दल के सदस्य कि ही लगती .अत: चूक वश अपने ही दल के सदस्य को जा लगी .वाकयुध्द शुरू हो गया .तुंरत हाईकमान से शिकायत की गई -'यह तो सरासर अनुशासनहीनता है ,निकालिए इसे पार्टी से बाहर .इसी ने मेरे चुनाव क्षेत्र में भीतरघात किया था अब सदन में प्रक्षेपास्त्र प्रहार कर रहा है .इसे निलंबित किया जाए ..." हाईकमान धृतराष्ट्र बने बैठे है .पीड़ित सदस्य को आश्वासन दे रहे हैं -'अभी निलंबन से विश्वासमत गिरने का खतरा है ' दो-चार सदस्य इन दोनों सदस्यों को मनाने-छुडाने में लग गए .
उधेर 'वेल' में धक्कम-धुक्का जारी है .कोई हस्त-प्रहार कर रहा है तो कोई पद प्रहार सब गडम गड .कौन क्या बोल है ? कुएँ में बहुत मेढक हो गए है टर-टर के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है संभवत: विश्वासमत पर जोरदार बहस चल रही है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य को पटकनी दे मारी और उनके सीने पर आसीन हो कर जिज्ञासा शांत कर रहे थे -"...कहता है हम बाहु-बली हैं ..बोल हम बाहुबली हैं?.
संभवत: पहले सदस्य पहलवान थे जो निर्वाचित हो कर सदन में आ गए थे "मैं नहीं मेरी पार्टी कहती है "- नीचे दबे व्यक्ति ने अपना हाथ छुडाते हुए कहा पास खड़े दो-चार सदस्य उत्साह वर्धन कर रहे थे "...उठिए नेता जी ! दीजिये दो -चार धोबिया पाट से ,सारी पहलवानी निकल जायेगी "
इस महायुद्ध से अलग ,दो गांधी टोपीधारी सदन के कोने में भयवश एक बेंच के नीचे छुपे पड़े आपस में कह रहे थे "...गांधी बाबा ने ठीक ही कहा था की इस पार्टी को आजादी के बाद भंग कर देना चाहिए > भईया मेरी पत्नी का टिकट काट दिया था हाईकमान ने . कह रहे थे की आप की पत्नी बूढी हो गई हैं. युवाओं को टिकट देना है . अब दो और युवाओं को टिकट .भुगतो अब नतीजे ....दूसरे गांधीवादी ने अपनी पीडा उड़ेली
उधर धक्कम-धुक्का जारी है .अध्यक्ष महोदय बीच-बीच में प्लीज़ प्लीज़ बोलते जा रहे है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य का कुर्ता फाड़ डाला तो छुपे हुए कई घोटाले प्रगट हो गए .एक ने तो दूसरे की धोती खोलने का प्रयास किया तो वह धोती छोड़ भाग कर अपनी सीट पर जा बैठे .एक महिला सदस्य ने तो पास खड़े एक सदस्य को दांतों से काट लिया .कहते है महिला अपने क्षेत्र की 'विष-कन्या " थी .संयोग अच्छा था कि ज़हर चढा नहीं क्यों की दाँत नकली थे
वैसे इस 'वेल-युद्घ' को तृतीय महायुद्ध तो नहीं कहा जा सकता परन्तु मित्र व अमित्र दल अपने-अपने सदस्यों के साथ नारे लगाते सदन के 'वेल' में आते जा रहे थे . कोई नारा लगा रहा था ' हिंदी वाले हाय ! हाय !' तो तड़ से प्रत्युत्तर में ' उर्दू वाले हाय ! हाय ! ' नारा लगाने लगे
" अरे यार !हिंदी के विरोध में 'तमिल-कन्नड़ ' चलता है उर्दू नहीं. उर्दू तो तब चलेगा जब धर्म का मसला उठेगा.सहयोगियों ने संशोधन प्रस्तावित किया
विश्वासमत पर बहस जारी है .स्पीकर महोदय प्लीज़ प्लीज़ कर रहे है लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है जो शरीर से समृद्ध है वो बहस को समृद्ध कर रहे हैं विचारों व तर्क से जो पटकनी नहीं दे पा रहे हैं वो शरीर से पटकनी दे रहे हैं .सदस्यों के कुर्ते फाड़े जा रहे हैं परन्तु लोकतंत्र तार-तार नहीं हो रहा है.टोपिया उछाली जा रही है परन्तु भारत का लोकतंत्र आज भी विश्व में शीर्ष पर है .यही भारत की अनेकता में एकता है.धमा-चौकडी ,शोर-शराबा ,मार-पीट में सभी एक हो जाते है चाहे वह किसी दल,धर्म क्षेत्र,जाति,रंग,के हों.सभी लोग संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकारों का मुक्त कंठ ,मुक्त हस्त ,मुक्त पद,से गाली-वाचन,हस्त-प्रहार व पद-प्रहार कर अपनी पौरुषता व कुरता फाड़ दक्षता का प्रदर्शन कर रहे हैं.समान अवसर प्राप्त है सबको.जनता टी० वी० पर दृश्य देख मगन है .सदन के 'वेल' में जाते हुए नेताओं को यह एहसास नहीं कि सदन के बाहर कि जनता 'वेल(कुँआ) ' में जा रही है
सदन कि दशा व दिशा देख ,अध्यक्ष महोदय ने घबरा कर सभा मध्याह्न काल तक स्थगित कर दी.
०० ००० ००००
भोजनोपरांत सदन कि कार्यवाही पुन: प्रारंभ हुई .सदस्यगण अपने-अपनी सीट ग्रहण कर चुके हैं
" ख' जी आप अपना पक्ष प्रस्तुत करे"-
'ख' जी एक महिला सदस्य थी .सुन्दर थी.जब से राजनीती में अभिनेत्रियों का आना शुरू हो गया है सदन में सौन्दर्य वृद्धि हो गई है जब ये सदस्याएं उठती है तो पूरा सदन बड़े ध्यान से सुनने के बजाय देखने में मगन हो जाता है.जैसे ही उक्त महिला ने अपना वक्तव्य पढ़ना शुरू किया -"...मैं आप का ध्यान अपने पक्ष के दो बिन्दुओं पर आकर्षित करना चाहूंगी..." कि अचानक सदन में हंसी कि लहर दौड़ गई .अब पूरे सदन का ध्यान उनके दो बिदुओं कि तरफ आकर्षित हो गया .स्थिति स्पष्ट होते ही उन्होंने अपना पल्लू खीच लिया और कहा ...'मेरा मंतव्य था...कि ..."
तभी अचानक 'क' जी उठ खड़े हुए और कहने लगे -'अध्यक्ष महोदय ! अभी मेरा भाषण पूरा नहीं हुआ है."
"नहीं,नहीं, आप बैठिये आप का समय पूरा हो गया .आप को पूरा मौका दिया गया "
"यह तो मौलिक अधिकार का हनन है ,लोकतंत्र कि ह्त्या है"
"प्लीज़ आप चुप रहे हाँ 'ख' जी आप चालू रहे "
तभी अचानक सदन में कई सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और समवेत स्वर में बोलना शुरू किए "...महोदय ! अभी छींक पर सदन का फलित विचार शेष है ..."
"प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप सब बैठे "
वाही हंगामा पुन: शुरू हो गया
०० ००० ०००
लगता है हमारा लोकतंत्र अभी 'क' 'ख' 'ग' से आगे नहीं बढ़ सका ।
-आनंद
अध्यक्ष जी ने ,सदन की कार्यवाई शुरू करते हुए चर्चा में भाग लेने हेतु 'क' जी का नाम पुकारा 'क' महोदय जैसे ही अपना पक्ष रखना शुरू किया -'माननीय अध्यक्ष जी ! इस सदन के माध्यम से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान सरकार ..... तभी अचानक किसी ने बिना नाक पर रुमाल रखे एक जोरदार छींक मारी कि सारा सदन गूंज गया .सभी लोग उनकी ओर देखने लगे ज्ञात हुआ कि वह किसी विपक्षी दल के सदस्य थे
विश्वासमत पर बहस के प्रारम्भ में ही यह छींक ! किसी अनागत अनिष्ट कि आशंका से सत्तापक्ष चिंतित हो गया प्रथम ग्रासे मच्छिका पात: नहीं छींक पात: यह छींक शुभ नहीं है प्रस्ताव गिर सकता है .सरकार गिर सकती है सतापक्ष मैं बेचैनी बढ़ने लगी तभी अचानक सत्तापक्ष के एक त्रिशूलधारी सदस्य खड़े हो गए
'अध्यक्ष जी ! अभी-अभी विपक्ष के किसी मित्र ने इस भरे सदन में एक छींक मारी है जो उचित नहीं है .यह छींक किसी आने वाले अनिष्ट का संकेत मात्र है ...शास्त्रों में लिखा है ...
" सम्मुख छींक लड़ाई भाखे
छींक दाहिने द्रव्य विनाशे
"पहले आप बैठिये ! प्लीज़! "-अध्यक्ष महोदय ने आग्रह किया
" महोदय ! खेद है मैं यहाँ बैठने हेतु नहीं आया हूँ मैं अपने चुनाव क्षेत्र से खडा हो कर आया हूँ .क्षेत्र की समस्याओं को खडा करने आया हूँ .देश की ....'
"प्लीज़ आप चुप रहिये 'क' जी को अपनी बात कहने दीजिये .आप का जब क्रम आएगा तो अपनी बात कहियेगा '
" अध्यक्ष जी ! छींक तो उस ने अभी मारी है .जब अनिष्ट हो ही जाएगा ,विशवास मत गिर ही जाएगा तो कहने को क्या रह जाएगा !?
"नहीं ,नहीं, प्लीज़ उस से पहले आप को मौका दिया जाएगा."
" अभी आप बैठे ,प्लीज़ आप चुप रहे सदस्य 'क' को बोलने दें...'क' जी आप चालू रहे .'- अध्यक्ष जी ने अपनी व्यवस्था दी.
'क' जी ने गतांश से आगे कहना शुरू किया -."हाँ तो मैं कह रहा था कि....."
अचानक तीन-चार भगवाधारी सदस्य एक साथ खड़े हो समवेत स्वर में कहना शुरू किया ---"सर!यह छींक भारतीय संस्कृति से जुडा प्रश्न है..विशेषत: हिन्दू संस्कृति से. महोदय यह एक गंभीर प्रश्न है...
ऊँची छींक कहे जयकारी
नीची छींक होय भयकारी
" प्लीज़ !आप तीनो ,नहीं चारो बैठ जाए "क' जी को बात कहने दें.
" महोदय अगर हम बैठ गए तो हिन्दू-संस्कृति बैठ जायेगी ,करोडों हिन्दुओं का विश्वास बैठ जाएगा धर्म बैठ जाएगा . विश्वासमत पर छींक शुभ नहीं है."
" अध्यक्ष जी ,यह धरम-करम की बातें कर रहे हैं' -कई तिरंगाधारी के साथ खड़े हो गए.
"छींक विपक्ष के सदस्य ने मारी है "
"छींक 'क' जी के पृष्ठ भाग से मारी है इसका फलाफल प्रभाव कम होता है"-एक सदस्य ने चुटकी ली
'तो क्या ! मारी तो अध्यक्ष जी के सम्मुख ही न ! इसका प्रभाव अनिष्ट होता है '- किसी दूसरे सदस्य ने चुटकी ली.
'यह भारतीय संस्कृति की अस्मिता का प्रश्न है -कमंडलधारियों ने कहा
"यह सरासर 'कम्युनलिज्म' है '--लाल झंडा वालों ने कहा
'यह दलित सदस्य का अपमान है '- नीला झंडा धारियों ने कहा -" यह साजिश है षडयंत्र है '
'यह व्यवस्था का प्रश्न है '-एक खैनी-सुरती ठोकने वाले ने कहा
'प्लीज़ प्लीज़ आप लोग शांत हो जाए '-अंत में अध्यक्ष जी ने कहा -प्लीज़ आप बैठ जाए.'क' जी को अपनी बात कहने दें .हाँ 'क' जी आप चालू रहें '
विश्वास मत पर गंभीर बहस चल रही थी क्यों की स्थिति उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही थी.लोकतंत्र समृद्ध हो रहा था क्यों कि लोग चीखने -चिलाने कि कला में समृद्ध हो रहे थे.सदन में सरकार के भाग्य का फैसला होना है लोग देश कि अस्मिता पर बहस कर रहे थे,छींक पर बहस कर रहे थे .सच भी है .आदमी रहेगा तो छींक रहेगी ,छींक रहेगी तो संस्कृति का प्रश्न उठेगा.भारत कि अस्मिता का प्रश्न उठेगा.फिर देश रहेगा तो सरकार रहेगी.सरकार का क्या है ! आनी-जानी है.परन्तु नासिका-रंध्र से निकली छींक वापस नहीं जानी है.अत: विचार और बहस इस मुई छींक पर ही होनी चाहिए.
अध्यक्ष जी के आदेशानुसार 'क' महोदय ने अपना वक्तव्य गतांश से आगे पढ़ना शुरू किया -' धन्यवाद अध्यक्ष जी ! हाँ तो मैं कह रहा था कि जब से यह वर्तमान सरकार ...."
'महोदय यह व्यवस्था का प्रश्न है '- त्रिशूलधारी जे ने ,जो अबतक खड़े थे,गोला दागा -विश्वास मत पर बहस से पहले छींके गए अशुभ छींक जैसे गंभीर विषय पर बहस होनी चाहिए '
'अरे! आप अभी तक बैठे नहीं?प्लीज़ पहले आप बैठ जायें. '-अध्यक्ष जी ने कहा -'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये /हाँ तो 'क' जी आप चालू रहें...
लोकतंत्र की आधी उर्जा सदस्यों को मनाने में लग जाती है और आधी उर्जा रूठे सदस्यों को चुप कराने में लग जाती है.सरकारी कार्य निष्पादन हेतु उर्जा बचती ही नहीं अत; सारे विकास कार्य बिना उर्जा के ही चलता है .यही भारतीय लोकतंत्र का 'आठवां' आर्श्चय है .
'क' जी ने कहना शुरू किया -'हाँ तो मैं कह रहा था कि यह सरकार .......
सदन के एक कोने से एक निर्दलीय जी अचानक उठ खड़े हुए और कहने लगे '....महोदय! विपक्षी पार्टियों की यह छींक कोई साधारण छींक नहीं है यह राजनैतिक छींक है एक सोची-समझी रणनीति के तहत छींक है यह एक साजिस है एक षडयंत्र है ...'
'प्लीज़ ! आप चुप हो जाए ,आप को भी मौका मिलेगा. पहले 'क' जी को अपनी बात कह लेने दीजिये प्लीज़ प्लीज़ ! नो नो इट इश नॉट फेयर .- अध्यक्ष जी ने कहा
" महोदय ! अगर मैं चुप हो आया तो मेरे क्षेत्र की जनता चुप हो जायेगी,देश गूंगा हो जाएगा .हो सकता है विश्वास मत गिर जाने के पश्चात पुन: चुनाव क्षेत्र में जाना पड़ जाए तो क्या मुंह दिखाऊंगा "
" मुंह नहीं ,मुखौटा दिखाना ...'-एक सदस्य ने चुटकी ली
निर्दलीय जी को न बैठाना था ,न बैठे .अपनी बात पर अडे रहे
"....तो क्या मुंह दिखाऊंगा .इस छींक में विरोधियों के साजिस की घिनौनी बू आ रही है ..." और झट से नाक पर एक रुमाल रखते हुए पुन: कहा --'...हमारे मित्र ने स्वयं नहीं छींका है उन से छींकवाया गया है कि विश्वास मत को अशुभ कर दें. इसमें किसी विदेशी शक्ति का भी हाथ हो सकता है .मैं नाम नहीं लेना चाहता परन्तु हम क्या ,आप क्या सारा सदन जानता है कि साथ वाली पार्टी में विदेशी शक्ति कौन है ..."
'प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप चुप हो जाइए ...नो..नो.. पहले आप...देखिये आप के इस अंश को सदन की कार्यवाही से निकाल दूंगा..."-अध्यक्ष जी अपनी व्यवस्था सुनाई
कमलधारी जी को इस से क्या अंतर पड़ता है की उनके बहस के इस अंश को सदन की कार्यवाही में रखा जा रहा है या निकाला जा रहा है .उन्हें कौन सा अपने क्षेत्र की जनता को पढवाना है .जनता ही कौन सी पढी लिखी है. जो पढ़े लिखे हैं वो चुनाव में वोट देने जाते नहीं . अत: उन्होंने व्यवस्था की परवाह किए बिना अपना वक्तव्य जारी रखा -"... हो सकता है इस में किसी स्वदेशी शक्ति का हाथ हो .इस छींक के पीछे धोती-कुर्ताधारी भाई जी का हाथ हो जो सदन में अभी-अभी खैनी-सुरती बना कर ठोंक रहे थे ..."
" छीकने पर पार्टी ने व्हिप जारी नहीं किया है "- सुरती-खैनी भाई साहब ने आपत्ति जतायी
कमलधारी जी चालू रहे "...यही वह साजिस है जो लोकतंत्र को खोखला बनाती है और यह छींके सदन की गरिमा गिराती हैं "
'प्लीज़ ! प्लीज़ !! आप चुप जाइए . अगर आप चुप नहीं होंगे तो मैं सदन स्थगित कर दूंगा '- अध्यक्ष जी ने कहा --' प्लीज़ देखिये मैं पैर पर खडा हूँ . स्पीकर इज ऑन लेग ."
" वह भी पैरों पर खडा है ...सिर्फ बेंच पर खडा होना बाकी है '- किसी ने चुटकी ली. लोग उचक-उचक कर यह देखने लगे कौन किस के पैर पर खडा है.
'क' जी आप चालू रहे '-अध्यक्ष जी ने कहा
'महोदय ! पहले आप उस कमलधारी के बच्चे को तो चुप कराइए"
"प्लीज़!आप जल्दी-जल्दी चालू रहिये जब आप बोलेंगे तो वह चुप हो जाएगा '
भारतीय लोकतंत्र इस तरह जल्दी जल्दी आगे बढ़ रहा था
'अ' जी ने अयाचित सुझाव दिया -' अरे! काहे का तंत मजाल किए हैं 'क' जी ! छोडिये न ' पुराणो में लिखा है -
एक नाक दो छींक
काम बने सब ठीक
तो मार दीजिये एक छींक आप भी"
अब 'क' जी का मुखारविंद अध्यक्ष महोदय जी की तरफ से हट कर 'अ' जी की तरफ हो गया .गोला उगलते तोप का मुंह घूम गया
'का बात करते है 'अ' जी ? इ तंत मजाल है?यह छींक का प्रश्न नहीं है. हम लोग तो रोजे खैनी-सुरती ठोंकते रहते हैं ...छींक मारते रहते हैं...आज सदन की गरिमा का प्रश्न है ...देश की सौ करोड़ जनता का प्रश्न है /"
अचानक सदन के एक छोर से १०-१५ सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और आपत्तियां उठाने लगे -'क' जी ने अमर्यादित व असंसदीय भाषा का प्रयोग किया है .यह सदन की अवमानना है .देश का अपमान किया है यह हमारे विशेषाधिकार का हनन हुआ है . कुत्ते के बच्चे हो सकते है , ,आदमी के बच्चे हो सकते है मगर कमलधारी के बच्चे नहीं हो सकते ...यह भारतमाता की अस्मिता का प्रश्न है .../भारत माता की जय ..वन्दे मातरम का नारा लगाते हुए सदन की 'वेळ' में आ गए
दूसरे छोर से कुछ तिरंगाधारी ---हाय हाय ! भगवाधारी हाय हाय ! के नारे लगाते हुए सदन के 'वेळ' में आ गए अध्यक्ष जी प्लीज़ प्लीज़ करते करते खड़े हो गए सदन के बाईं तरफ से लाल-झंडे वाले 'साम्प्रदायिक शक्तियां ! धर्म ढोंगियों हाय हाय ! ' के नारे लगाते सदन के 'वेळ' में आ गए.तीसरे कोने से " तिलक त्रिपुंडी हाय हाय ! तिलक तराजू हाय हाय !मनुवादी सब हाय हाय ! के नारे लगाते हुए हाथी छाप वाले भी 'वेल' में आ गए
इसी बीच ,कुछ हाथी छाप वालों ने एक जोरदार नारा उछाला -'तिलक तराजू और तलवार ,इनको मारो जूते चार'....'और सचमुच एक सदस्य ने अति-उत्साही नेता के आह्वान पर जूता चला दिया फिर क्या था ! दूसरे सज्जन ने अपना जूता खोला तो पूरे सदन में दुर्गन्ध फ़ैल गई लोगो ने तुंरत अपने-अपने रुमाल निकाल कर अपने-अपने नाक पर रख लिए .किसी एक सज्जन ने टेबुल से माइक उखाड़ कर प्रक्षेपास्त्र की तरह प्रहार किया .कोई लेज़र गाईडेड मिसाइल तो थी नहीं कि किसी विपक्षी दल के सदस्य कि ही लगती .अत: चूक वश अपने ही दल के सदस्य को जा लगी .वाकयुध्द शुरू हो गया .तुंरत हाईकमान से शिकायत की गई -'यह तो सरासर अनुशासनहीनता है ,निकालिए इसे पार्टी से बाहर .इसी ने मेरे चुनाव क्षेत्र में भीतरघात किया था अब सदन में प्रक्षेपास्त्र प्रहार कर रहा है .इसे निलंबित किया जाए ..." हाईकमान धृतराष्ट्र बने बैठे है .पीड़ित सदस्य को आश्वासन दे रहे हैं -'अभी निलंबन से विश्वासमत गिरने का खतरा है ' दो-चार सदस्य इन दोनों सदस्यों को मनाने-छुडाने में लग गए .
उधेर 'वेल' में धक्कम-धुक्का जारी है .कोई हस्त-प्रहार कर रहा है तो कोई पद प्रहार सब गडम गड .कौन क्या बोल है ? कुएँ में बहुत मेढक हो गए है टर-टर के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है संभवत: विश्वासमत पर जोरदार बहस चल रही है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य को पटकनी दे मारी और उनके सीने पर आसीन हो कर जिज्ञासा शांत कर रहे थे -"...कहता है हम बाहु-बली हैं ..बोल हम बाहुबली हैं?.
संभवत: पहले सदस्य पहलवान थे जो निर्वाचित हो कर सदन में आ गए थे "मैं नहीं मेरी पार्टी कहती है "- नीचे दबे व्यक्ति ने अपना हाथ छुडाते हुए कहा पास खड़े दो-चार सदस्य उत्साह वर्धन कर रहे थे "...उठिए नेता जी ! दीजिये दो -चार धोबिया पाट से ,सारी पहलवानी निकल जायेगी "
इस महायुद्ध से अलग ,दो गांधी टोपीधारी सदन के कोने में भयवश एक बेंच के नीचे छुपे पड़े आपस में कह रहे थे "...गांधी बाबा ने ठीक ही कहा था की इस पार्टी को आजादी के बाद भंग कर देना चाहिए > भईया मेरी पत्नी का टिकट काट दिया था हाईकमान ने . कह रहे थे की आप की पत्नी बूढी हो गई हैं. युवाओं को टिकट देना है . अब दो और युवाओं को टिकट .भुगतो अब नतीजे ....दूसरे गांधीवादी ने अपनी पीडा उड़ेली
उधर धक्कम-धुक्का जारी है .अध्यक्ष महोदय बीच-बीच में प्लीज़ प्लीज़ बोलते जा रहे है .एक सदस्य ने दूसरे सदस्य का कुर्ता फाड़ डाला तो छुपे हुए कई घोटाले प्रगट हो गए .एक ने तो दूसरे की धोती खोलने का प्रयास किया तो वह धोती छोड़ भाग कर अपनी सीट पर जा बैठे .एक महिला सदस्य ने तो पास खड़े एक सदस्य को दांतों से काट लिया .कहते है महिला अपने क्षेत्र की 'विष-कन्या " थी .संयोग अच्छा था कि ज़हर चढा नहीं क्यों की दाँत नकली थे
वैसे इस 'वेल-युद्घ' को तृतीय महायुद्ध तो नहीं कहा जा सकता परन्तु मित्र व अमित्र दल अपने-अपने सदस्यों के साथ नारे लगाते सदन के 'वेल' में आते जा रहे थे . कोई नारा लगा रहा था ' हिंदी वाले हाय ! हाय !' तो तड़ से प्रत्युत्तर में ' उर्दू वाले हाय ! हाय ! ' नारा लगाने लगे
" अरे यार !हिंदी के विरोध में 'तमिल-कन्नड़ ' चलता है उर्दू नहीं. उर्दू तो तब चलेगा जब धर्म का मसला उठेगा.सहयोगियों ने संशोधन प्रस्तावित किया
विश्वासमत पर बहस जारी है .स्पीकर महोदय प्लीज़ प्लीज़ कर रहे है लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है जो शरीर से समृद्ध है वो बहस को समृद्ध कर रहे हैं विचारों व तर्क से जो पटकनी नहीं दे पा रहे हैं वो शरीर से पटकनी दे रहे हैं .सदस्यों के कुर्ते फाड़े जा रहे हैं परन्तु लोकतंत्र तार-तार नहीं हो रहा है.टोपिया उछाली जा रही है परन्तु भारत का लोकतंत्र आज भी विश्व में शीर्ष पर है .यही भारत की अनेकता में एकता है.धमा-चौकडी ,शोर-शराबा ,मार-पीट में सभी एक हो जाते है चाहे वह किसी दल,धर्म क्षेत्र,जाति,रंग,के हों.सभी लोग संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकारों का मुक्त कंठ ,मुक्त हस्त ,मुक्त पद,से गाली-वाचन,हस्त-प्रहार व पद-प्रहार कर अपनी पौरुषता व कुरता फाड़ दक्षता का प्रदर्शन कर रहे हैं.समान अवसर प्राप्त है सबको.जनता टी० वी० पर दृश्य देख मगन है .सदन के 'वेल' में जाते हुए नेताओं को यह एहसास नहीं कि सदन के बाहर कि जनता 'वेल(कुँआ) ' में जा रही है
सदन कि दशा व दिशा देख ,अध्यक्ष महोदय ने घबरा कर सभा मध्याह्न काल तक स्थगित कर दी.
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भोजनोपरांत सदन कि कार्यवाही पुन: प्रारंभ हुई .सदस्यगण अपने-अपनी सीट ग्रहण कर चुके हैं
" ख' जी आप अपना पक्ष प्रस्तुत करे"-
'ख' जी एक महिला सदस्य थी .सुन्दर थी.जब से राजनीती में अभिनेत्रियों का आना शुरू हो गया है सदन में सौन्दर्य वृद्धि हो गई है जब ये सदस्याएं उठती है तो पूरा सदन बड़े ध्यान से सुनने के बजाय देखने में मगन हो जाता है.जैसे ही उक्त महिला ने अपना वक्तव्य पढ़ना शुरू किया -"...मैं आप का ध्यान अपने पक्ष के दो बिन्दुओं पर आकर्षित करना चाहूंगी..." कि अचानक सदन में हंसी कि लहर दौड़ गई .अब पूरे सदन का ध्यान उनके दो बिदुओं कि तरफ आकर्षित हो गया .स्थिति स्पष्ट होते ही उन्होंने अपना पल्लू खीच लिया और कहा ...'मेरा मंतव्य था...कि ..."
तभी अचानक 'क' जी उठ खड़े हुए और कहने लगे -'अध्यक्ष महोदय ! अभी मेरा भाषण पूरा नहीं हुआ है."
"नहीं,नहीं, आप बैठिये आप का समय पूरा हो गया .आप को पूरा मौका दिया गया "
"यह तो मौलिक अधिकार का हनन है ,लोकतंत्र कि ह्त्या है"
"प्लीज़ आप चुप रहे हाँ 'ख' जी आप चालू रहे "
तभी अचानक सदन में कई सदस्य एक साथ उठ खड़े हुए और समवेत स्वर में बोलना शुरू किए "...महोदय ! अभी छींक पर सदन का फलित विचार शेष है ..."
"प्लीज़ ! प्लीज़ ! आप सब बैठे "
वाही हंगामा पुन: शुरू हो गया
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लगता है हमारा लोकतंत्र अभी 'क' 'ख' 'ग' से आगे नहीं बढ़ सका ।
-आनंद
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