रविवार, 4 अक्टूबर 2009

व्यंग्य 014-V: अनावरण एक(गांधी) मूर्ति का...


व्यंग्य 014-V : अनावरण एक मूर्ति का


नेता जी ने अपनी गांधी-टोपी सीधी की।रह रह कर टेढी़ हो जाया करती है। विशेषत: जब वह सत्ता सुख से वंचित रहते हैं।धकियाये जाने के बाद टेढी़ ,मैली-कुचैली हो जाती है।समय-समय पर सीधी रखना एक बाध्यता हो जाती है उनकी ,अन्यथा विरोधी दल ’टोपी-कोण" पर ही हंगामा शुरू कर सकते हैं। विपक्ष के पास वैसे भी मौलिक मुद्दों की कमी बनी रहती है।व्यर्थ में प्रचार करना शुरू कर देंगे-’देखा!,कहते थी न ,नेता जी की टोपी टेढ़ी न हो जाए तो कहना’।इसी अप्रत्यक्ष भय से आक्रान्त ,नेता जी ने अपनी टोपी सीधी की तथा मनोगत गांधी जी को कोसा भी-’ अपने तो पहनते नहीं थे हमें पहना गये।पहनते तो मालूम होता कि आज की राजनीति में टोपी सीधी रखना कितना दुष्कर व कष्ट साध्य कार्य  है। करते रहो आजीवन सीधी।अरे! जो पहनते नहीं वो तो ’कैबिनेट ’ में घुसे पड़े हैं और हम हैं कि अपनी टोपी सीधी सीधी करते-करते सड़क पर आ गए।’

यही दर्द ,यही टीस लिए मंच पर बैठे हुए नेता जी भाषण हेतु उठे। माइक के सामने आए।ठक-ठक कर टेस्ट किया ।आवाज़ बरोबर निकलेगी तो ? धोखा तो नही देगी? आश्वस्त हुए।तत्पश्चात उपस्थित जन समुदाय का अवलोकन किया,किसी अनुभवी बूचड़ की तरह-’काश ! यह समस्त भीड़ मेरी बूचड़्खाने में आ जाती और ’वोट’ में बदल जाती! इसी कल्पना मात्र से उनका मन आत्मविभोर हो गया ,नयनों में एक विशेष चमक उभर आई। परन्तु अविलम्ब नेता जी ने गम्भीरता का आवरण ओढ़ लिया कि कहीं इस मनोगत हर्ष को लोग ’टुच्चापन’ न समझ लें।लोकतन्त्र है,समझ सकते हैं। फिर एक दॄष्टिपात उस मूर्ति पर किया जिसका उन्होने अभी-अभी अनावरण किया था, फ़ीता काटा था और फोटो खिंचवाया था।ऐसे अवसरों की तसवीर काफी मान्यता रखती है ,सनद रहती है ,वक्त ज़रूरत काम आती है।चुनाव टिकट वितरण में,छीना-झपटी में संभवत: दिखाना पड़ जाए -कितने फ़ीते काटे, विरोधी के कितने वोट काटे?
फिर मंच पर बिछी ज़ाज़िम को देखा। वर्षों से नेताओं का भार ढोते-ढोते जीर्ण-शीर्ण व गन्दी हो चली है।इसको बदलने की आवश्यकता को कोई महसूस नहीं करता । वो लोग भी नहीं ,जिन्होने इसे जीर्ण-शीर्ण-विदीर्ण बनाया है। शून्य आँखों से ऊपर शामियाने को देखा।कहाँ-कहाँ से क्षेत्रीय टुकड़े लाकर जोड़ दिया है जुम्मन मियां ने -किसी मिली-जुली साझा सरकार की तरह।कितने छिद्र हो गए हैं यत्र-तत्र।साझा सरकार यानी शामियाने को यह भ्रम है कि टंगा है जनता के सर पर रक्षा के लिए।यदि लोकतन्त्र के अन्य स्तंभ न होते न्यायपालिका के ,कार्यपालिका के या हमारे जैसे ज़मीन में धँसे कर्मठ कार्यकर्ताओं के,तो क्या यह शामियाना टंगा रह सकता था?इसी मनन-चिन्तन में डूबे नेताजी ने अपना दायाँ पैर आगे बढा़ ,बायाँ पैर पीछे खींच ,हाथ पीछे बाँध,गला खँखारा फिर प्रस्फुटित हुए...
" देवियों और सज्जनों !भाइयों और बहनों !
-आज बड़े ही हर्ष का विषय है कि आप के साथमिल-बैठ कर, आमने-सामने, दो-चार बात करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।आप लोगो ने यहाँ पधारने का जो कष्ट किया है उससे गांधी जी की मूर्ति ,मेरा अभिप्राय है कि यह समारोह कृतज्ञ हुआ ।हमने आप की समस्यायें सुनी ,अब आप  हमारी सुने।यही सौहार्द  है ,यही परस्पर प्रेम है ,यही भाई चारा है।"
नेता जी एक पल चुप होते हैं।चिन्तन की मुद्रा अपनाते है। आँखे बन्द करते है। अभी प्रथम गियर में चल रहे हैं,लोहा गरमा रहा है ।
".....अभी हमने जिन महापुरुष की मूर्ति का अनावरण किया है,संभवत: उनसे आप सभी लोग परिचित होंगे।जो पुरानी पीढ़ी के है उन्होने गांधी जी का नाम अवश्य सुना होगा। जो नई पीढी़ के हैं उनकी सुविधा हेतु नाम नीचे लिखवा दिया है जिससे हमारे नौजवान भाईयों को मूर्ति पहचानने में कोई असुविधा न हो।इधर हमारी युवा-पीढी़ में एक नई प्रतिभा पनप रही है -मूर्ति-भंजन विधा की,कोलतार लेपन कला की। इसमे उनका दोष नहीं है। दोष है तो विरोधी पार्टी का। नाम नहीं लूंगा । हमारी युवा-पीढी को भटका रही है ,गुमराह कर रही है। उसमे एक दिशा-बोध की कमी पैदा कर रही है।इस कोलतार-लेपन कला में,विदेशी विशेषत: पड़ोसी देश की छिन्न-भिन्नात्मक शक्तियों का हाथ है इसीलिए मूर्ति के नीचे नाम लिखवा दिया है कि युवा पीढ़ी आगे आए ,पढ़े व गांधी जी के नाम से परिचित हो । कहीं ऐसा न हो कि कोलतार-लेपन या मूर्ति-भन्जनोपरान्त आप सुबह-सुबह ग्लानी से भर उठें -हाय! हमने तो जाना ही नहीं कि यह किस महान आत्मा की मूर्ति थी! ... तो भाईयो और बहनो !मै इस तहसील के नुक्कड़ से ,देश की समस्त युवा पीढी़ का आह्वान करता हूँ कि अब वक्त आ गया है गांधी जी की मूर्ति पहचानने का ,नाम पढने का ......"
तालियां बजने लगी। नारे लगने लगे -नेता भईया ज़िन्दाबाद ! ज़िन्दाबाद!..लोहा गरम होने लगा ,गाड़ी गियर पकड़ रही है।
" ....आप को ज्ञात है ,इस सभा में अन्य दलों के कुछ कार्यकर्ता भाई लोग भी सम्मिलित हैं। मैं नाम लेना उचित नहीं समझता ....परन्तु यह सर्व विदित है ,,,’छमिया रेप-काण्ड में कौन-कौन लोग शामिल थे ? नथुआ-हत्या काण्ड किसने कराया? नथुआ अरे! वही जो दलित था,शोषित था ।अब बचने के लिए पार्टी का सहारा लेते हैं ।...हमने स्पष्ट कर दिया है ,नहीं भाई ,नहीं । पार्टी ऐसे छिछोरे ,छोटी-मोटी हरकतों के लिए नहीं होती  किसी को बचाने के लिए नहीं होती---देश में इससे भी बड़े-बड़े काम है जिस पर पार्टी को  अभी काम करना है मसलन चारा घोटाला.चीनी घोटाला.नरेगा घोटाला .हवाला..नारी पर अत्याचार..गाँव की बहू-बेटियों पर अत्याचार
,हमारे घर-परिवार के सदस्यों, भाई-भतीजों पर अत्याचार। हमें बर्दाश्त नहीं करना है । हमें इस तहसील के नोनी माटी की कसम ,गांधी जी के डण्डे की सौगन्ध ,इन फासिस्टवादी शक्तियों को बेनकाब करना है....."
"...बोलिए भारतमाता की जय!.." -भीड़ ने जयघोष किया ।तालियां बजने लगी। भीड़ में जोश क संचार होने लगा।आयोजको में उत्साह-वर्धन होने लगा,लोहा गर्म होने लगा,गाड़ी गियर पकड़ने लगी। नेता जी एक क्षण चुप हो ,तालियों की संख्या गिनने लगे।
".....हाँ ,तो मै क्या कह रहा था? हाँ ,तो फासिस्टवादी शक्तियों को बेनकाब करना है । मैं अपने किसान भाईयो को, श्रमिक भाईयों को यह बता दूँ इन शक्तियों का मूल इस गाँव में नहीं , जड़ इस तहसील में नहीं,हमारे-आप के अन्दर नहीं ,इनका मूल है दिल्ली में ,हमें दिल्ली जाना होगा मूलोच्छेदन करने।आशा है आगामी आम चुनाव में हमारा आप अवश्य ख्याल रखेंगे. और मुझे दिल्ली भेजेंगे...."
भीड़ ने पुन: जयघोष किया-’नेता भईया -ज़िन्दाबाद,ज़िन्दाबाद।जबतक सूरज चाँद रहेगा-नेता जी का नाम रहेगा। भाई साहब संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं...देश क नेता कैसा हो.....? जैसे नपुंसक नारों से शामियाना गूँज उठा। नेता चाहे जैसा हो,पार्टी चाहे जिसकी हो,आयोजन चाहे जो हो-ऐसे ही शक्ति-शून्य  घिए पिटे नारे लगते हैं। तालियां बजती है...कोलाहल बढ़ता है..लोकतन्त्र आगे बढता है।
"....भाईयों शान्त रहें,शान्त रहें!अपना अपना आसन ग्रहण कर लीजिए । अरे हरहुआ ! बैठता काहे नहीं रे ? हाँ तो अब मूल विषय पर आता हूँ इन महापुरुष के संबंध में जिनका अभी-अभी हमलोगो ने अनावरण किया है-इसका समस्त श्रेय गजाधर बाबू को जाता है जो इस क्षेत्र के एक सक्रिय व कर्मठ कार्यकर्ता समाजसेवी हैं ,सौभाग्यवश आज हमारे बीच उपस्थित भी हैं।मेरे बाद आप इनके भी विचार सुनेगे और लाभान्वित होंगे।इस क्षेत्र की जनता के लिए गांधी जी की एक मूर्ति की आवश्यकता बहुत वर्षों से महसूस की जा रही थी जो गजाधर बाबू के अनवरत प्रयास व सतत संघर्ष से चालीस साल बाद संभव हुआ। इस पुण्य कार्य हेतु गजाधर बाबू धन्यवाद के पात्र ही नहीं,महापात्र हैं।
"...अब इस क्षेत्र के नौजवानों भाईयो को,श्रमिको को ,किसानो को,बच्चो को ,महिलाओं को,सुहागिनों को,विधवाओं को,लूलों को,लंगडो़ को २-अक्तूबर के दिन ट्रैक्टरों मे लद-लद कर शहर नहीं जाना पड़ेगा ।यहीं पर श्रद्धा सुमन चढ़ा देंगे।अपना चर्खा यहीं धो-पोछ कर लायेंगे और गांधी जी के श्री चरणों में बैठ कर रामधुन गायेंगे,सूता कातेंगे और फोटू खिंचवा लेंगे। अन्यथा दो घन्टे के काम के लिए दिन भर लग जाता था।आप के सालो साल का आवन-जावन का कष्ट नहीं देखा जा सका गजाधर बाबू से ,सो एक अदद मूर्ति यहीं स्थापित करवा दी।"
पुन: जयघोष हुआ -गजाधर बाबू ज़िन्दाबाद..ज़िन्दाबाद...जब तक सूरज चाँद रहेगा....-एक नारा उछला तो गजाधर बाबू के खादी कुर्ते को इत्र की तरह भिंगो गया। मंच गमक गया ।गजाधर बाबू हर्षित हो गए,मन प्रफुल्लित हो गया। परन्तु तुरन्त गंभीरता का का दुशाला ओढ़ ,हाथ जोड़,भाव-विभोर हो,श्रद्धावश सर झुका लिया।नारे के प्रति श्रद्धा? ज़िन्दाबाद के प्रति समर्पण? या उपस्थित जनसमुदाय के प्रति प्रेम विह्वलता?
"....और अन्त में ,आप लोगो का ज्यादा समय नहीं लूंगा। और भी हमारे कई भाई है जो हमारे बीच मंच पर उपस्थित है।आप उनके भी विचार सुनेंगे। इच्छा होते हुए भी आप लोगो के बीच ज्यादा समय नहीं दे पा रहा हूँ।आज सुबह जब डी०एम० साहब के यहाँ नाश्ता कर रहा था तो पी०एम० आफ़िस से काल मिला-भाई साहब ! तुरन्त दिल्ली पहुँचो । क्या करे! ससुरा वक्त ही नहीं मिलता, हम अपने गरीब भाईयों को देखें कि लख्ननऊ ,दिल्ली देंखे? कई बार कहा कि भाई साहब इतना लखनऊ दिल्ली न बुलाया करो ,हमें अपने ग्रामीण भाईयों को देखना है ।पहले (चुनाव के पहले?) हम उनके है बाद (चुनाव के बाद?) में हम आप के है ,दिल्ली के हैं।...तो भाईयों मैं महात्मा जी को शत शत प्रणाम करता हूँ ,उनके दण्ड को प्रणाम करता हूँ जिससे उन्होने अंग्रेजों को मार भगाया । आज विघटनकारी शक्तियाँ फ़िर सर उठा रहीं हैं---क्या कश्मीर क्या असम...क्या तमिलनाडु क्या झारखण्ड। क्या उत्तराखण्ड क्या सामनेवाले गाँव का दखिन टोला।अब डण्डा पकड़ने भर से काम नहीं चलने वाला ...अब इसे चलाना पड़ेगा..."
जोरदार तालियां बजने लगी । "भाई जी संघर्ष करो ...’-जैसे नारे लगने लगे।प्रतीत हो रहा था कि किराए की इस भीड़ को इन नारों के अतिरिक्त कुछ ज्ञात नहीं था ।या 100-100 रुपए पर आए ये लोग इससे ज्यादा नारा लगाना नहीं चाहते थे 2/- प्रति नारा,2/- ज़ोर से नारा लगाने का,चार रुपया हाथ लहराने का। डिस्को स्टाईल से नारा लगाने का  दर अलग।
"... तो भाईयो और बहनो ! अन्त में आप से कहना चाहूँगा......" नेता जी अन्त में,अन्त में करते करते ३ घन्टे बाद अन्तिआए ,और जो सबसे अन्त में कहा था वह यह था -’आगामी चुनाव में मुझे दिल्ली भेजना न भूलें?
०० ००० ०००००
सभा विसर्जित हो गई।भीड़ लौट गई।बगल वाले कनात में मध्याह्न भोज का एक छोटा सा आयोजन था । भोजन आदि का समुचित प्रबन्ध था। आयोजकगण सस्वाद खा रहे थे । छक कर खा रहे थे ।  और भीड भाषण सुन अपनी अपनी राह ली।गांधी जी निरीह व निस्पॄह भाव से गले में माला धारण किए देख रहे थे। पत्थर के थे। मानवीय भावों से ऊपर।पीड़ा-करुणा से ऊपर ,बहुत ऊपर।
गजाधर बाबू ने उत्साह वर्धन किया। मुस्कराते हुए बोले-" बेटा ! जान डाल दी भाषण में।’
नेता जी ने करबद्ध हो,शीश झुका लिया और एक आन्तरिक पीडा़ संजोए दीर्घ सांस छोड़्ते हुए कहा-"दद्दा! सब आप का आशीर्वाद है ,पर स्साले दिल्ली वाले कुछ नहीं सोचते ,मेरे बारे में"
" ज़रूर सोचेंगे बेटा,ज़रूर सोंचेगे एक दिन’-उससे भी बडी़ पीड़ा लिए,गजाधर बाबू ने उससे भी गहरा उच्छवास छोड़ते हुए कहा-" मुझे ही देख ,इसी आशा में मैं बूढा़ हो चला ,दिल्ली को मेरे बारे में सोचना ही पडे़गा...."
ग्यात हुआ दोनो व्यक्ति दिल्ली को एक घंटा तक अपने प्रति सोचवाते रहे।

गांधी जी की मूर्ति-स्थापना से गाँव वालों का भला हुआ कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। परन्तु एक सत्य नि:संदेह व निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि आस-पास गाँव कि जितने नशेड़िए, गंजेड़िए ,भंगेड़िए थे उनका काफी भला हुआ ।अब खोली में छुप कर नशा करने की आवश्यकता नहीं थी ।रात के अंधेरे में गांधी चबूतरा ही काफी था। गांधी जी स्वयं प्रकाश - पुंज थे अत: अधिकारियों ने रोशनी की व्यवस्था करना आवश्यक नहीं समझा। सारे नशेड़िए मिल कर दम लगाते थे । पुलिस उधर नहीं जाती थी। पुलिस को गांधी जी से क्या काम? गांधी चबूतरा अभयक्षेत्र हो गया ।गंजेडियों क भय दूर हो गया,भय से मुक्ति।गांधी जी भी तो यही चाहते थे ।दिन में गांधी जी की मूर्ति के ऊपर सारे कबूतर विष्ठा करते थे और सारे नशेबाज......

मूर्तियां स्थापित हो जाती हैं और सभी लोग अपनी-अपनी सुविधा से इसका उपयोग करते हैं।

अस्तु!

-आनन्द पाठक ’आनन’



बुधवार, 23 सितंबर 2009

व्यंग्य 13 : रावण नहीं मरता.....

एक व्यंग्य : रावण नहीं मरता.....
सुबह ही सुबह मिश्रा जी आ टपके। हाथ में सद्द: प्रकाशित उनका कोई कहानी संग्रह था।मैं चिन्तित हो गया ,उन्हे देख कर नहीं ,अपितु उनका कहानी संग्रह देख कर।विगत वर्ष भी वह अपना ऐसा ही एक कहानी संग्रह लेकर उपस्थित हुए थे जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे जैसे बहुत से पाठकों ने कहानी पढ़ना ही छोड़ दिया।लगता है हिंदी जगत में कल रात फिर कोई दुर्घटना हो गई। आते ही आते हड़्बड़ाते हुए बोले-
" पाठक ! एक कलम देना"
"क्यों ? लिखते हुए तो पाठक गण से कलम नहीं माँगते हो"
"यार ! मजाक छोड़ो ,जल्दी में हूँ ।मुझे यह संग्रह तुझे भेंट करना है"
"तो भेंट कर दो न ,कलम के बदले भेंट करोगे क्या?"
"यार ,जल्दी करो,मुझे और लोगों को भी यह संग्रह भेंट करना है"
मैं प्रेम में पराजित किसी योद्धा की तरह तर्कहीन हो अपनी कलम सौंप दी
मिश्रा जी ने जल्दी जल्दी कलम खोली,रोशनाई छिड़की,पारम्परिक शैली में लिखा
"स्वर्गीय पाठक को
एक तुच्छ भेंट
-सस्नेह मिश्रा।
"भाई मिश्रा !अभी हम स्वर्गीय नहीं हुए हैं"-मैने संशोधन करना चाहा
"तो क्या हुआ ? हो जाओगे। अग्रिम लिख दिया । सोचा फिर कहाँ मिलोगे"
"लगता है पूरा संग्रह आद्दोपान्त पढ़ अवश्य हो जाऊँगा"
"हें! हें ! प्रतीत होता है तुम्हारा व्यंग्य बोध स्तर ’परसाई’ जी से कम नहीं है"-मिश्रा जी ने मेरी प्रतिभा सराही
"और आप की भी कहानियों का स्तर "अज्ञेय " जी से कम नहीं -मैने बिना पढ़े ही उनकी प्रतिभा सराही।
फ़िर हम दोनों अपने-अपने महापुरुषों को अणाम-प्रणाम कर श्रद्धानत हुए।हिंदी में इसे लेन-देन की पारस्परिक समीक्षा कहते हैं।
"यार पाठक,जरा मैं जल्दी में हूँ....तथापि इन कहानियों के बारे में संक्षेपत: स्पष्ट कर दूँ ....
" मालूम है भाई मिश्रा ! हिंदी का पाठक यूँ भी जल्दी में नहीं रहता ,जल्दी में रहता है लेखक...उसे छ्पास की जल्दी रहती है...संग्रह भेंट करने की जल्दी रहती है....उसे जल्दी रहती है समीक्षा करवाने की...गोष्टी करवाने की ...विमोचन करवाने की...खेमा में घुसने की...।पाठकगण का क्या है! मुफ़्त में मिला तो पढ़ लिया"-मैने स्पष्ट किया
"यार लगे बोर करने।हाँ तो मै कह रहा था कि जो तुम देख रहे हो वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...पराड़्मुखता ही जीवन सार है ..वैशिष्ट्य ही व्यक्तित्व है...संग्रह का अपना व्यक्तित्व है..लेखनी का अपना मूल्य (मोल नहीं) है । स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...चिन्तन और मनन में तार्किक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...रावण मरता नहीं...मरना भी नहीं चाहिए...रावण मर गया तो राम क्योंकर आएंगे...? यदा यदा ही धर्मस्य ...राम का आविर्भाव होना है..... तो रावण को ज़िन्दा रखना होगा ..। राम चेतना हैं....रावण जड़ है...वह जड़ जिसकी जड़ें गहराईयों में दूर दूर तक फैली हैं ,,गाँवों से लेकर शहर तक...लखनऊ से लेकर दिल्ली तक..।ऊपर स्थूल है ...नीचे सूक्ष्म अदॄश्य अगोचर...हमें स्थूल से सूक्ष्म की तरफ जाना है...यही रहस्यवाद है ..छाया पीटने से कुछ नहीं होगा...हमें स्थूल पहचानना होगा...मूलोच्छेदन करना होगा....."
" आप चाय पीयेंगे?’ -मैने मध्य में ही बात काटना श्रेयस्कर समझा
" और आप?"
"मेरे लिए ’पेनजान ही काफी है"
"तो क्या आप भी मेरी तरह ’पेनजान’ पर भरोसा करते है?--उन्होने झट से ’पेनजान’ की एक टिकिया मेरी तरफ़ बढ़ दी और पुन: शुरू हुए
" हाँ ,तो मैं क्या कह रहा था.....?"
"कि आप को अभी कई जगह जाना है।"
" हाँ ,तो हमें सूक्ष्म से स्थूल की तरफ जाना है..."
"जी नहीं,आप को यह संग्रह भेंट करने जाना है"
" चले जाएंगे यार ! जब मुफ़्त में ही देना है तो कौन सी जल्दी है"
" मगर मुझे है"-कह कर मैं अन्दर चला गया।
०००० ०००००० ---
यह कहानी संग्रह क्या था ! उसकी संक्षेपिका जो अभी-अभी स्पष्ट कर गए ,अगम्य थी।नि:शुल्क दे गये थे सो पढ़ना पड़ा। आवरण काफी आकर्षक व मनमोहक था। शीर्षक से अच्छी तो आवरण पर अनावॄत लडकी की वह तस्वीर थी जो ग्लोसी पेपर पर छ्पी थी बिल्कुल रानू के उपन्यास की तरह।प्रकाशक महोदय ने अपनी लेखनी से दो-चार पृष्ट का संक्षिप्त परिचय लिख दिया था जिसका आशय यह था कि हिंदी कहानी में प्रेमचन्द जी का पुनर्जन्म हो चुका है। हिंदी जगत को इस लेखक से काफी आशा है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि ऐसी सुपाठ्य पुस्तके छाप -छाप कर वह हिंदी की सेवा करते रहेंगे।
ऐसे संग्रह की समीक्षा क्या लिखना !पाठकों हेतु ’एनोटमी"(शरीर संबंधित)समीक्षा लिख रहा हूँ।"आवरण" देख शरीर में एक अदॄश्य सी ’अँगड़ाई’ उभरने लगी।प्रकाशक जी द्वारा लिखित संक्षिप्त परिचय पढ़ा तो ’माथा भारी’ हो गया,प्रस्तावना पढ़ी तो पूरे बदन में एक "जकड़न-सी होने लगी,प्रथम कहानी में "जम्भाई" दूसरी कहानी पढ़ हल्का-हल्का ज्वर। तीसरी कहानी पढ़ते-पढ़ते ’जाड़ा’देकर कंपकंपी फिर जूड़ीताप। लगता है ठीक ही लिखा था अन्तिम कहानी पढ़्ते-पढ़ते स्वर्गीय......
मध्यान्तर तक जाते मैं अचेत हो गया ।
भयंकर सपने आने लगे-जी हारर शो की तरह।घटाटोप अन्धकार ....,भयानक सन्नाटा,,.....दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज....खण्डहर में रह-रह कर पंख फड़्फड़ाते सन्नाटा भंग करते हुए परिन्दे....फिर देर तक भयानक शान्ति....घरर चरर कर खुलता हुआ एक दरवाज़ा... नीरवता भंग करते हुए ,,,कि अचानक ...हा!हा! हा! ,-एक भयंकर अट्टहास से डर गया मैं।
" हा ! हा ! हा! पहचान मैं कौन हूँ??’- छाया ने अट्टाहास किया।
"महाराज ! आप को कौन भूल सकता..?मैं भयभीत हो हाथ जोड़ काँपने लगा- ’ महाराज ! पू्रे ’रामायण काल’ में तो क्या ,मैं तो कहता हूँ सम्पूर्ण संस्कॄत वांडःमय में या यों कहें कि पूरे विश्व साहित्य में आप के अतिरिक्त और कौन -सा पात्र है जिसके दस मुख हैं? दशानन है?"
"हूँ, सही पहचाना!"-कहते हुए अपने खड्ग का अग्रभाग मेरे कंधे पे टिका दिया जो इस समय मुझे किसी ए०के० -४७ से कम नहीं लग रहा था।
"मगर महराज ! "-रावण कहने से अप्रत्यक्ष भय था ,कहीं बिगड़ न जाएं।बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे अवसर पर महाराज ,महामहिम,माननीय,महाशय,महोदय,पूजनीय, जैसे नवनीत लेपक सम्बोधन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
" महाराज ! आप कौन वाले है? वाल्मीकि ,तुलसीदास या रामानन्द सागर वाले?"- मैने डरते-डरते पूछा
"अरे मूढ़ ! मुझे ’मोशाय’ बोल ,’मोशाय’"- अपने खडग का अग्रभाग दबाते हुए बोला- " अरे मूढ़ ! मैं सार्वकालिक हूँ ,हर काल में व्याप्त हूँ, हर स्थान में व्याप्त हूँ। त्रेता से लेकर द्वापर तक । रामायण में ’रावण’ बना तो "कॄष्णा’में कंस,। अरे मूर्ख ! अपना चौखटा उठा और देख ,लगता है तू रामानन्द सागर का सीरियल नहीं देखता?"- मैने डरते-डरते ऊपर देखा ।पहचानने का एक समर्थ प्रयास किया ।विस्मित हो गया।
" अरे ’त्रिवेदी जी " आप !"-स्वप्न में कैसे?"- भय कुछ कम हुआ
"हा ! हा ! हा ! खा गया न धोखा ,अरे दुष्ट ! मैं ’त्रिवेदी " नहीं, रावण हूँ रावण।सचमुच का रावण।कल सपने में सीता को देखेगा तो कहेगा-अरे दीपिका जी आप ? आइए आइए कौन सा साबुन दे दूँ। अरे ’रावण’ को देख ’रावणत्व’ को पहचान।
" ठीक है ,ठीक है ।यदि आप सचमुच के रावण हैं तो इधर कलकत्ता में क्या कर रहे हैं ,लंका क्यों नहीं जाते ?" -मैने भी झुंझला कर कहा
"वोई खने छिलाम,लंका में उधर मार-काट मची है सो इधर चला आया, सुना है ’इन्फ़िल्ट्रेशन’ की बड़ी सुविधा है इधर।
"एकटा आस्ते बोलून मोशाय आस्ते बोलून ,राम रथ वाले इधर आ गए तो वापस जाना पड़ेगा"-मैने कहा
"अरे ! छोड़ो । जो एक बार इधर आ जाता है वापस नहीं जाता ’वोट’ में बदल जाता है । वैसे भी मेरा ’वोट’ दस ’वोट’ के बराबर है "-अपने दसो चेहरों की ओर इंगित करते हुए कहा-"चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर सकता,मुझे दस फोटू खिंचवाना है"
"लेकिन आप तो मर गए थे स्सर!"-मैं शुद्ध सचिवालयीय शैली पर उतर आया
" अरे! अज्ञानी !पुच्छ-विषाण-हीन पुरुष ! वह झूठ था,सब झूठ। वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक,राधेश्याम से लेकर रामानन्द सागर तक सबने मुझे मारा। सभी ने यही समझा राम ने मुझे मार डाला। रावण मरता नहीं। ’रावणत्व’ अमर है।आज भी ज़िन्दा है।हर गाँव में,हर शहर में,हर गली में ,हर महानगर में।हर काल में हूँ,हर देश में हूँ,हाईड्रोजन बम्ब में हूँ,परमाणु बम्ब में हूँ, रावण व्यक्ति नहीं ,प्रवॄत्ति है ।हर अपहरण में हूँ,हर युद्ध में हूँ, हर छ्द्मवेश में हूँ,हर हठ में हूँ। मेरे मरने के बाद,क्या अब सीता का अपहरण नहीं होता? क्या सीता जलाई नहीं जाती?सीता का परित्याग नहीं होता? अरे! मैं तो रावण था तथापि सीता का स्पर्श नहीं किया। क्या आज की सीता अछूती है? मैने उन्हें ससम्मान अशोक-वाटिका में रखा ,क्या आज की सीता ’फ़ाईव स्टार’ होटलों में नहीं रखी जाती? राम को मारने के लिए ,रामत्व की आवश्यकता है । तुम्हे रावण नहीं ,’राम’ खोजना चाहिए"
"खोज रहे हैं स्सर! राम भी खोज रहें है। हर चुनाव काल में कुछ लोग ’राम-रथ’ पर आरूढ़ हो राम खोजते हैं देश के इस छोर से उस छोर तक।
’लेकिन तोमारा तुलसी तो बोलता था राम घोट घोट में व्याप्त हैं"
"जी स्सर ! आजकल ’वोट’ वोट ’ में व्याप्त हैं। जब नहीं मिलते है तो उन्हीं के नाम की खड़ाऊँ ले,सदन में घुसते हैं। आज कल जरा व्यस्त है उनका मन्दिर बनाने में ,उन्हीं के गॄह नगर अयोध्या में"
"इस प्रगति से तो मन्दिर तो नही,बहुत से जोगियों वाला मठ बन जाएगा,कलियुग बीत जाएगा"- रावण ने कहा। ज्ञानी था।
"ज़रूर बनेगा" -मैने भी केसरिया स्कार्फ़ बाँधते हुए कहा-"अभी हम लोगों ने भूमि समतल कार्य कर दिया है ,अगला कार्यक्रम किसी अगले चुनाव में या अगले कुम्भ मेला में निर्धारित करेंगे।"
रावण के इस दिव्य ज्ञान से मैं अति प्रभावित हुआ।श्रद्धावश हाथ जोड़ कर कहा -" धन्य हो ज्ञानी श्रेष्ट श्रीमन !आज आप का दर्शन कर कॄतार्थ हो गया।"
" तो और सुन !"- अपना व्याख्यान क्रम जारी रखते हुए रावण ने कहा --"...जो तू देख रहा है वह सत्य नहीं,जो सत्य है वह अलक्षित है ..सत्य धर्म है,,सत्य शाश्वत है ...तू स्थूल है ,मैं सूक्ष्म हूँ...स्थापित मापदण्ड है...सत्य चिन्तन है...जड़ और चेतन में दार्शनिक अन्तर है ..सत्य प्रज्ञा है..अज्ञेय है...
धीरे-धी्रे सपने में आकॄति बदलने लगी। खडग के कुशाग्र की जगह ’लेखनी ’का अग्रभाग चुभने लगा ।तलवार कलम में परिवर्तित होती नज़र आने लगी।मैने कहा -" अरे मिश्रा तू ...!"
" हा ! हा! हा! हो गया न भ्रमित !अरे मूढ़ मै मिश्रा नहीं रावण हूँ ,रावण।अच्छा अब बोल तलवार बड़ी कि कलम?"
" तलवार"-मैने झट से उत्तर दिया
"कैसे?"-आकॄति ने विस्मयकारी विस्फारित नेत्रों से देखा
"आपात काल में तलवार देख कलम चुप हो गई थी।जब तक तलवार की नोंक चुभ रही थी तो ’स्सर स्सर महाशय मोशाय ’ कर रहा था जब कलम की नोंक चुभी तो ’तू’ पर उतर आया"
"पाठक जरा कलम देना "-मिश्रा ने झकझोर कर जगाया।स्वप्न भंग हो गया।निद्रा टूट गई।अंगडा़ई लेते हुए बोला--’"
और जो सुबह दी थी ,वह क्या हुई"
"पाठकों को चुभाते-चुभाते निब टूट गई"
"असंवेदनशील रूढ़मना पाठकों को चुभाओगे तो निब टूटेगी ही। कलम की नोक पर तलवार की नोक लगा दो..."।
मैने कलम और संग्रह दोनो ही लौटा दिए अपनी सुविधा हेतु। यह ले अपनी लकुटि-कमरिया ,बहुत हि नाच नचायो"
-अस्तु
-आनन्द