शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

व्यंग्य 41 : तमसोऽ मा ज्योतिर्गमय...



आज बसन्त पंचमी है -सरस्वती पूजन का दिन  है ।

या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणा वर दण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना
या ब्र्ह्माच्युत् शंकर प्रभृतिभि देवै: सदा वन्दिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती  नि:शेष जाड्यापहा

क्षमा करें माँ !

क्षमा इस लिए मां कि उपरोक्त श्लोक के लिए ’गुगलियाना’ पड़ा [यानी ’गूगल’ से लाना पड़ा] छात्रावस्था में यह ’श्लोक’ मुझे कंठस्थ था ,प्राय: काम पड़ता रहता था विशेषत: परीक्षा के समय ..सुबह शाम यह श्लोक रटता रहता था कि हे माँ !सरस्वती बस इस बार मुझे  पास करा दे...अच्छे नम्बर की माँग नहीं करता था ।कभी कभी हनुमान जी को भी स्मरण कर लेता था ,शायद वही उद्धार कर दें । माँ वह आवश्यकता थी ,प्रीति थी सो इस श्लोक को याद रखना और विश्वास करना मेरी मज़बूरी थी । जब पढ़ाई लिखाई खत्म हो गई तो श्लोक का सन्दर्भ भी खत्म हो गया । सो भूल गया था ।इसी लिए ’गुगलियाना’ पड़ा। जब रोजी-रोटी का ,धन कमाने का समय आया तो ’लक्ष्मी-पूजन’ का श्लोक याद रखने लगा ।माँ ! यह स्वार्थ नही था मां ,प्रीति थी ।मेरी ज़रूरत थी। तुलसीदास ने पहले ही कह दिया है

सुर नर मुनि सबकी यह रीती
स्वारथ लाग करहि सब प्रीती

आज मैं फ़ुरसत में हूँ माँ। रिटायरमेन्ट के बाद यह मेरा पहला पूजन है आप का । पेन्सन फ़िक्स होने के बाद ’लक्ष्मी ’ जी फ़िक्स हो गई जो आना था सो आ गईं सोचा कि अब आप का ही  विधिवत पूजन करू। सेवा काल में तो काम चलाऊ -ॐ अपवित्र : पवित्रो वा...सर्वावस्थां गतोऽपि वा...." -- कह कर कुछ माला-फूल चढ़ा कर जल्दी जल्दी पूजा कर के आफ़िस निकल जाता था । आज कोई जल्दी नहीं है । टाईम ही टाईम है...बास की कोई मीटिंग नहींं....कोई झूठा-सच्चा स्टेटमेन्ट नहीं भेजना...कोई प्रेजेन्टेशन नहीं देना...कोई टेन्सन नहीं....आज पूरा श्लोक पढूंगा...याद करूँगा

  हे माँ ! मै ही आप का आदि भक्त हूँ । हर भक्त ऐसा ही कहता है सो मैं कह रहा हूँ।60-साल की उम्र में 55 साल से पूजा अर्चना कर रहा हूँ आप का । हर वर्ष करता हूँ । 55 साल इस लिए कि मेरी पढ़ाई ही जन्म के 5-साल बाद शुरु हुई। गाँव के ही एक स्कूल में पिता जी ने नाम लिखवा दिया तो विद्या आरम्भ ,आप की पूजा आरम्भ।पट्टी दवात दूधिया सम्भाला । लिखता तो कम था .पट्टी पर कालिख लगा कर दवात से रगड़ रगड़ कर चमकाता ज़्यादा था फिर उस पर सूता भिंगो कर लाईन मारता था [पाठकगण "लाईन मारने" का कोई ग़लत अर्थ न निकालें ] यानी लाईन खीचता था कि लेखन सीधा रहे ।फिर   लिखना सीखा ’अब घर चल’ ...अब घर चल ...अब घर चल ।1 साल तक यही लिखता रहा तो मास्साब ने इसका मतलब समझ लिया और सचमुच मुझे घर भेज दिया

फिर पिता जी  शहर चले आये ।और यहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला मुन्स्पलिटी के स्कूल में नाम लिखा दिया जो घर के बिल्कुल पास में था । अगर पिता जी ज़मीन्दार होते ,[जो कि वह नहीं थे] तो वह स्कूल मेरे घर के आंगन में होता । इस नज़दीकी का फ़ायदा मैने खूब उठाया और हर घंटी के बाद पानी पीने घर ही आ जाया करता था। पिता जी को मुहल्ले वालों ने काफी समझाया कि ’कान्वेन्ट’ स्कूल के बच्चे ’स्मार्ट’ होते हैं ..पिता जी  ’नज़दीकी’ वाले तर्क से सबको पराजित कर दिया करते थे ..शायद उस समय उनकी ’पाकेट’ उतनी गहरी न रही होगी जितना ’कान्वेन्ट’ स्कूल के लिए चाहिए था । अत: मैं ’स्मार्ट’ तो न बन सका माँ ...लढ्ड़ का लढ्ड़ ही रहा और नतीजा आप के सामने है कि आजतक बस ’अल्लम गल्लम बैठ निठ्ठलम :-व्यंग्य लिख रहा हूँ।

शहर में आ कर भी समस्या वहीं की वहीं बनी रही ---यानी पास होने के लाले पड़े रहते थे। कक्षा 3- में आया खूब मेहनत की कि इस बार तो पास होना ही है कि इसी बीच चाईना वालों ने युद्ध छेड़ दिया .इस से फ़ायदा यह रहा कि अपने ’फ़ेल’ होने का सारा दोष ’चाइना’ पर मढ़ दिया। लश्टम पश्टम करते इन्टर तक पहुंचा ही था कि इस बार ’पाकिस्तान’ ने युद्ध छेड़ दिया तब मुझे पहली बार आभास हुआ कि हो न हो मेरे फ़ेल होने में विदेशी शक्तियों का ’हाथ’ है।खैर माँ ,आप की कृपा से किसी तरह इन्जीनियर बन गया ..काम बन गया।

मां ! आप ज्ञान कला संगीत की अधिष्टात्री देवी हैं।आप साहित्यकारों की ,बुजुर्गों की इष्ट देवी है ।भगवा धारी  की भी हैं  ,छात्र-छात्राओं की भी है  , युवाओं की भी है ,सभी साथ साथ पूजा में व्यस्त है }2-दिन बाद इसी उत्साह से उन्हें ’वैलेन्टाइन-डे’ भी मनाना है ।तब भगवा धारी साथ साथ नहीं रहेंगे ।आप का ज्ञान उन्हें प्राप्त हो चुका होगा कि ’प्रेम-प्रदर्शन’ -अपसंस्कृति है । तब उनके हाथ में ’संस्कृति’ का डंडा रहेगा -जो ’अपसंस्कृति’ को ठीक करेंगे । इस काम का ठेका आजकल उन्हीं के पास है।

आप ने सबके हाथ में ज्ञान का मशाल दे दिया । लोग ज्ञान की अपनी अपनी व्याख्या से मशाल ले कर चल दिए। सब की अपनी अपनी मशाल ।हिन्दू की मशाल अलग...मुस्लिम की मशाल अलग। ज्ञान के इस रोशनी में चेहरे नज़र आने लगे -कौन हिन्दू है ,कौन मुसलमान है  । हिन्दुओं में भी अलग अलग हाथों में अलग मशालें ।मेरे ज्ञान की मशाल में ज़्यादे रोशनी है । सबूत? सबूत क्या? घर -मकान-बस्तियाँ जला कर दिखा देते है । हाथ कंगन को आरसी क्या ।और कई बार दिखा भी दिया । और इधर, ब्राह्मण महासंघ...राजपूत महासंघ ...तैलीय समाज..वैश्य समाज..वाल्मिकी समाज... इस ज्ञान की मशाल में चेहरे दर चेहरे और साफ़ नज़र आने लगे ..आदमी ही आदमी ......’आदमियत’ अँधेरे में चली गई ..कहीं नज़र नहीं आ रही है.....।हम यहीं तक नहीं रुके। हर महासंघ में एक महासंघ।पहिये के अन्दर पहिया-’ व्हील विद इन व्हील "  ब्राह्मण समाज ही को ले लें ...गौड़ ब्राह्मण ....कान्यकुब्ज़ी ...सरयूपारीय ...पराशर.... यही हाल क्षत्रिय संघ ,वैश्य समाज सब के हाथ में एक एक मशाल .....संघौ शक्ति कलियुगे........."तमसो मा ज्योतिर्गमय-....अभी तक हम अंधेरे में थे ..ज्ञान का प्रकाश मिलता गया  हम अंधेरे से रोशनी की तरफ़ बढ़ते गए...हम बँटते गए

 राजा भोज आप के अनन्य भक्त थे । अपने शासन काल में  भोज शाला  में आप की पूजा विधिवत और बड़े धूम धाम से कराते थे । आजकल उनके भक्त कर रहें है करा रहे है । कल टी0वी0 पर समाचार आ रहा था कि भोजशाला में आप का पूजन अर्चन चलेगा और पास में ही जुमा की नमाज़ भी चलेगी। किसी ज़माने में यह भाई-चारे का प्रतीक रहा होगा ,आप की कृपा से अब हमको ज्ञान प्राप्त हो गया है --दोनो का ज्ञान अलग अलग ..मेरा ज्ञान तेरे ज्ञान से बेहतर ...तेरा ज्ञान मेरे ज्ञान से कमतर.. । ’धार’ मे लोग अपने अपने-अपने ज्ञान को ’धार’ दे रहे हैं -और बीच में पुलिस का डंडा । कहीं दोनो का ज्ञान आपस में मिल न जाय ’वोट’ बैंक का मसला है कुर्सी बचानी है तो इन्हें अलग अलग रखना ही बेहतर है

राजा भोज की बात चली तो ’गंगू तेली’ की बात चली। लोगो ने इस कहावत के अपने अपने ढंग से व्याख्या की कुछ ने ’गांगेय’ और "तैलंग’ का संबन्ध बताया जो कालान्तर में ’गंगू’ बन गया
किसी ने ’गंगू’ तेली के राज्य हित में बलिदान की बात बताई । मगर हमारे ज्ञान भाई [ ज्ञान चतुर्वेदी जी[भोपाल वाले] ने पतली गली से रास्ता निकाल लिया....बताया वर्तमान में कई राजा ’भोज’ है ..भोपाल के राजा ’भोज’ अलग ..लखनऊ के राजा भोज अलग...दिल्ली के राजा भोज अलग..ग्राम पंचायत के राजा भोज अलग ।..और गंगू तेली? गंगू तेली यानी -हम

इसी सिलसिले में एक पतली गली हम ने भी निकाली । मीडिया वालों नें अपना कैमरा मेरी तरफ़ नहीं किया वरना हिन्दी जगत को इस मुहावरे को एक नया रूप मिल गया होता....
वस्तुत: इस मुहावरे को ---कहाँ राजा "भोज’ कहाँ ;भोजू’ तेली --होना चाहिए था ।”भोजू’  का राजा ’भोज’ के साथ समानता भी बैठ रही है।  इसी बिना पर तो ’भोजू’ तेली भी अपने को राजा भोज समझने लगा होगा और ऐठ कर चलने लगा होगा तो किसी ने तंज़ किया होगा...वैसे ही जैसे कल शाम शुक्ला जी मुझ पर तंज़ किया---कहाँ मुल्कराज आनन्द....और कहाँ आनन्द.पाठक आनन्द....हा हा हा हा हा ।

तो हे माँ सरस्वती ...आज का पूजन यहीं तक ।अगला पूजन अगले बसन्त पंचमी को

सादर/अस्तु

-आनन्द.पाठक-



शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

व्यंग्य 40 : अवसाद में हूं ..

अवसाद में हूँ...

जी हाँ, आजकल मैं अवसाद में हूँ । अवसाद में हूँ इस लिए नहीं कि कल बड़े बास ने डाँट पिला दी।  इस ठलुए निठलुए पर जब वह डाँट पिलाने का कोई असर नहीं देखते हैं तो  खुद ही अवसाद में चले जाते हैं। मैं अवसाद में इसलिए भी नही हूँ कि मैं रिटायर हो गया -ताड़ से गिरा खज़ूर पे अटका और श्रीमती जी की सेवा में लग गया और मटर [अभी सीजनल फ़ली यही है] छीलने में लग गया। अवसाद में इसलिए भी नहीं हूँ कि मुझे अपनी किसी बेटी की शादी करनी है ..भगवान ने पहले ही इस ’सुख’ से वंचित कर दिया।

जब से "असहिष्णुता" के नाम पर कुछ लोग "अवार्ड’  लौटाने लगे तो मैं अवसाद में आ गया। मेरे पास कोई ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा आता सरकार को --यह ले अपनी लकुट कमरिया मेरौ काम न आयौ-। उन लोगों की अन्तरात्मा कभी कभी जगती है...बाक़ी समय सोती रहती है । जब जगती है तो अचानक ख़याल आता है अरे! मेरे निद्रा काल में इतना सब कुछ हो गया ...धिक्कार है इस निद्रा को। जमाना क्या कहेगा  ....साहित्यकार है ..बुद्धिजीवी हैं ...समाज के प्रहरी है... हमें जगे रहना है ..समाज को जगाए रहना है तो जगने का प्रमाण पत्र देना ही होगा...मुझे अपना ’अवार्ड’ लौटाना ही होगा ...
मैं जानता हूं वह सड़कों पर नही उतरेंगे..झण्डा नहीं उठायेंगे.....वह आन्दोलन नहीं करेंगे.....आन्दोलन के लिए युवा पीढ़ी है ...वह तो बस ’अवार्ड’ लौटायेंगे और  लौटाने के बाद  फिर सो जायेंगे ...फिर कभी जगने के लिए...
इसी बात का अवसाद है मुझे कि मेरे पास कोई सरकारी ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा आता और अपने जगे होने का प्रमाण दे आता वरना दुनिया मुझे ’मुर्दा’ ही समझ्ती होगी...’असहिष्णु’ ही समझ रही होगी। कुछ ’अवार्ड’ है मेरे पास पर सरकारी नहीं हैं  ..नितान्त व्यक्तिगत है..श्रीमती जी ने दिये हैं बिना किसी खर्चे पानी के..। जैसे "निठ्ल्ले है आप "...कामचोर.. आलसी..’कलम-घिसुआ" अवार्ड [मेरे लेखन प्रतिभा से प्रभावित हो कर] वग़ैरह वग़ैरह। कुछ ’खिताब’ तो ऐसे हैं कि मैं यहां लिख नहीं सकता ..पर आप समझ सकते है। उस में से एक अवार्ड ये भी है -" क्या .....   की तरह मेरे पीछे पीछे घूमते है। रिक्त स्थान आप स्वयं भर लें अपनी सुविधानुसार। मैं कई बार ऐसे ’अवार्ड’ लौटाने के लिए श्रीमती जी को कहा ...मगर वह लेने को तैयार नहीं ...कहती हैं सही ’अवार्ड’ दिया है .रखिए अपने पास ....एक और दूँ क्या !!

बड़े लोगों की बात और है। वो ’अवार्ड’ पाते हैं तो तालियाँ बजती हैं ,,,और जब लौटाते हैं तो और बजती है..बड़े लोग ’गालियाँ’ भी देते हैं तो ’तालियाँ; बजती है । सही वक़्त पर सही निर्णय लेते है....सही दलील देते है....मानना न मानना आप पर छोड़ देते है। और मैं ?अगर मैं अवार्ड लौटाऊँ तो श्रीमती मेरी ही बजा देंगी।

कल शाम मुझे अवसाद में देख ,नुक्कड़ का भुलेटन पनवाड़ी से रहा न गया....." उस्ताद क्या बात है"? फिर कहीं मंच पर कोई ’शे’र पढ़ दिया क्या कि मुँह सूजा हुआ है?"

 भाई भुलेटन की नुक्कड़ पर पान की दुकान है ...भुलेटन पान दरीबा"..यहीं पर सुबह शाम मुलाकात होती है । एक बार मैं उस के किसी बब्बर शे’र का इस्लाह कर दिया था तभी से वो मुझे उस्ताद कहने लग गया और कभी कभी  गुरु-दक्षिणा में 1-2  गिलौरी पेश कर देता है। शायर तो वह भी ..फिर हम दोनों एक दूसरे को शे’र सुनाते रहतें है और दाद वाद देते रहते हैं ..वो मेरा पीठ खुजा देता है और मैं उसका जब कि वह अपने को ’मीर’ और मैं अपने को ’ग़ालिब’ समझने लगता हूँ...
"क्या बात है उस्ताद ...मुँह सूजा सूजा लगता है"---- भुलेटन भाई ने पूछा
" यार भुलेटन ! आजकल अवसाद में हूं"
" भाई ! ये ’अवसाद’ क्या होता ? ,,,,भुलेटन ने जिग्यासा प्रगट की
"तू नहीं समझेगा...तू तो बस पान लगा। बड़े लोगों के चिन्तन को अवसाद कहते हैं  ...लोग अपना अपना ’अवार्ड’ लौटा रहें है और मेरे पास कोई ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा देता...बस इसी बात की चिन्ता यानी चिन्तन है "
" अरे उस्ताद बस ,इतनी सी बात । अरे कल ही आप को अवार्ड दिलवा देता हूँ वो भी बिना हर्रे-फिटकरी के"
"अरे ! तू और तेराअवार्ड ? यार भुलेटन मजाक न कर ... मैं अभी गहन चिन्तन में हूँ"

तरदामनी पे शेख हमारे न जाइयौ
दामन निचोड़ दूँ तो फ़रिश्ते वज़ू करें   -------पता नहीं भुलेटन भाई किस शायर का शे’र पढ़ गए...

खैर मैने पूछा -" अवार्ड क्या तेरी पान की गिलौरी है कि जिसको चाहे उसको दे दे?
"नहीं उस्ताद ’आथिन्टिकेटेड अवार्ड’ दिलवाऊँगा....’अखिल भारतीय पनवाड़ी संघ का कल्चरल सेक्रेटरी जो हूँ"
"अरे ये नुक्कड़ और ये तेरा अखिल भारतीय....!!"
अरे उस्ताद ! अब तो गली गली में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन /मुशायरा होने लगा है ,,बैनर ही तो लगाना है खाली..बस 2-4 फोटू खिचवा  लेना...रमनथवा से माला-फूल चढ़वा देंगे आप पर...
फिर आप जो लिख कर देंगे वही ’प्रशस्ति-पत्र" पढ़वा देंगे...श्यम ललवा से .।.बस हो गया आप का अवार्ड ....फ़ेसबुक पर चढ़ा देना...मिल ही जायेंगे 100-50 वाह वाह करने वाले...फिर चाहे ये अवार्ड रखो या लौटाऒ कोई पर्क़ नहीं पड़ता...."  भुलेटन भाई ने अवार्ड का ’रहस्य’ और ’महत्व’ समझाया

-सौदा कोई बुरा नहीं था...सो अवार्ड ले ही लिया..."अखिल भारतीय पनवाड़ी संघ व्यंग्य सम्राट " का
सोचा कि अब वक़्त आ गया कि इसे ’फेसबुक’ पर चढ़ा दूं....
..देखा कि वहाँ तो पहले से ही ऐसे 50-60 "अवार्डी" हैं
सोचता हूँ कि फिर कही ’दंगा’ या कोई ’असहिष्णु’ हो तो  विरोध स्वरूप  मैं भी यह ’अवार्ड’ लौटा दूँ....यह ले अपनी लकुट कमरिया.......

-अस्तु

-आनन्द.पाठक
09413395592