बुधवार, 27 मई 2009

व्यंग्य 004 :लघु व्यथा -- लोमड़ी कथा ....

व्यंग्य 004 : अथ श्री लोमड़ी कथा


लोमडी ने ललचाई नज़रों से अंगूर देखा ।मुंह में पानी भर आया और लार टपक गई ।सोचने लग गई ....आहा! क्या रस भरे अंगूर होंगे...कितने मीठे होंगे...काश ! यह अंगूर अपने आप टपक जाता ...काश! यह अंगूर मैं तोड़ पाती... यही सोच उसने दो-चार जोरदार छलाँग भी लगाईं ।परन्तु अंगूर जरा ऊँचाई पर
लटके थे वह निराश मन दुखी हो वापस जा रही थी और दिल को समझाती जा रही थी ...क्या रखा हैं उस अंगूर में ...अंगूर तो अभी खट्टे हैं ...मैं नाहक ही परेशान हो रही हूँ ॥जब पक जायेंगे तो खाऊँगी... इसी उधेड़बुन मैं थी विप्र रूप धारण कर अचानक एक व्यक्ति प्रगट हुआ
" लोमडी बहन ! तुम उदास क्यों हो ?"
" देखो, तुम मुझे बहन -वहन मत कहो ,तुम आदमियों को अच्छी तरह जानती हूँ कुछ मदद कर सकते हो तो बोलो "
" तुम तो व्यर्थ  ही नाराज़ हो गई ,बोलो मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ?-विप्र ने प्रस्ताव रखा
" देखो !वह अंगूर बहुत अच्छे लगते हैं. मगर मैं उन्हें पा न सकी... ,उसका भोग न कर सकी अगर तुम....." लोमडी बोली
" इस जन्म में तो नहीं ,अगले जन्म में कुछ मदद कर सकता हूँ .विप्र ने प्रस्ताव दिया
"चलो अगले जन्म ही सही"-लोमडी ने प्रस्ताव मान लिया
" जाओ ,अगले जन्म में तुम 'ठेकेदार' बनोगी ,फिर कोई अंगूर खट्टा नहीं रहेगा "-यह कह कर विप्र अंतर्ध्यान हो गया
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वह लोमडी, कलियुग में पुरुष योनी में जन्म ग्रहण कर 'ठेकेदार' पद को प्राप्त हुई . तदुपरांत उसने 'जंगल ' छोड़ 'दिल्ली' में आवास बना लिया.अब वह सुबह-सुबह "अंगूर ' का नाश्ता करता है ..अंगूर' का जूस पीता है रात्रि में 'अंगूर की बेटी ' का सेवन करता है .बड़े-बड़े लोगो के यहाँ अंगूर की पेटियों में अंगूर की शराब भिजवा देता है /साल में एक-दो बार जिंदा अंगूरी शबाब भी परोस देता है . बदले में अंगूर के बाग़ की नीलामी लेता है .अब उसे कोई अंगूर खट्टा नहीं लगता हर अंगूर मीठा रस भरा स्वादिष्ट लगता है चाहे वह चारा,तेल,अलकतरा के रूप में हो या सड़क ,पुल,बाँध की शकल में.या ग्रामीण रोज़गार मध्यान्ह भोजन योजना हो ?
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और वह विप्र?
वह विप्र कलियुग में मनुष्य योनी में जन्म ले 'दलाल' पद को प्राप्त हुआ.और 'ठेकेदार' महोदय को ठेका दिलाने में मदद कर पूर्व जन्म का वचन निभा रहा है
अत: हे पाठक गण! जो व्यक्ति इस कथा का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करता है वह निश्चय ही " व्यंग्य - लोक" का आनंद उठाता है
अथ इति श्री लोमडी-व्रत कथायाम द्वितीयोध्याय:
अस्तु

-आनन्द पाठक--

इस कथा को आप यहाँ सुन सकते हैं



सोमवार, 25 मई 2009

व्यंग्य 003: लघु व्यथा -प्यासा कौआ....

व्यंग्य 003 : प्यासा कौआ 

    प्यास से व्याकुल कौए ने घडा देखा ।.घडे में पानी था तो ज़रूर परन्तु पेंदी  में  था।  बहुत नीचे था । चोंच की पहुंच के बाहर था।.प्यास से हाल-बेहाल था .प्यास बुझाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था .अचानक उसके मन में एक विचार कौंधा .फिर क्या था ! पास पड़े कंकडों को एक-एक कर के घडे में डालना शुरू किया.उसका यह सत्प्रयास रंग लाने लगा और घडे का जलस्तर धीरे-धीरे ऊपर आने लगा.उसका यह परिश्रम सफल होने जा रहा था.वह सोच रहा था की अब वह अपनी प्यास बुझा लेगा ....वह अपनी प्यास...

दूर कहीं केहुनी पर टिका,गांधी टोपी लगाए एक आदमी यह घटनाक्रम बड़े ध्यान व मनोयोग से देख रहा था और कौए के श्रम पर मंद-मंद मुस्करा रहा था.। कौए ने जैसे ही जल पीने के लिए अपनी चोंच डुबाई की उस आदमी ने एक पत्थर उठा कर चला दिया और कौए को भगा दिया .।कौआ उड़ गया ।
तत्पश्चात वह आदमी बड़े आराम से पानी पीने लगा.लोग कहते हैं कि वह अपने क्षेत्र का बाहुबली था.
उस आदमी  की यह विलक्षण प्रतिभा व अद्भुत कार्यशैली देख कर  पार्टी का आला कमान  अति प्रसन्न व प्रभावित हुआ।. उन्होंने उस आदमी  में अपने राजनैतिक उत्तराधिकारी के गुण देखते हुए आगामी चुनाव का टिकट दे दिया .कहने की आवश्यकता नहीं कि वह आदमी  भारी मतों से विजयी भी हो गया .

और वह कौआ?
वह कौआ आज भी डाल पर बैठ कर धूमिल जी की कविता गुनगुना रहा है :-

" एक आदमी 
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है।
मैं पूछता हूँ-
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।
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इति श्री काक व्रत कथायाम द्वितीयोध्याय
अस्तु.

---आनन्द पाठक-

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